लेखक:मुकेश सेठ
देश की सर्वोच्च न्यायपालिका तथा विभिन्न उच्च न्यायालय समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि प्रत्येक नागरिक और व्यवसाय को न्याय प्राप्त करने तथा अपने वैध अधिकारों की रक्षा हेतु न्यायालयों और वैधानिक मंचों का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है।
लेकिन आज सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) व्यवस्था में एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो रहा है।
यदि कोई ठेकेदार सरकार, रेलवे, PSU या किसी अन्य सरकारी विभाग से अपने वैध बकाये की वसूली के लिए Arbitration या Court का सहारा लेता है, तो क्या उसे भविष्य की निविदाओं में “Litigation History” के आधार पर संदिग्ध, जोखिमपूर्ण या वित्तीय रूप से कमजोर माना जाना चाहिए?
सर्वोच्च न्यायालय से प्रश्न
क्या केवल इस कारण कि किसी ठेकेदार ने अपने बकाये की वसूली के लिए मध्यस्थता या न्यायालय का सहारा लिया है, उसे भविष्य के सरकारी कार्यों से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) की भावना के अनुरूप है?
क्या न्याय मांगना किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध नकारात्मक पात्रता मानदंड बन सकता है?
क्या लंबित मुकदमे को दोष सिद्धि के बराबर मान लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत नहीं है?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय से प्रश्न
क्या कोई सरकारी विभाग पहले भुगतान रोके, फिर ठेकेदार को Arbitration में जाने के लिए मजबूर करे, और उसके बाद उसी Arbitration को भविष्य की निविदाओं में उसके विरुद्ध उपयोग करे?
क्या यह दोहरा दंड (Double Jeopardy in practical effect) नहीं माना जाना चाहिए?
क्या ऐसे नियम न्याय पाने के संवैधानिक अधिकार को अप्रभावी नहीं बना देते?
वास्तविक समस्या क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में कई बार निम्नलिखित मामलों को एक ही श्रेणी में रख दिया जाता है—
- ब्लैकलिस्टिंग और धोखाधड़ी के मामले;
- भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े के मामले;
- सरकारी धन की वसूली के मामले;
- तथा केवल बकाया भुगतान की वसूली हेतु दायर Arbitration या मुकदमे।
प्रश्न यह है कि क्या इन सभी को एक समान मानना न्यायसंगत है?
क्या वह ठेकेदार जो सरकार से अपना वैध भुगतान मांग रहा है, उसी श्रेणी में रखा जा सकता है जिस पर भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या गंभीर संविदात्मक उल्लंघन के आरोप हों?
क्या इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है?
यदि किसी ठेकेदार को यह पता हो कि Arbitration में जाने से भविष्य की निविदाओं में उसकी पात्रता प्रभावित हो सकती है, तो क्या वह अपने वैध दावों को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होगा?
क्या ऐसी व्यवस्था छोटे और मध्यम ठेकेदारों को सार्वजनिक खरीद प्रणाली से बाहर नहीं कर रही?
क्या इससे सरकारी कार्य कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित होने का खतरा नहीं बढ़ता?
सबसे बड़ा प्रश्न
यदि न्यायालय जाना जोखिम बन जाए और चुप रहना लाभ का सौदा बन जाए, तो क्या यह विधि के शासन (Rule of Law) की मूल अवधारणा के अनुरूप है?
क्या सार्वजनिक खरीद प्रणाली का उद्देश्य ईमानदार प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है या फिर ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिसमें ठेकेदार अपने वैध अधिकारों की मांग करने से भी डरने लगें?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल ठेकेदारों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की पूरी सार्वजनिक खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक वैधता के लिए भी महत्वपूर्ण है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)




