लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷गत दिवस पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा यह कहा जाना कि पाकिस्तान दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में शुमार है और उसके परमाणु हथियार बिना किसी सुरक्षा के हैं, रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि अब अमेरिका पाकिस्तान से रिश्ते परिभाषित करने का मन बना लिया है। बाइडन ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और सभी देश अपने सहयोगियों को लेकर दोबारा सोच रहे हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका अपने पुराने सहयोगी पाकिस्तान को लेकर नए सिरे से विचार कर रहा है। अमेरिका की बेचैनी इसलिए है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी हो चुकी है और पाकिस्तान के परमाणु हथियार असुरक्षित हैं जिस पर आतंकी संगठनों की नजर है। अमेरिका को आशंका है कि अगर परमाणु हथियार आतंकी संगठनों के हाथ लग गए तो दुनिया की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। याद होगा अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के समय अमेरिका के शीर्ष जनरल मार्क मिले ने चेताया था कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना हटने के बाद पाकिस्तान के परमाणु हथियार गलत हाथों में जा सकते हैं। किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है और उसके पास कई सैकड़ा परमाणु बम हैं। उसके पास परमाणु आयुधों का जखीरा होने की खबरें हैं। यह भी उद्घाटित हो चुका है कि उसके परमाणु हथियारों पर आतंकी संगठनों की नजर है। सवाल लाजिमी है कि क्या अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने नियंत्रण में लेना चाहता है? क्या ऐसा कर पाना उसके लिए संभव होगा? फिलहाल अमेरिका के लिए यह कर पाना आसान नहीं है। फिलहाल वह नजरें जरुर गड़ाए हुए है। कहा तो यह भी जा रहा है कि वह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को कब्जे में लेने के लिए किसी आपात योजना पर काम कर रहा है। याद होगा मई, 2011 में अमेरिकी राष्ट्रपति के पूर्व सलाहकार जैक करावेल्ली ने बीबीसी-5 को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और सामग्री को कब्जे में लेने की गुप्त योजना मौजूद है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो वक्त बताएगा लेकिन शायद बाइडन प्रशासन आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान का कान उमेठने का मन बना लिया है। दूसरी ओर अमेरिका समर्थित सभी पश्चिमी देशों का भी पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता हैं। ऐसे में अमेरिका पर पाकिस्तान के खिलाफ सख्ती बरतने का दबाव बढ़ गया है। अमेरिका का पाकिस्तान से नाराजगी की कई अन्य वजहें और भी हैं। मसलन उसकी लाख कोशिशों के बाद भी दक्षिण एशिया रणनीति के समर्थन और हक्कानी व लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ पाकिस्तान सख्ती से पेश नहीं आया। जबकि अमेरिका ने पाकिस्तान को अफ-पाक नीति में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की। उसका मकसद था कि दक्षिणी अफगानिस्तान से लगे पाकिस्तानी सीमावर्ती क्षेत्रों में जहां तालिबानों के एक प्रभावशाली समूहों को शरण प्राप्त है, उस पर नियंत्रण स्थापित हो। लेकिन पाकिस्तान की दगाबाजी के कारण अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी और आज अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में है। इससे अमेरिका भन्नाया हुआ है। जबकि पिछले दो दशक में आतंकवाद से लड़ने के नाम पर उसने अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को 33 अरब डाॅलर की मदद दी जा चुकी है। लेकिन उसने आतंकियों के खिलाफ लेशमाात्र भी कार्रवाई नहीं की। बल्कि उसकी खूफिया एजेंसी आईएसआई ने संरक्षण प्रदान की। पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर गौर करें तो अमेरिका 2009 से लेकर अब तक तकरीबन 4 अरब अमेरिकी डाॅलर यानी 300 अरब की मदद दे चुका है। लेकिन उसने जिस उद्देश्य के लिए मदद दी उसका उसे कोई फायदा नहीं मिला। सच तो यह है कि पाकिस्तान ने इस पैसे का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए किया। याद होगा डोनाल्ड टंªप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के एक शीर्ष रिपब्लिकन सीनेटर लेरी प्रेसलर जो कि 1990 के दशक में पाकिस्तान पर कड़ी आर्थिक पाबंदियां लगाने में अहम भूमिका निभायी थी, ने टंªंप प्रशासन से पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक देश घोषित करने की मांग