लेखक-अरविंद जयतिलक
‘द लैसेट’ मैगजीन का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि दुनिया भर में 2023 में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के एक अरब से अधिक लोगों ने बचपन में यौन हिंसा का सामना किया है। मैगजीन के मुताबिक तकरीबन 60.8 करोड़ महिलाएं अपने साथी की ओर से की गई हिंसा का शिकार हुई हैं और सब-सहारा अफ्रीका और साउथ एशिया में यौन हिंसा की दर सर्वाधिक है। मैगजीन के मुताबिक भारत में अंतरंग साथी द्वारा की गई हिंसा की शिकार महिलाओं की दर 23 प्रतिशत है। मैगजीन में यह भी खुलासा किया गया है कि 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की 30 प्रतिशत से अधिक महिलाओं और 15 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 13 प्रतिशत पुरुषों ने बचपन में यौन हिंसा झेली है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब इस तरह का मामला सामने आया है। भारत की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक बच्चों के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है। भारत, नेपाल और श्रीलंका के प्रतिनिधि सर्वेक्षण आंकडे बताते हैं कि इन तीनों देश में लगभग आठ में से एक बच्चा यानि 12.5 प्रतिशत 18 वर्ष की आयु पूरा होने तक यौन उत्पीड़न अथवा बलात्कार की शिकायत करवाता है। दक्षिण एशिया में 2024 में बाल यौन शोषण सामग्री की अधिकतर शिकायतें भारत, बांगलादेश और पाकिस्तान में दर्ज की गई। इनमें अकेले भारत में 22.5 लाख मामले दर्ज किए गए। भारत में 2017 और 2022 के बीच पाक्सो कानून के तहत बच्चों के खिलाफ दर्ज यौन अपराधों में वृद्धि के संकेत हैं। हालांकि बढ़ती संख्या के बावजूद अभियोजन दर 90 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है जो मजबूत प्रवर्तन एवं रिपोर्टिंग तंत्र का संकेत है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इन सबके बावजूद यौन शोषण मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है और गुनाहगार सजा से बच निकल जा रहे हैं। याद होगा कि गत वर्ष पहले कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन ने खुलासा किया था कि यौन शोषण के शिकार बच्चों में से औसतन चार को प्रतिदिन न्याय नहीं मिल रहा है। फाउंडेशन के मुताबिक पोक्सो के तहत दर्ज हजारों मामले जांच के बाद भी न्यायालय तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जिससे प्रतिदिन चार पीड़ित बच्चों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। चूंकि ज्यादतर पीड़ित कमजोर तबके से आते हैं लिहाजा उनकी पैरवी ठीक ढंग से नहीं हो पाती। ऐसे में सुबूतों के अभाव में उनके केस बंद कर दिए जाते हैं। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने देश में बच्चों से दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं को रोकने और ऐसे मामलों की जल्द जांच और ट्रायल सुनिश्वित करने के लिए विशेष जिला अदालतें बनाने का निर्देश दिया था। तब अदालत ने कहा था कि जिन जिलों में पोक्सो में 100 से ज्यादा मामले दर्ज हैं ऐसे हर जिले में बाल यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून यानी पोक्सो के तहत विशेष अदालत गठित की जाए। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा था कि दो महीने के भीतर विशेष अदालतों को गठित करने का समय तय किया जाए। ये अदालतें सिर्फ पोक्सो के मुकदमें सुनेगी और अदालतों के गठन का पूरा खर्च केंद्र सरकार द्वारा उठाया जाएगा। बच्चों का यौन उत्पीड़न न हो इसके लिए अदालत ने जागरुकता कार्यक्रम शुरु करने का भी निर्देश दिया था। लेकिन बिडंबना है कि इसके बावजूद भी बच्चों का यौन शोषण थमने का नाम नहीं ले रहा। गत वर्ष पहले तत्तकालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने बच्चों से बढ़ती दुष्कर्म की घटनाओं पर अखबारों और पोर्टल की रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले को जनहित याचिका में तब्दील करते हुए न्यायालय की मदद के लिए वरिष्ठ वकील वी गिरी को अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया था। तब उम्मीद किया गया था कि शायद सर्वोच्च अदालत की इस सक्रियता से दुष्कर्म से जुड़े लंबित मामले निपटाने में मदद मिलेगी। लेकिन इस दिशा में अभी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। जबकि पोक्सो के तहत बच्चों का यौन शोषण