लेखक :मंगला मिश्रा
कांग्रेस वंदे मातरम पर क्या राम मंदिर आंदोलन जैसा बुरी फंस गई है क्योंकिजिस तरह से कांग्रेस की सर्वेसर्वा मानी जाने वाली सोनिया गांधी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर वंदेमातरम को बीचमें रोकने की कोशिशकी गई उससे देश में तीव्र विरोध के स्वर उठने लगे हैं.इस वज़ह से वंदे मातरम पर कांग्रेस का दोहरा चरित्र देश के सामने आया है.
स्वाधीनता दिवस पर उसकी तीन राज्य सरकारें तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में नए कानून के मुताबिक वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन किया गया है तो वहीं मुस्लिम लीग के सहयोग से चल रही कांग्रेस की केरलम सरकार में भी मुख्य सरकारी समारोह में वंदे मातरम नहीं गाया गया है.
कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में वंदे मातरम के गायन में जो दृश्य देश के सामने आया है, वह राष्ट्रीय भावनाओं के विपरीत है. झंडा वंदन के बाद राष्ट्रगीत का गायन प्रारंभ होता है. प्रारंभ के दो छंदों तक सब कुछ सामान्य होता है, लेकिन बाकी छंदों का गायन जब शुरु होता है, तब राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड्गे की मुख मुद्राएं बदल जाती हैं. राष्ट्रगीत का एक तरीके से अपमान करते हुए सब अपनी सावधान मुद्रा छोड़ देते हैं.
सोनिया गांधी नाराजगी व्यक्त करती हैं. सेवा दल के जिम्मेदार व्यक्ति को चलते राष्ट्रगीत के बीच में बुलाया जाता है. वह सोनिया गांधी के पास आता है अपनी सफाई देता है. ऐसा माना जा रहा है कि उसने कहा होगा, कि नए कानून के मुताबिक वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन अनिवार्य है. इसको बीच में रोका जाना कानून का उल्लंघन होगा. यह सब चलता रहा और वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन भी हुआ.
इसके बाद जो फैक्ट सामने आए उसमें राहुल गांधी ऐसा कहते सुनाई पड़ रहे हैं, कि हमें इसका गायन अनिवार्य नहीं है. सोनिया गांधी कह रही हैं हमारा वर्जन ही गाया जाना चाहिए. पार्टी के मुख्य प्रवक्ता जयराम रमेश पूरे घटनाक्रम पर रिएक्शन में कहते हैं, सोनिया गांधी खड्गे के लिए कुर्सी लाने को कह रही थीं. जबकि कांग्रेस अध्यक्ष बाद में लंबे समय तक वहीं भाषण देते हैं. पार्टी के एक सांसद जो वहां थे, उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी ने उसको रोकने के लिए कहा था.
पहले तो ऐसा लगा कि शायद गलती से ऐसा हो गया, लेकिन अब जिस तरह की प्रतिक्रियाएं कांग्रेस की ओर से आ रही हैं उससे तो यही लगता है यह सब जान बूझकर मुस्लिम वोट बैंक के लिए किया गया है. अब तो कांग्रेस यही कह रही है कि मुसलमान पूरे छंदों को नहीं गा सकते हैं उनको ऐतराज हो सकता है, वह इसके लिए कानूनन लड़ाई भी लड़ सकते हैं. लेकिन कांग्रेस को वंदे मातरम को सभी छंदों से क्या आपत्ति हो सकती है.
केरलम में वंदे मातरम को स्वाधीनता दिवस के सरकारी समारोह में नहीं गाना, कानून और संविधान दोनों का घोर उल्लंघन है. इसके खिलाफ निश्चित ही न्यायिक प्रक्रिया आरंभ होगी. वंदे मातरम राजनीति का विषय नहीं है. यह राष्ट्रवाद का अमृतम है,अगर कोई गाना नहीं चाहता तो कम से कम उसके सम्मान में खड़ा तो रहा ही जा सकता है.
