लेखक -अरविंद जयतिलक
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा
सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने की पहल एक सुखद संकेत है। उल्लेखनीय है कि दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ ही सीमा तय करने की दिशा में आगे बढ़ने की पहल पर चर्चा की है। पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल चीन की यात्रा पर थे। उन्होंने कहा कि हम यहां बातचीत के 25 वें दौर के लिए उपस्थित हैं। मौंजू सवाल यह है कि क्या दोनों देशों की पहल से सीमा विवाद का हल निकलेगा? क्या दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव कम होगा? यह सवाल इसलिए कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की पहल कई बार हो चुकी है लेकिन कोई ठोस सार्थक परिणाम नहीं निकला। याद होगा 2020 में गलवान में हुई झड़प के बाद से ही दोनों देशों के बीच रिश्ते तल्ख और असहज हैं। तब गलवान घाटी में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय जवानों पर हमला दोनों देशों के रिश्ते को दुश्मनी और नफरत में बदल दिया था। इस हमले में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे वहीं चीन को भी अपने 43 जवानों की जिंदगी से हाथ धोना पड़ा था। इस हालात के लिए पूर्ण रुप से चीन ही जिम्मेदार था। अगर वह 1996 और 2005 में हुए समझौते का पालन किया होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा नहीं होती। गत वर्ष रुस में ब्रिक्स समिट से ठीक पहले भारत-चीन के बीच ईस्टर्न लद्दाख में एलएसी पर सहमति बनी और दोनों देशों ने इस पर सहमति जताई कि देपसांग और डेमचॉक क्षेत्र में जहां गश्त ब्लॉक है वहां सैनिक पीछे हटेंगे और गश्त फिर से शुरु होगी। कहना गलत नहीं होगा कि चीन के अडियल रुख से़ ईस्टर्न लद्दाख के पैगोग क्षेत्र, गलवान के पीपी-14, गोगरा और हॉटस्प्रिंग क्षेत्र में आज भी तनाव बरकरार है। नतीजतन यह क्षेत्र अभी भी बफर जोन बना हुआ है। कहा जा रहा है कि चीन सामरिक रुप से अहम पैंगोंग त्सो झील के निकट एक और नए पुल का निर्माण की योजना में है। उसकी मंशा इस पुल के जरिए अपने सामरिक हथियारों को आसानी से भारतीय सीमा तक पहुंचाना है। इसका खुलासा सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों से हो चुकी है। चीन की यह साजिश भारत के लिए चिंता का शबब इसलिए है कि यह पुल वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से महज 20 किलोमीटर दूर है। लेकिन अब च्ूंकि दोनों देशों के बीच रिश्तों में जमा बर्फ फिघल रहा है तो उम्मीद किया जाना चाहिए कि बहुत जल्द ही इस क्षेत्र में भी शांति बहाल होगी। गौर करें तो सीमा विवाद से दोनों देशों के बीच न सिर्फ तनाव की स्थिति उपजती है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचता है। फिलहाल कहना मुश्किल है यह बैठक दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने में मददगार होगा या चीन पुनः भारतीय भू-भाग को अतिक्रमित नहीं करेगा। यह इसलिए कि चीन वार्ता में दिलचस्पी तो दिखाता है लेकिन बेहतर परिणाम देने की दिशा में आगे नहीं बढ़ता। जब तक चीन साम्राज्यवादी मानसिकता की खोल से बाहर नहीं आएगा तब तक भारत-चीन सीमा विवाद सुलझने के आसार कम हैं। चीन की उदासीनता का ही नतीजा है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है। उसके असंवेदनशील रुख के कारण ही 1976 से चल रही बातचीत तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंची। 1993, 1996 और 2005 में दोनों देश कई बार सीमाओं के विभाजन के लिए वार्ता की लेकिन उसका सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। कारण वार्ता के दौरान चीन कभी भी दस्तावेजों के आदान-प्रदान में रुचि नहीं दिखाया। भारत के जिन क्षेत्रों पर उसका एक इंच भी दावा है उससे हटने का आज तक संकेत नहीं दिया। विडंबना यह भी कि वह मैकमोहन रेखा को भी स्वीकारने को तैयार नहीं। वह उसे अवैध बताता है। जबकि देश-दुनिया को अच्छी तरह पता है कि ब्रिटिश भारत और तिब्बत ने 1913 में शिमला समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रुप में मैकमोहन रेखा का निर्धारण किया। इस सीमा रेखा का निर्धारण हिमालय के सर्वोच्च शिखर