लेखक:संजय राय
हर समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, ऊंची इमारतों या आधुनिक तकनीक से नहीं होती। किसी समाज का वास्तविक चरित्र इस बात से तय होता है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे असहाय और सबसे वृद्ध लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिस समाज में माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च धर्म माना गया हो, वहां यदि किसी पिता का अंतिम संस्कार वीडियो कॉल पर कराया जाए और उसकी संतानें अस्थियां लेने तक न पहुंचें, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं रहती; यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाती है।
सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने वाले 74 वर्षीय शिवचरण रामरत्न गुप्ता की कहानी इसी पीड़ा का प्रतीक है। कभी मुंबई के प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारियों में गिने जाने वाले शिवचरण जीवन के अंतिम वर्षों में वृद्धाश्रम की चारदीवारी तक सीमित हो गए। पत्नी पहले ही उनका साथ छोड़ चुकी थीं। अंततः मृत्यु के बाद उनकी बेटियों ने दूरी और समय का हवाला देते हुए अंतिम संस्कार में आने से असमर्थता जताई। उन्होंने ऑनलाइन कुछ धन भेजा और वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखने की इच्छा जताई। इतना ही नहीं, अस्थियां लेने आने को लेकर भी कोई निश्चितता नहीं दिखाई।
यह घटना केवल इसलिए विचलित नहीं करती कि बेटियां अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचीं। इससे भी अधिक पीड़ादायक यह है कि रिश्तों की आत्मीयता एक मोबाइल स्क्रीन तक सीमित होती दिखाई दी। जिस पिता ने बेटियों को पढ़ाया-लिखाया, उनका भविष्य संवारने का प्रयास किया, उसी पिता की अंतिम यात्रा में उनका शारीरिक रूप से उपस्थित न होना हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक विडंबनाओं में से एक है।
मुझे बचपन के वे दिन याद आते हैं, जब गांव में किसी व्यक्ति के निधन की सूचना मिलते ही पूरे गांव का वातावरण बदल जाता था। हर घर से कोई न कोई व्यक्ति सूखी लकड़ी का एक बोटा लेकर मृतक के घर पहुंचता था। किसी ने यह नहीं पूछा कि मृतक उसका कितना निकट संबंधी था। मृत्यु पूरे गांव का दुःख बन जाती थी। “राम नाम सत्य है” के उद्घोष के साथ पूरी शवयात्रा श्मशान तक जाती थी। अंतिम संस्कार के बाद स्नान, शुद्धि, दसवें और तेरहवीं तक समाज मृतक परिवार के साथ खड़ा रहता था। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं थी, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना का जीवंत स्वरूप था।
आज समय बदल गया है। महानगरों का विस्तार हुआ, परिवार छोटे होते गए, रोजगार की मजबूरियां बढ़ीं और जीवन की गति तेज हो गई। आधुनिक जीवन ने अनेक सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसी के साथ रिश्तों के बीच दूरी भी बढ़ी है। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली। आर्थिक सफलता जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बनती चली गई। परिणाम यह हुआ कि परिवारों में साथ रहने की परंपरा कमजोर पड़ने लगी।
निस्संदेह हर परिस्थिति को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। कई बार स्वास्थ्य, विदेश में निवास, कानूनी या अन्य व्यावहारिक कारणों से अंतिम संस्कार में पहुंच पाना संभव नहीं होता। ऐसे मामलों में वीडियो कॉल या डिजिटल माध्यम आवश्यकता का साधन बन सकते हैं। इसलिए किसी भी घटना के आधार पर बिना पूरी पृष्ठभूमि जाने किसी व्यक्ति या परिवार पर नैतिक निर्णय देना उचित नहीं होगा। किंतु जब ऐसी घटनाएं लगातार सामने आने लगें और वृद्धाश्रमों में रहने वाले अनेक बुजुर्ग अपने ही परिवार से उपेक्षित मिलें, तब यह व्यापक सामाजिक चिंता का विषय अवश्य बन जाता है।
विडंबना यह भी है कि जिस समाज में वृद्धों को देवतुल्य माना गया, वहीं आज अनेक वृद्धाश्रम ऐसे माता-पिता से भरे पड़े हैं जिनके बच्चे आर्थिक रूप से संपन्न हैं। माता-पिता ने अपने बच्चों को श्रेष्ठ शिक्षा, सुविधाएं और संस्कार देने में जीवन लगा दिया, लेकिन वृद्धावस्था में वही माता-पिता अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। आर्थिक प्रगति ने जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाया है, किंतु क्या उसने मनुष्य को अधिक संवेदनशील भी बनाया है? यह प्रश्न आज पहले से अधिक प्रासंगिक है।