यह वैसी ही अक्षम्य गलती है जैसा राम जन्मभूमि आंदोलन में किया गया था. कांग्रेस यह दावा करती रही कि जन्मभूमि का ताला तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा ही खुलवाया गया था. लेकिन पूरे आंदोलन में कांग्रेस इसका विरोध करती हुई दिखाई पड़ी. इसी प्रकार वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने जब की थी तब देश गुलाम था और यह गीत आजादी की लड़ाई का उद्घोष बना. स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए इससे मर मिटने की प्रेरणा मिली और उस दौरान कांग्रेस के हर सम्मेलन में सभी छंदों को गाया जाता रहा है.
मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग का जब गठन किया, तब उन्होंने वंदे मातरम को मुस्लिम धार्मिक भावनाओं के खिलाफ़ बताते हुए इसे एजेंडा बनाया. उसके बाद उस समय के कांग्रेस के महापुरुषों ने गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर दो छंदों को गाने का प्रस्ताव पारित किया और उसके सम्मेलन में उसे गाया जाता रहा.
इस गीत की रचना के डेढ़ सौ साल पूरे हो गए हैं, गीत के सभी छंद भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व के धार्मिक प्रतीकों से मेल खाते हैं, इसलिए बीजेपी की इस सरकार ने सभी छंदों को गाने के लिए संसद के इसी सत्र में कानून संशोधित किया है. अब जहां भी वंदे मातरम गाया जाएगा, उसको सभी छंदों के साथ ही गाना पड़ेगा. अगर कहीं भी दो छंद गाए जाएंगे तो वह कानून का उल्लंघन होगा. सरकारी समारोह के अलवा दूसरे समारोह में व्यक्ति को इसे नहीं गाने की स्वतंत्रता है. जानबूझकर इसका अपमान करने पर तीन साल की सजा का प्रावधान है.
कांग्रेस राम मंदिर जैसा ही डबल गेम खेल रही है. इनकी तीन राज्य सरकारें केंद्र के नियमों का पालन कर रही हैं. मुख्य समारोह में वंदे मातरम के सभी छंदों को गाया गया, लेकिन केरलम में ऐसा नहीं हुआ. यह साफ-साफ मुसलमानों को संदेश दिया गया. कांग्रेस मुख्यालय के कार्यक्रम में जो घटनाक्रम हुआ है, अब तो ऐसा लगता है जानबूझकर अपने वोट बैंक को संदेश पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है.
यह मामला और गंभीर हो जाता है, क्योंकि सोनिया गांधी एक विदेशी महिला हैं. बीजेपी इसके लिए कांग्रेस पर लगातार हमलावर है. यह पूरा मामला एक बड़े विवाद के रूप में खड़ा हो सकता है.
कांग्रेस के वोटबैंक के लिए यह सूट करता है, बीजेपी भी इसका उपयोग हिंदुत्व के ध्रुवीकरण के लिए करने से पीछे नहीं रहेगी. वह अपने राष्ट्रवाद के अभियान को भी इससे आगे बढ़ा सकती है.
मुसलमान को इससे ऐतराज हो सकता है. उनके सामने कोर्ट में जाने का रास्ता है. वंदे मातरम को कांग्रेस अगर हिंदुत्व का पाठ्यक्रम मानती है, तो फिर इसकी ख़िलाफत कर देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं के साथ कैसे जुड़ पाएगी.
फिर तो राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व ध्रुवीकरण की उसी पुरानी गति से चलेगी. केवल मुस्लिम राजनीति के सहारे कांग्रेस कितना गेन कर पाएगी यह तो भविष्य बताएगा.
वंदे मातरम का उपयोग वोट बैंक की मजबूती के लिए करना राष्ट्रीय भावनाओं का अपमान है. इसमें भारतीय संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों का भी जुड़ाव है. यह बहुत संवेदनशील है. इस पर राजनीति नुकसानदेह ही साबित होगी.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)





