लेखक:मनोज श्रीवास्तव
प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का प्रकरण जिस तरह से उलझा उस पर हिन्दू समाज, संत-महंत दो भागों में बंट गये। अंततः अविमुक्तेश्वरानंद जी बिना स्नान के प्रयागराज से वापस चले गये। पहले भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी और उनके गुरुदेव स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी बहुसंख्यक संत-मँहन्थों से अलग रहते थे।बताते हैं कि राम मंदिर आंदोलन हो, श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा या काशी विश्वनाथ मंदिर पर मुगलों द्वारा सनातन धर्म और उनके ईष्ट देवों के अपमान की नीयत से स्थापित मस्जिदों को हटा कर मंदिर निर्माण करने या उस स्थान को बहुसंख्यक हिन्दू समाज को सौंपने की बात पर भी कभी मुखर होकर हिन्दू समाज व श्रद्धालुओं के साथ खड़ा नहीं हुआ। जिसको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसके अनुषांगिक खून-पसीना बहा कर जीवंत किये। 22 सितंबर 2015 को काशी में अखिलेश यादव के सरकार में अविमुक्तेश्वरानंद जी की पुलिस ने जैसी पिटाई किया वैसी तो चोर-डाकू-गुंडा व हत्यारों की भी नहीं होती है। हिंदुओं के बहुत बड़े वर्ग के अनुसार 30 अक्टूबर 1990 व 2 नवंबर 1990 को अयोध्या जी में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने जो नरसंहार किया वह युगों-युगों तक उन पर कलंक बन कर चिपक गया। उसको संविधान की रक्षा में उठाया गया कदम बताने वाले संभल में उपद्रवियों द्वारा पुलिस पर हमले के बाद जवाबी कार्यवाई में मारे गये लोगों में निर्दोष युवकों की हत्या बता कर उनके परिजनों को दस-दस लाख रुपये की सहायता पहुंचाते हैं। प्रयागराज में शंकराचार्य के शिष्यों के साथ हुई घटना पर वह लोग आज सवाल खड़ा करते हुये कह रहे हैं कि कुछ लोग जो सत्ता के घमंड में बैठे हैं वह साधु-संतों का अपमान करते हैं और माफी तक नहीं मांगते। जब हरिद्वार में कुंभ लगा सुर अखिलेश यादव उस दौरान हरिद्वार गये तब 12 अप्रैल 2021 को अखिलेश यादव ने उनके आश्रम में जाकर उनके गुरु जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती व उनसे माफी मांगी थी। उसके बाद शंकराचार्य जी व अविमुक्तेश्वरानंद जी उन्हें क्षमा कर देते हैं। सपा सांसद अफजाल अंसारी जो इस दौरान कौमी एकता दल के अध्यक्ष हुआ करते थे वह प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बता रहे हैं कि अखिलेश जी कितने महान हैं। बता दें कि जिस समय अखिलेश यादव 2012 से 2017 तक मुख्यमंत्री थे तब तक अंसारी परिवार सपा में फटक नहीं पाया था। 21 जून 2016 को शिवपाल यादव की मौजूदगी में कौमी एकता दल का समाजवादी के मुख्यालय पर सपा में विलय हो गया। लेकिन 25 जून को अखिलेश यादव ने पार्टी के पार्लियामेंट बोर्ड की बैठक में इस विलय को नामंजूर कर दिया था। उसके बाद 26 जनवरी 2017 को अंसारी वन्धुओं ने मायावती के दरवाजे पर जाकर नंगे पांव कौमी एकता दल बसपा में विलय किया था। लेकिन अखिलेश यादव ने शंकराचार्य की घटना इनको बताये थे। कांग्रेसी अलग छाती पीट रहे हैं कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ दुर्व्यवहार हुआ। बता दें कि 11 नवंबर 2004 में कांची कामकोटि पीठम के 69 वें पूज्य जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती को त्रिकाल पूजा से उठा कर गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसी मामले में वह निर्दोष साबित हुये। तब कांग्रेसी कहाँ थे। इस मामले को लेकर कहा जाता है कि तत्कालीन यूपीए चेयरमैन सोनिया गांधी ईसाई मिशनरियों के साथ मिल कर और तत्कालीन तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता (जिनकी सहेली शशिकला जो पीठ की जमीन पर जबर्दस्ती कब्जा करना चाहती थी) ने मिल कर शंकराचार्य जी के विरुद्ध षड्यंत्र रचा था। इससे पहले गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर 7 नवंबर 1966 में गोपाष्टमी के दिन दिल्ली में संसद घेरने गये हजारो साधु-संतों को जो गोरक्षा आंदोलन को कुचलने की नीयत से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इशारे पर गोलियां वर्षा कर हत्या की गयी थी। हिन्दू संगठनों के अनुसार उस घटना में 5 हजार साधु मारे गये थे।लेकिन इंदिरा गांधी की पुलिस ने सरकारी अभिलेखों में 7-8 मौतों की मौत होने की बात दर्ज की थी। बताते हैं कि साधु-संतों के शव देख कर पूज्य करपात्री जी महाराज ने इंदिरा गांधी को शाप देते हुये कहा था कि “जैसे तुमने साधु-संतों पर गोलियां चलवाई है वैसे ही एक दिन तुम्हारा भी अंत होगा। संयोग से 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री रहते हुये इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने गोलियों से भून कर हत्या कर दी। तब भी कांग्रेसी मुंह में दही जमा लिये थे। आज वह छाती पीट रहे हैं कि संतों से पुलिस ने दुर्व्यवहार किया। मैं किसी भी तरह किसी भी संत के साथ पुलिस के अपमानजनक व्यवहार का समर्थक नहीं हूं, लेकिन दोहरा मापदंड मुझे एकदम स्वीकार नहीं है। फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपेक्षा है कि मन की बात की अगली कड़ी प्रसारित होने से पहले विभिन्न मुद्दों पर देश में बढ़ती वैमनस्यता और बिगड़ते सौहार्द को लेकर वह सौहार्दपूर्ण परिवेश में सजग और शख्त कदम उठा कर समाज का द्वंद दूर करे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




