लेखक –सुधांशु सिन्हा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2022 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए सन् 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प देशवासियों के समाने रखा था। इसके तहत 2047 तक आर्थिक, सामाजिक और तकनीकि क्षेत्र में भारत को दुनिया के अग्रणी देशों की पंक्ति में शामिल करने का लक्ष्य प्राप्त करना है। अपनी विशिष्ट कार्यशैली के लिए जाने जानेवाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसी दिन से इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं।
1 सितंबर 2026 (मंगलवार) को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट के दौरान किर्गिस्तान के बिश्केक से जारी एक वीडियो संदेश के माध्यम से प्रधानमंत्री ने भारतीयों से अपील किया कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसीत राष्ट्र बनाना के लिए हम भारतीयों को गैर जरूरी विदेश यात्राओं, विदेश में आयोजित की जानेवाली शादियों, अति आवश्यक न होने पर सोने की खरीददारी आदि से परहेज करना होगा। इस वीडियो का अवसर था, भारत का शानदार जीडीपी ग्रोथ। इससे पहले ऐसा ही एक आह्वान उन्होंने 10 मई 2026 को हैदराबाद की एक सार्वजनिक सभा में किया था जिसमें उन्होंने इसके अलावा चार और परहेज की अपील की थी। आखिर ऐसा क्यों? अब प्रष्न यह उठता है कि क्या इन सब परहेजों से भारत विकसित राष्ट्र बन जाएगा। भारत को विकसीत राष्ट्र बनने में ये ही अड़चनें आ रही हैं। जी नहीं, ऐसी बात नहीं है, इसके पीछे की मंशाको भारत के हर नागरिक को गहराई से समझना होगा।
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत 7.8ः की शानदार जीडीपी ग्रोथ के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक बना हुआ है। तथा सितंबर 2026 को जारी भारतीय रिज़र्व बैंक के अद्यतन आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $729.33 अरब डॉलर के ऐतिहासिक उच्चतम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। जो भारतीय अर्थव्यवस्था की असाधारण मजबूती और वैश्विक स्थिरता का द्योतक है। इस विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (FCA) लगभग $591.33 अरब डॉलर (यह कुल जमा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा है, जिसमें डॉलर, यूरो और पाउंड शामिल हैं), स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) लगभग $114.22 अरब डॉलर, एसडीआर (SDR) और आईएमएफ कोटा लगभग $23.75 अरब डॉलर है।
वर्तमान में विश्व के सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार धारक देशों की सूची में चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद भारत दुनिया के चौथे स्थान पर है। जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई सबसे सुरक्षित प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी बना दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के गति की वर्तमान रफ्तार यदि बरकरार रह जाती है तो वर्ष 2047 तक इसे विकसित राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।
किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार उसकी अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच और ठोस वित्तीय ताकत होता है। जो देश के आयात, घरेलू मुद्रा की स्थिरता और वैश्विक कारोबार को प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित एवं प्रभावित करता है, क्योंकि ये सारे कारोबार विदेशी मुद्रा में ही किए जाते हैं। जब कभी भी किसी देश की घरेलू मुद्रा की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरने लगती है, तो उस देश के केंद्रीय बैंक (जैसे भारत में RBI) बाजार में विदेशी मुद्रा को बेचकर अपने देश की मुद्रा की गिरावट को रोकते हैं। यही नहीं युद्ध, वैश्विक मंदी या महामारी जैसे गंभीर आर्थिक संकट के समय जब विदेशी निवेशक अपना पैसा