की थी। प्रेसलर का सुझाव था कि उन्होंने 1990 में लागू किए गए संशोधन की वकालत की थी। तब अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को दी जाने वाली अधिकांश आर्थिक तथा सैन्य सहायता पर रोक लगा दी गयी थी। लेकिन उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज एच डब्ल्यू बुश यह प्रमाणित करने में पूरी तरह विफल रहे कि पाकिस्तान परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। लेकिन सच्चाई इसके उलट रही। पाकिस्तान ने परमाणु हथियार विकसित कर लिया। डोनाल्ड टंªप के समय लैसी प्रेसलर ने दो टूक कहा था कि अब वक्त आ गया है कि अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक देश घोषित करे। लेकिन डोनाल्ड टंªप ने ऐसा नहीं किया। हां, उसकी दगाबाजी और धोखाधड़ी से आजिज आकर उन्होंने इतना जरुर कहा कि पाकिस्तान झूठा और कपटी है। वह अमेरिका को सिर्फ धोखा दिया है। सच भी यहीं है कि पाकिस्तान ने हमेशा ही अमेरिका की नसीहत और सुझावों को दरकिनार कर उसकी आंखों में धूल झोंका। आतंकवाद से लड़ने की उसकी पोल तब खुल गयी जब अमेरिकी सैनिकों ने एबटाबाद में ओसामा-बिन-लादेन को मार गिराया। इससे पहले वह दुनिया को भरोसा देता रहा कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में नहीं है। मजेदार बात यह कि ओसामा के मार गिराए जाने के बाद भी अलकायदा के तीसरे नंबर का नेता शालिद शेख मुहम्मद, नेटवर्क व्यवस्था का देखरेख करने वाला अबु जुबैदिया, यासर जजीरी और अबु फरज सभी पाकिस्तान से ही पकड़े गए। इन गिरफ्तारियों से विश्व समुदाय अचंभित रह गया। लेकिन इसे लेकर पाकिस्तान को तनिक भी शर्मिंदगी नहीं है। गत वर्ष पहले अमेरिका के गृहमंत्रालय की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान को उन देशों में शामिल किया गया जहां आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाहें दी जाती हैं। कंट्री रिपोर्ट आॅन टेररिज्म के नाम से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जिससे अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों को पर्याप्त चोट पहुंचा। इस रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने लश्करे तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ भी कोई ठोस एक्शन नहीं लिया। ये सभी संगठन पाकिस्तान से ही संचालित होते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान इन आतंकी संगठनों को फंडिंग करता है। यही नहीं गत वर्ष पहले अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक रिपोर्ट से भी उद्घाटित हुआ कि पाकिस्तान के संघ प्रशासित कबायली क्षेत्र (फाटा), पूर्वोत्तर खैबर पख्तुनवा और दक्षिण-पश्चिम ब्लूचिस्तान क्षेत्र में कई आतंकी संगठन पनाह लिए हुए हैं। यहीं से वे स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक हमलों की साजिश बुनते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक हक्कानी नेटवर्क, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-झंगवी और अफगान तालिबान जैसे अन्य आतंकी समूह पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र में अपनी गतिविधियों की योजना के लिए इन पनाहगाहों का फायदा उठाते हैं। सच तो यह है कि पाकिस्तान आतंकियों का प्रश्रयदाता देश है। दिसंबर, 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री स्वयं कहते सुने गए थे कि 26 नवंबर, 2008 के मुंबई हमले को लश्करे तैयबा ने अंजाम दिया। ऐसा नहीं है कि अमेरिका इन सभी तथ्यों से अवगत नहीं है। लेकिन अफगानिस्तान में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए वह पाकिस्तान के साथ कंधा जोड़े रहा। फिलहाल अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा है और तालिबान का पाकिस्तान से रिश्ते खराब हो रहे हैं। ऐसे में अमेरिका के लिए पाकिस्तान बहुत प्रासंगिक नहीं रह गया। पाकिस्तान की निकटता चीन और रुस से भी बढ़ रही है जिसे लेकर अमेरिका नाराज है। ये दोनों देश अमेरिका के दुश्मन देश हैं। दूसरी ओर वैश्विक फलक पर भारत का आर्थिक-सामरिक रुतबा लगातार बढ़ रहा है। आर्थिक लिहाज से वह विश्व की पांचवी सबसे बड़ी महाशक्ति बन चुका है। ऐसे में अमेरिका आतंक को प्रश्रय देने वाले पाकिस्तान के साथ कंधा जोड़कर भारत को नाराज नहीं कर सकता। विचार करें तो तेजी से बदल रहे वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच अगर अमेरिका पाकिस्तान से अपने संबंधों को पुर्नपरिभाषित करना चाहता है तो यह उसकी रणनीति का हिस्सा है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















