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लेखक- अमित सिंघल

पिछले दो दशक में विदेशी हस्तक्षेप द्वारा फोर्स किए गए सत्ता परिवर्तन के बाद अफगानिस्तान, यमन, इराक, लीबिया, सूडान इत्यादि राष्ट्रों में आज क्या स्थिति है? क्या उनकी आर्थिक स्थिति एवं आंतरिक सुरक्षा सत्ता परिवर्तन के पूर्व वाली स्थिति से बेहतर है?

निश्चित रूप से, उत्तर नकारात्मक है।

यह सभी राष्ट्र अस्थिरता, मार-काट एवं महिलाओ पर पाशविक अत्याचारों को झेल रहे है। कई का अलिखित विभाजन हो चुका है।

उदाहरण के लिए, इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के बारे में पढ़ लीजिए। इसे इराक का एक स्वायत्त क्षेत्र (autonomous region) आधिकारिक रूप से कहा जाता है। इस क्षेत्र के संसाधनों पर बगदाद का नियंत्रण नहीं है। इस 22 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता ने इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के संसदीय चुनावों पर एक वक्तव्य इश्यू किया था।

या फिर लीबिया देख लीजिये – जहाँ दो क्षेत्र अपनी-अपनी स्वायत्त सरकार का क्लेम करते है। यही स्थिति यमन एवं सूडान की है जो अलग-अलग खेमे में बटे हुए है; नरसंहार कर रहे है।

अफगानिस्तान में तो महिलाओ को सार्वजानिक स्थल पर बोलने की अनुमति नहीं है, पढाई-लिखाई, रोजगार, या स्वास्थ्य सेवा की बात भूल जाइए।

इसके मूल में एक प्रमुख कारण यह है कि मुख्य शासक को हटाने के बाद विदेशी ताकतें अपने क्षुद्र लाभ के लिए अलग-अलग पक्ष को प्रलोभन देना, उन्हें भड़काना शुरू कर देती है। दूसरा यह है कि “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय”, जिसमे NGO लॉबी भी सम्मिलित है, इन राष्ट्रों में रातो-रात स्विट्ज़रलैंड स्टाइल की डेमोक्रेसी, स्त्री-पुरुष समानता एवं समलैंगिक सम्बन्धो का मूलभूत अधिकार लाना चाहता है। चूंकि कई समूह सत्ता चाहते है, उनमे से कुछ के नेता इन सभी को लागू करने का वचन दे देते है।

फिर सत्ता मिलने के बाद ऐसे वचन वास्तविकता के धरातल से टकराते है। लिखना उचित नहीं होगा, लेकिन इन क्षेत्रो में व्याप्त विचारधारा में डेमोक्रेसी, स्त्री-पुरुष समानता एवं समलैंगिक सम्बन्धो का अभी कोई महत्त्व नहीं है।

कहा जाता है कि इन क्षेत्रो का नया नेतृत्व “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय” के शक्तिशाली बिज़नेस इंटरेस्ट से हाथ मिला लेता है और संसाधनों का दोहन अपने तथा “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय” के लाभ के लिए करना शुरू कर देता है। जनता वहीं की वही या पहले से अधिक निर्धन एवं असुरक्षित हो जाती है।

अब आते है सीरिया पर। आने वाले समय में इस देश में जो भी हो, वहां के निवासी भारत की ओर पलायन नहीं करेंगे। वहां की अस्थिरता का भारत पर नगण्य प्रभाव पड़ेगा। भारत एक इंटरेस्ट-बेस्ड या राष्ट्रीय हित पर आधारित नीति अपनाना जारी रखेगा।

यही स्थिति भारत के पडोसी क्षेत्र में होने वाली है जहाँ “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय” के उकसाने पर सत्ता परिवर्तन हुआ है।

अंत में, एक प्रश्न उठता है – कि अपने राष्ट्र में “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय” को हस्तक्षेप द्वारा सत्ता परिवर्तन अलाउ ही क्यों करना चाहिए?

उत्तर यह है कि अगर शासक दमनकारी नीतियों द्वारा जनआंदोलन (चाहे वह कितना भी फर्जी हो या कितना भी विकृत हो – उदाहरण के लिए, महिलाओ के अधिकारों को कुचलने के लिए choice के नाम पर एक समुदाय द्वारा किया जाने वाला आंदोलन) को कुचलने का प्रयास करेगा, तो आप ऐसे विदेशी हस्तक्षेप को नहीं रोक सकते है। कारण यह है कि गंडोस जैसे लोग ऐसे हस्तक्षेप को बढ़ावा देगा, उनका स्वागत करेगा।

तभी मैं मोदी सरकार का ऐसे आन्दोलनजीवियों से शांतिपूर्ण तरीके से निपटने का समर्थन करता आया हूँ। तभी मोदी सरकार ने 370 हटाने के बाद वहां कई माह तक कड़ा कर्फ्यू लगाया था, फोन-इंटरनेट बंद कर दिया था।

तभी मैं पूर्व में कई बार लिख चुका हूँ कि अभिजात वर्ग ने प्रधानमंत्री मोदी से निपटने के लिए झूठ, छल, कपट, और हिंसा का सहारा ले रहा है। भारत में हिंसा भड़काने के लिए अभिजात वर्ग (इसमें विदेशी माफिया भी शामिल है) अलगाववादी तत्वों, कट्टरपंथियों, नक्सलियों, घुसपैठियों और अपराधियों का उपयोग कर रहा है।

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(लेखक रिटायर्ड IRS ऑफिसर हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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