लेखक: मनोज श्रीवास्तव
जिस आम को वह खट्टा कह रहे हैं, अखिलेश यादव खाये भी हैं क्या कभी?
गौरजीत आम उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल (विशेषकर गोरखपुर और बस्ती मंडल) की एक बेहद लोकप्रिय, अगेती और अत्यधिक सुगंधित आम की किस्म है।
गौरजीत आम के संदर्भ में जो सबसे प्रचलित घटना है वह ये कि “पहले इसका कोई नाम नहीं था। अंग्रेजों के समय में आम खाने की एक प्रतियोगिता हुई। उसमें इसे भी रखा गया। प्रतियोगिता में शामिल करने के लिए अंग्रेजों ने इसे गंवार नाम दिया था। निर्णायक मंडल के जब सभी लोग विभिन्न प्रकार के आम का स्वाद लिये और बहुत उपेक्षित भाव से गौरजीत भी खाया तो अन्य सभी आमों का स्वाद भूल गये। प्रतियोगिता में इसको पहला स्थान मिला और यह गौरजीत हो गया।” उसी गौरजीत को सपा मुखिया कह रहे हैं कि यह मीठा नहीं होता। एक बार खाने के बाद बोले होते तो भी कहा जाता कि खाने के बाद बोले, लेकिन उन्हें पूर्वांचल की बेज्जती करनी है।इस लिये उन्हीं अंग्रेजों की तरह पहले ही मत बना लिया।
गौरजीत आम की प्रमुख विशेषताएं
अगेती किस्म-यह बाजार में सबसे पहले पककर आने वाले आमों में से एक है, जो मई के अंत या जून के शुरुआती दिनों में तैयार हो जाता है।
प्राकृतिक रूप से पकना-यह देश के उन चुनिंदा आमों में है जिसे पकने के लिए किसी भी कृत्रिम रसायन या कार्बाइड की आवश्यकता नहीं होती। यह तोड़ने के दो दिन के भीतर प्राकृतिक रूप से पक जाता है।
अद्भुत खुशबू-इसकी भीनी और मदहोश करने वाली खुशबू इतनी तेज होती है कि यदि यह एक कमरे में रखा जाए तो पूरा कमरा महक उठता है।
चूसने वाला आम-दशहरी या चौसा की तरह इसे काटा नहीं जाता, बल्कि यह एक बेहतरीन ‘चूसने वाला’ आम कहा जाता है।हालांकि काट कर खाने में भी बहुत आनंद आता है। इसको खाने के बाद दूसरे आमों का स्वाद कोशों दूर छूट जाता है। दुनिया मे जितने भी आम खाने के शौकीन हैं यदि उनके हाथ एक बार गौरजीत आम लगा तो वह अन्य प्रजातियों को भूल गये। आम की बागवानी और किसानी करने वालों की मानें तो अल्प समय तक बाजार में रहने वाला गौरजीत जब तक उपलब्ध रहता है तब तक दूसरे आम दूर-दूर तक नहीं फटकते। इसके आने से आम किसानों की आर्थिक स्थिति में गुणात्मक सुधार हुआ है। कम स्थान और कम समय मे फल देने और सुंगन्ध विशेष के कारण हर वर्ष गौरजीत के बागवानी का क्षेत्रफल बढ़ रहा है।
आकार और रंग-यह औसत आकार का (देशी आम से थोड़ा बड़ा, लगभग 150 ग्राम का) होता है और पकने पर इसका आकर्षक पीला तथा हल्का लाल रंग दूर से ही लोगों को आकर्षित करता है।
उच्च मिठास और कीमत-इसमें मिठास बहुत अधिक होती है (इसलिए मधुमेह रोगियों के लिए यह उचित नहीं है) और बाजार में इसकी शुरुआती कीमत सामान्य आमों (जैसे दशहरी) से लगभग दोगुनी होती है।
यूं ही नहीं पंसद किया जाता गौरजीत
खाने के बाद हल्की डकार के साथ देर तक जीभ से लेकर मन-मस्तिष्क पर छाने वाल यह आम दुनिया का इकलौता ऐसा फल है, जिसकी अपने कुनबे में विशिष्ट पहचान है। फ्लेवर को लेकर, खाने के तरीके को लेकर, महक को लेकर। दशहरी व चौसा काटकर खाए जाने वाले आम हैं जबकि गौरजीत को चूस कर खाया जाता है। इस रूप में ही इसकी विशेष पूछ है। इसी खूबी के चलते पूर्वांचल के बागवान इसका सौदा करते हुए बड़े ही शान से कहते हैं कि वह आम भी क्या, जिसे चूस कर न खाया जा सके। वह दिन दूर नहीं जब घर-घर में गौरजीत की खुशबू बिखरेगी। उसके सहयोगी के तौर पर दशहरी और चौसा भी दुकानों पर बिकते नजर आएंगे।
पत्तों के साथ ही बिकता है गौरजीत
गौरजीत को पकाने के लिए किसी रसायन की आवश्यकता नहीं होती है। पूरब का सबसे पहले तैयार होने वाला आम है। जून के पहले सप्ताह से यह डालियों पर ही पकने लगता है। इसीलिए इसे दुकानदार इसे पत्तों के साथ बेचते हैं। आकर्षक पीले व हल्के लाल रंग और गोल आकार के चलते यह दूर से ही लोगों को लुभाता है। गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, महराजगंज, संतकबीनगर, देवरिया, कुशीनगर जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर तैयार होने वाले गौरजीत आम का सौदा बागवान बाग में ही कर देते हैं। उन्हें बिक्री के लिए परेशान नहीं होना पड़ता।
बस्ती में विकसित हुआ गौरजीत
संयुक्त निदेशक उद्यान बस्ती डा. अतुल सिंह का कहना है कि गौरजीत का स्वाद अल्फांसों या हापुस आम की तरह है। कुछ मामलों में यह उससे भी बेहतर है। अल्फांसों की कीमत दो सौ रुपये किलो होती हैं, जबकि गौरजीत मात्र चालीस रुपये में लोगों की पहुंच में होता है। इसकी उत्पत्ति गोरखपुर के ही किसी गांव से मानी जाती है। वर्ष 1958 से ही गौरजीत को बस्ती शोध केंद्र पर संकलित किया गया और उससे पौधे विकसित किए गए। इसलिए इसकी पहचान को बस्ती से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि पहले इसका कोई नाम नहीं था। अंग्रेजों के समय में आम खाने की एक प्रतियोगिता हुई। उसमें इसे भी रखा गया। प्रतियोगिता में शामिल करने के लिए अंग्रेजों ने इसे गंवार नाम दिया था। प्रतियोगिता में इसे पहला स्थान मिला और यह गौरजीत हो गया।”

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)