सोनीपत की घटना का एक दूसरा पक्ष भी उतना ही प्रेरणादायक है। शिवचरण ने जीवन रहते हुए नेत्रदान का संकल्प लिया था। मृत्यु के बाद उनकी आंखों ने दो अन्य लोगों के जीवन में प्रकाश पहुंचाने का मार्ग बनाया। यह बताता है कि जीवन की अंतिम घड़ी में भी मनुष्य दूसरों के लिए आशा का स्रोत बन सकता है। वहीं वृद्धाश्रम के संचालकों और समाजसेवियों ने जिस श्रद्धा के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया, वह यह विश्वास भी जगाता है कि संवेदनाएं अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो रक्त संबंध न होने पर भी मानवीय रिश्तों का धर्म निभा रहे हैं।
दिल्ली के एक प्रमुख समाचार पत्र समूह के स्वामी द्वारा वर्षों से हरिद्वार में लावारिस अस्थियों का सम्मानपूर्वक विसर्जन कराए जाने का कार्य भी इसी मानवीय संवेदना का उदाहरण है। श्मशान घाटों पर पड़ी उन अस्थियों में अनेक संपन्न और प्रतिष्ठित लोगों की भी होती हैं। यह दृश्य हमें एक गहरा संदेश देता है कि धन, वैभव, प्रतिष्ठा और सफलता सब यहीं रह जाते हैं। अंततः मनुष्य अपने पीछे केवल अपने कर्म, अपने संस्कार और लोगों के हृदय में छोड़ी गई स्मृतियां छोड़कर जाता है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” का संदेश दिया है। यह केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का आधार है। माता-पिता का सम्मान केवल उनके जीवित रहते हुए सेवा करने तक सीमित नहीं है; उनकी अंतिम विदाई भी उतनी ही श्रद्धा, गरिमा और कृतज्ञता से होनी चाहिए। अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के प्रति अंतिम सम्मान और जीवनभर के ऋण को स्वीकार करने का प्रतीक है।
आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं है। माता-पिता के भरण-पोषण संबंधी कानून पहले से मौजूद हैं। आवश्यकता है परिवारों में संवाद बढ़ाने की, बच्चों में बचपन से संस्कार विकसित करने की, विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को व्यवहारिक रूप देने की और समाज में बुजुर्गों के सम्मान की संस्कृति को पुनर्जीवित करने की। यदि अगली पीढ़ी यह समझ सके कि माता-पिता की सेवा कोई बोझ नहीं बल्कि सौभाग्य है, तभी इस प्रकार की घटनाओं में कमी आएगी।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिकता और संस्कार परस्पर विरोधी नहीं हैं। तकनीक का उपयोग जीवन को सरल बनाने के लिए होना चाहिए, रिश्तों का विकल्प बनने के लिए नहीं। वीडियो कॉल दूर बैठे परिजनों को जोड़ सकती है, लेकिन वह किसी पिता के कंधे को सहारा देने, अंतिम बार चरण स्पर्श करने या मुखाग्नि देने के मानवीय स्पर्श का स्थान नहीं ले सकती।
सोनीपत की यह घटना केवल एक समाचार नहीं है। यह हमारे समय का दर्पण है। यह हमसे पूछती है कि क्या विकास की दौड़ में हम अपने सबसे मूलभूत मानवीय मूल्यों को पीछे छोड़ आए हैं? क्या आने वाली पीढ़ियां अपने बच्चों को केवल संपत्ति देंगी या संस्कार भी देंगी? क्या हम अपने माता-पिता के लिए समय निकाल पाएंगे या केवल डिजिटल माध्यमों के सहारे अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेंगे?
इन प्रश्नों के उत्तर किसी एक व्यक्ति या परिवार के पास नहीं हैं। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम सच में एक संवेदनशील, संतुलित और मानवीय समाज की कल्पना करते हैं, तो हमें अपने रिश्तों को फिर से जीवित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि जीवन की अंतिम यात्रा में उपस्थिति केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और सम्मान की सबसे गहरी अभिव्यक्ति है।
अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सभ्यता की असली परीक्षा उसकी ऊंची इमारतों या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने वृद्धों को कितना सम्मान, सुरक्षा और अपनापन दे पाती है। यदि हम अपने माता-पिता की अंतिम विदाई को भी स्क्रीन तक सीमित कर देंगे, तो फिर हमारे विकास का अर्थ केवल बाहरी चमक रह जाएगा, भीतर से हम धीरे-धीरे खाली होते जाएंगे।
इसलिए समय आ गया है कि हम रुककर सोचें, अपने रिश्तों को फिर से महसूस करें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में किसी भी शिवचरण की अंतिम यात्रा अकेलेपन की नहीं, बल्कि सम्मान, प्रेम और उपस्थिति की यात्रा बने। यही इस घटना से मिलने वाला सबसे बड़ा संदेश है, और यही एक संवेदनशील समाज की दिशा भी।

(लेखक आज अख़बार में नेशनल ब्यूरो हैं)