तक है। समझना जरुरी है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलसी की वास्तविक स्थिति भी कमोवेश यही है। इस क्षेत्र में हिमालय प्राकृतिक सीमा का निर्धारण नहीं करता क्योंकि यहां से अनेक नदियां निकलती और सीमाओं को काटती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि दोनों देश एलसी पर निगरानी कर रहे हैं। ऐतिहासिक संदर्भों में जाए तो तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमाओं का ठीक से रेखांकन नहीं होने से अक्टुबर, 1913 में शिमला में अंग्रेजी सरकार की देखरेख में चारो देशों के अधिकारियों की बैठक हुई। इस बैठक में तिब्बती प्रतिनिधि ने स्वतंत्र देश के रुप में प्रतिनिधित्व किया और भारत की अंग्रेजी सरकार ने उसे उसी रुप में मान्यता दिया। आधुनिक देश के रुप में भारत के पूर्वोत्तर हिस्से की सीमाएं रेखांकित न होने के कारण दिसंबर 1913 में दूसरी बैठक शिमला में हुई और अंग्रेज प्रतिनिधि जनरल मैक मोहन ने तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमा को रेखांकित किया। समझना जरुरी है कि आज के अरुणाचल का तवांग क्षेत्र मैकमोहन द्वारा खींची गयी रेखा के दक्षिण में होता था। इसलिए तिब्बती सरकार बार-बार उस पर अपना दावा करती रही। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकारने से उत्तर से पूर्वोत्तर तक कहीं भी भारत और चीन की सीमा नहीं मिलती थी। इस तरह उत्तरी-पूर्वी सीमा को एक प्राकृतिक सुरक्षा मिली हुई थी। लेकिन स्वतंत्र भारत की नेहरु सरकार की अदूरदर्शी नीति ने स्वतंत्र तिब्बत को बलिदान हो जाने दिया। पीकिंग पर साम्यवादियों का कब्जा होने के उपरांत 23 मई, 1951 को तिब्बत के दलाई लामा सरकार के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के अधिकारियों के बीच 17 सूत्रीय कार्यक्रम पर समझौता हुआ। इस समझौते को दलाई लामा तिब्बत के स्वतंत्र अस्तित्व की समाप्ति के रुप में देखते हुए भारत से रक्षा की गुहार लगायी। लेकिन तत्कालीन नेहरु सरकार पर चीन के साथ दोस्ती का भूत सवार था और उन्होंने अंग्रेजी दस्तावेजों का हवाला देकर तिब्बत पर चीन की अधिनस्थता की बात स्वीकार ली। नतीजा माओ के रेडगार्डों ने तिब्बत पर चढ़ाई कर एक वर्ष के अंदर पूरे तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। आज की तारीख में सिक्किम-तिब्बत सीमा को छोड़कर लगभग संपूर्ण भारत-चीन सीमा विवादित है। भारत और चीन के बीच विवाद की वजह अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश की संप्रभुता भी है। पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चिन का लगभग 3800 वर्ग किमी भू-भाग चीन के कब्जे में है। अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व में विशाल निर्जन इलाका है। इस क्षेत्र पर भारत का अपना दावा है। लेकिन नियंत्रण चीन का है। दूसरी ओर पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी पर अपना दावा कर उसे अपना मानता है। वह अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भी भारतीय सांसद को वीजा नहीं देता है। याद होगा गत वर्ष पहले उसने प्रस्ताव रखा था कि भारत अगर अरुणाचल के तवांग इलाके को चीन को सौंप देता है तो वह भी बदले में उसे अक्साई चीन का इलाका दे सकता है। लेकिन भारत ने उसके इस साजिश भरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया। भारत की मनाही के बावजूद भी वह कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी करता है। साथ ही पाकिस्तान से गलबहिया कर वह भारतीय संप्रभुता को चुनौती परोस रहा है। भारत को चीन पर दबाव बनाने के लिए तिब्बत के मसले पर अपना कड़ा रुख अख्तियार करना होगा। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व ही भारत की सीमाओं की रक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। अगर भारत तिब्बत की स्वतंत्रता और मानवाधिकार हनन के मसले को अन्तरराष्ट्रीय कुटनीति की तीव्र आंच पर रखता है तो सच मानिए चीन की पेशानी पर बल आना तय है। तिब्बत की स्वतंत्रता चीन की कमजोर नस है और भारत इसे मानवाधिकार हनन का नश्तर बनाकर चीन की हेंकड़ी का सफल ऑपरेशन कर सकता है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)