देश से वापस निकालने लगते हैं, तब देश का पहले से संचित यही भंडार एक मददगार (Crisis Management) के रूप में देश को दिवालिया होने से बचाता है। किसी भी देश का बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार देश की मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत है जिसपर भरोसा करके विदेशी निवेशक उस देश में निवेश करने में रूचि ही नहीं प्रतिस्पर्धा दिखाते है तथा देश का विदेशी निवेश (FDI) बढ़ता है। इस विदेशी निवेश से देश की अर्थव्यवस्था तो मजबूत होती ही है, विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़ता है।
विदेश यात्रा, विदेश में शादी का आयोजन, सोने के गैर जरूरत खरीददारी से परहेज प्रधानमंत्री का आह्वान, भारत को वर्ष 2047 तक एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य पूर्ति के रोड मैप का एक हिस्सा है। इसके तहत भारत के अर्थव्यवस्था का लक्ष्य वर्तमान स्थिति से बढ़ाकर $30 ट्रिलियन (30 लाख करोड़ डॉलर) की अर्थव्यवस्था बनाने और देश के प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) को लगभग $18,000 तक पहुंचाने का है।
इस आह्वान से प्रधानमंत्री की सोच विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के साथ-साथ इसे और बढ़ाने की भी है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना, कच्चा तेल, खाद्य तेल का अधिकांष हिस्सा, केमिकल फर्टिलाइजर का बड़ा हिस्सा आदि विदेशों से आयात करता है। जिसमें देश का संचित कीमती विदेशी मुद्रा भंडार बाहर चला जाता है। इसीलिए 10 मई, 2026 के अपने आह्वान में प्रधानमंत्री ने उपरोक्त के अलावा ईंधन की बचत, स्वदेशी और लोकल फॉर वोकल को प्राथमिकता, खाद्य तेल का कम उपयोग, केमिकल फर्टिलाइजर में कटौती की भी अपील की थी।
अभी पश्चिमी एशिया में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक व्यापार में भारत द्वारा आयात किये जाने वाले सामानों और कच्चे तेल आदि की कीमतें आसमान पर हैं। सरकार का लक्ष्य है कि गैर-जरूरी खर्चों को रोककर देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत रखा जाए जिससे गंभीर ग्लोबल आर्थिक संकट के समय उत्पन्न आकस्मिक विषम परिस्थितियों से आसानी निपटा जा सके। ‘‘अग्रसोची सदा सुखी‘‘। भारत में सोने के घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। सोना आयात करने पर भुगतान के लिए विदेशी मुद्रा की आवश्यकता पड़ती है। अगर ध्यान दें तो वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों (अप्रैल-जुलाई) में भारत का सोना आयात 32.4% बढ़कर करीब $15.17 बिलियन (₹1.43 लाख करोड़ से अधिक) हो गया था। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार इस तिमाही में ही सोने की मांग 131 टन रही जिसपर 1.98 लाख करोड़ रूपये खर्च हुए, इस तरह सोने की आपूर्ति हेतु आयात की हिस्सेदारी लगभग 82% रही। यदि भारतीय इसपर अंकुश लगा लेते हैं (जो की दृढ़ संकल्प से सम्भव है), तो काफी हद तक सरकार अपने विदेशी मुद्रा भंडार के एक बड़े हिस्से को संचित कर पाने में सफल हो सकती है।
भारत का यह विशाल मुद्रा भंडार वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होने या किसी युद्ध जैसी स्थिति में भी 7-8 महीनों से अधिक समय तक बिना किसी रुकावट के ईंधन और जरूरी सामानों का आयात कर सकता है। वैश्विक मंदी और आकस्मिक संकटों की स्थिति में भारत का यह रिकॉर्ड भंडार वैश्विक निवेशकों (FPI/FDI) को यह भरोसा दिलाता है कि भारतीय बाजार पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर हैं। हालांकि भंडार ऐतिहासिक स्तर पर है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR-B) जमाओं और अल्पकालिक विदेशी फंडों से आया है, जिन्हें अगले 3 से 5 वर्षों में परिपक्व होने पर चुकाना होगा। इसलिए इस फंड का प्रबंधन पूरी कुषलता से करना होगा ताकि भविष्य में अचानक होने वाली विदेशी पूंजी की निकासी से घरेलु मुद्रा में अस्थिरता न आए।