करने वाले दोषियों को 20 साल कैद से लेकर मौत तक की कड़ी सजा के प्रावधान है। लेकिन इसके बावजूद भी दोषी दंड से बच निकल जा रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर 6 घंटे में एक बच्चे के साथ दुष्कर्म होता है। गत वर्ष पहले दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए ही सर्वोच्च अदालत को कहना पड़ा था कि देश में ‘लेफ्ट, राइट, सेंटर’ सब जगह दुष्कर्म हो रहे हैं। तब सर्वोच्च अदालत ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संरक्षण गृहों में यौन उत्पीड़न की घटनाएं रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों की भी जानकारी मांगी थी। किसी से छिपा नहीं है कि देश के कई राज्यों में संरक्षण गृहों से यौन उत्पीड़न की घटनाएं सूर्खियां बटोर चुकी हैं। यहां ध्यान देना होगा कि बच्चे-बच्चियां सिर्फ कार्यस्थलों, संरक्षणगृहों, सड़कों, स्कूलों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं हैं बल्कि अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो रिश्तेदारों द्वारा यौन उत्पीड़न किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 प्रतिशत मामलों में बच्चे दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं लेकिन उसके खिलाफ अपना मुंह खोलने से डरते हैं। शायद उन्हें भरोसा ही नहीं होता कि कानून इन गुनाहगारों की गर्दन दबोच पाएगा। बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाओं को देखते हुए गत वर्ष पहले महिला अधिवक्ता एसोसिएशन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर मांग की गयी थी कि शीर्ष कोर्ट कानून मंत्रालय को निर्देश दे कि बच्चों से दुष्कर्म करने के दोषियों को नपुंसक बना दिया जाए। गौर करें तो दुनिया के कई देशों मसलन रुस, पोलैंड, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, यूएस, न्यूजीलैंड और अर्जेंटीन में बच्चों से रेप करने वालों को नपुंसक बनाने का प्रावधान है। याचिका में आग्रह किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ‘पेरेंस पेट्रिया’ क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर अभिभावक के रुप में बच्चों के मानवाधिकार का संरक्षण करे जिनके साथ आए दिन यौन दुर्व्यवहार हो रहा है। महिला अधिवक्ता एसोसिएशन ने मांग की थी कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण का 2012 में लाया गया कानून में बदलाव किया जाए क्योंकि यह नाबालिग बच्चों को यौन दुष्कर्म से बचाने में विफल साबित हो रहा है। तब महिला अधिवक्ता एसोसिएशन ने एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि देश में हर 30 मिनट में एक बच्चे के साथ यौन दुर्व्यवहार हो रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि बच्चे शिक्षा के मंदिरों में भी सुरक्षित नहीं हैं। यह सच्चाई हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद को हिला देने वाली है। रिपोर्ट पर विश्वास करें तो स्कूलों में बच्चों को जबरन अंग दिखाने के लिए बाध्य किया जाता है। उनके नग्न चित्र लिए जाते हैं। दुषित मनोवृत्ति वाले शिक्षकों द्वारा बच्चों को अश्लील सामग्री दिखायी जाती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि शिक्षण संस्थाओं में बढ़ रहा यौन शोषण समाज को विखंडित कर सकता है। यह स्थिति समाज को शर्मिंदा करने वाले हैं। स्कूलों के अलावा अन्य स्थलों पर मसलन दुकानों, सिनेमाहालों एवं अन्य कारोबारों में जुड़े मामलों में भी बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं लगातार देखने-सुनने को मिल रही हैं। बच्चों के अपहरण की घटनाएं भी बेहद चिंतित करने वाली है। अपहरण किए जा रहे अधिकतर बच्चों का इस्तेमाल बाल मजदूरी और देह व्यापार जैसे धंधों में किया जा रहा है। यही नहीं माफिया तत्व अत्यंत सुनियोजित तरीके से बच्चों का इस्तेमाल हथियारों की तस्करी और मादक पदार्थों की सप्लाई में कर रहे हैं। आतंकवाद और नक्सलवाद से जूझ रहे भारत के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक है। उचित होगा कि सरकार और न्यायतंत्र दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दे तथा साथ ही समाज, स्कूल और स्वयंसेवी संगठन भी समाज को गढ़ने और नैतिक जागरुकता विकसित करने के अपने उत्तरदायित्व का भलीभांति निर्वहन करे।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