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल सरकार की नीतियों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए सरकार, उद्योग, किसान, कामगार, युवा और देश के सामान्य नागरिक सभी की आर्थिक भागीदारी आवश्यक होगी। क्या केवल विदेश यात्रा रोक देने और सोना न खरीदने से भारत विकसित राष्ट्र नहीं बनेगा। इस अपील के पीछे एक व्यापक आर्थिक सोच है-देश की इस रिकार्ड स्तरीय विदेशी मुद्रा को अनावश्यक आयात और उपभोग में खर्च करने के बजाय उत्पादन, निवेश और रोजगार पैदा करने वाली गतिविधियों की ओर मोड़ना।
जब कोई भारतीय विदेशों में छुट्टियां मनाता है तो हवाई यात्रा, होटल, भोजन, मनोरंजन, खरीदारी आदि पर किया गया खर्च और विदेश में विवाह आयोजित करने पर होटल, आयोजन कंपनियों, परिवहन और स्थानीय सेवाओं पर खर्च किया गया करोड़ों रुपया विदेशी अर्थव्यवस्थाओं को चला जाता है। जबकि भारत में किए गए पर्यटन और शादियों में खर्च किए गए ये पैसे भारतीय अर्थव्यवस्था में रहकर रोजगार और आय का चक्र बनाते हैं। यानी भारत का पैसा भारत में ही रहकर भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।
भारत को कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कुछ औद्योगिक कच्चा माल और सोना जैसे अनेक उत्पाद विदेशों से खरीदने पड़ते हैं। इनके भुगतान के लिए डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं की आवश्यकता होती है। आज भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में होने के बावजूद बाहरी क्षेत्र पर दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। RBI के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत का चालू खाता घाटा 4.2 अरब डॉलर, यानी GDP का लगभग 0.5 प्रतिशत रहा। इसी अवधि में merchandise trade dificit बढ़कर 86.1 अरब डॉलर हो गया। इसलिए विदेशी मुद्रा की बचत एवं विवेकपूर्ण उपयोग देश की आर्थिक समृद्धि हेतु महत्वपूर्ण है।
विदेश यात्रा अपने आप में खराब नहीं है। विदेश जाकर पढ़ना, व्यापार करना, नई तकनीक सीखना, अंतरराष्ट्रीय बाजार तलाशना या सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त करना भारत के लिए लाभदायक भी हो सकता है। स्वदेशी से तात्पर्य केवल देश में बनी वस्तु खरीदना नहीं बल्कि भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाना, भारतीय कंपनियों को विश्व स्तरीय बनाना, भारतीय युवाओं को रोजगार देना, भारतीय तकनीक को विकसित करना, भारतीय ब्रांड को दुनिया में पहुंचाना और भारत को वैश्विक उत्पादन एवं आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना, 2047 के समृद्ध भारत के संकल्प का विशिष्ट साधन है। अब वोकल फॉर लोकल का अगला चरण लोकल टू ग्लोबल करना पड़ेगा।
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए केवल विदेशी यात्रा कम करना पर्याप्त नहीं है। असली परिवर्तन तब होगा जब भारत कम आयात करे और अधिक उत्पादन करे, कम तैयार माल खरीदे और अधिक निर्माण करे, कम तकनीक आयात करे और अधिक तकनीक विकसित करे, कम रोजगार खोजे और अधिक रोजगार पैदा करे, कम कच्चा माल निर्यात करे और अधिक मूल्यवर्धित उत्पाद निर्यात करे। यही आत्मनिर्भरता और विकसित भारत का वास्तविक अर्थ है।
विकसित भारत तब बनेगा जब भारतीय समाज की आर्थिक ऊर्जा उपभोग से उत्पादन की ओर, दिखावे से निवेश की ओर, आयात से नवाचार की ओर, रोजगार मांगने से रोजगार देने की ओर, और स्थानीय बाजार से वैश्विक बाजार की ओर बढ़ेगी। और सबसे महत्वपूर्ण कि जो पैसा बचता है, उसे केवल बचाकर रखना नहीं बल्कि उसे भारत के उत्पादन, निवेश, कौशल, उद्योग और रोजगार में लगाना होगा। क्योंकि विकसित भारत केवल सरकार नहीं बनाएगी, विकसित भारत करोड़ों भारतीयों के रोजमर्रा के आर्थिक निर्णयों पर दृढ़ संकल्पित होकर पहल करने से बनेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




