भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता की सबसे बड़ी कसौटी भी हैं। इसलिए चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर उठने वाला हर सवाल गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह सवाल आज उठा है तो इसे केवल मौजूदा राजनीतिक टकराव के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए इतिहास की ओर भी देखना होगा, क्योंकि निर्वाचन आयोग और सत्ता के बीच तनाव की कहानी नयी नहीं है।
आज चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर जो बहस चल रही है, उसमें एक पक्ष कह रहा है कि आयोग के भीतर असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। दूसरी ओर विपक्ष इन मतभेदों को संस्था की कार्यप्रणाली और स्वायत्तता से जोड़ रहा है। दोनों बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है। बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय होना अपने आप में असामान्य या लोकतंत्र विरोधी नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या निर्णय निर्धारित प्रक्रिया, पारदर्शिता और संस्थागत मर्यादा के भीतर लिए जा रहे हैं और क्या प्रत्येक आयुक्त को अपनी राय रखने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है।
भारतीय निर्वाचन आयोग का इतिहास इस बात का साक्षी है कि आयोग की संरचना और अधिकारों को लेकर सरकारों और आयोग के बीच तनाव पहले भी पैदा हुआ है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित है। शुरुआत में आयोग केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त वाली एक सदस्यीय संस्था था। अक्टूबर 1989 में पहली बार दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार यह व्यवस्था बहुत थोड़े समय तक रही और जनवरी 1990 में आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया। अक्टूबर 1993 में दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति के साथ आयोग दोबारा तीन सदस्यीय बना और तब से बहुसदस्यीय व्यवस्था कायम है।
1989 का प्रसंग आज की बहस में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस समय मुख्य निर्वाचन आयुक्त आर.वी.एस. पेरी शास्त्री और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच मतभेदों की चर्चा हुई थी। बाद के विश्लेषणों में यह आरोप लगाया गया कि सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आयोग को बहुसदस्यीय बनाकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त की शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया। इस व्याख्या का उल्लेख कई विश्लेषणात्मक रिपोर्टों में मिलता है।
लेकिन इतिहास को राजनीतिक आरोपों के लिए चुनिंदा ढंग से इस्तेमाल करना भी उचित नहीं होगा। तथ्य यह है कि 1989 में दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए, उनकी नियुक्ति कुछ ही समय बाद समाप्त कर दी गई और फिर 1993 में आयोग स्थायी रूप से तीन सदस्यीय व्यवस्था में चला गया। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम का सबक किसी एक दल को कठघरे में खड़ा करने से ज्यादा बड़ा है—यह कि निर्वाचन आयोग की संरचना और अधिकारों को राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलने की आशंका लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हमेशा संवेदनशील विषय रहेगी।
यहीं टी.एन. शेषन का अध्याय भी महत्वपूर्ण हो जाता है। दिसंबर 1990 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने शेषन ने चुनाव आयोग की भूमिका को आम जनमानस में एक प्रभावशाली संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित किया। चुनाव आचार संहिता को लागू कराने से लेकर चुनावी अनियमितताओं पर कार्रवाई तक उन्होंने आयोग के अधिकारों का आक्रामक ढंग से इस्तेमाल किया। बाद में 1993 में आयोग को फिर बहुसदस्यीय बनाए जाने और मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों के अधिकारों को समान करने के कदम को शेषन ने अपनी शक्तियों को सीमित करने का प्रयास माना और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया। अदालत ने बहुसदस्यीय व्यवस्था को बरकरार रखा।
यह पूरा इतिहास एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखता है—संवैधानिक संस्थाएं केवल कानून और संविधान की धाराओं से मजबूत नहीं होतीं। उन्हें मजबूत बनाती है उनकी संस्थागत परंपरा, राजनीतिक वर्ग का संयम और पद पर बैठे लोगों की स्वतंत्रता।
इसी संदर्भ में आज चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति की खबरों को देखना चाहिए। यदि आयोग के भीतर किसी विषय पर अलग-अलग राय है तो उसे छिपाने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। असहमति का अर्थ संकट नहीं है। वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में सवाल पूछने, आपत्ति दर्ज करने और वैकल्पिक राय रखने की गुंजाइश होनी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब असहमति को दबाने का आरोप लगे, निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी न हो या किसी संवैधानिक संस्था के भीतर सत्ता का प्रभाव दिखाई देने लगे।
निर्वाचन आयोग के मामले में यह चिंता इसलिए और गंभीर है क्योंकि चुनाव में हारने वाला दल हमेशा परिणामों को स्वीकार तभी करेगा जब उसे यह भरोसा हो कि प्रक्रिया निष्पक्ष थी। मतदाता का भरोसा किसी एक चुनाव के परिणाम से नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से बनता है। यदि राजनीतिक दलों को आयोग पर भरोसा नहीं रहेगा तो चुनाव परिणामों की वैधता पर भी अनावश्यक सवाल उठेंगे। इसका नुकसान किसी एक पार्टी को नहीं, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा।
आज विपक्ष चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगा रहा है। सत्ता पक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रहा है कि आयोग के भीतर असहमति को संस्थागत संकट के रूप में पेश करना गलत है। यह राजनीतिक बहस अपने स्थान पर चलती रहेगी। लेकिन इस बहस से ऊपर एक सवाल है—क्या ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर किसी भी सरकार के प्रभाव का संदेह न्यूनतम हो?
यह सवाल केवल आज की सरकार से नहीं पूछा जाना चाहिए। अतीत में कांग्रेस सरकारों के समय भी आयोग की स्वतंत्रता को लेकर विवाद हुए हैं। 1989 में आयोग का विस्तार हुआ। 1993 में नरसिंह राव सरकार के समय शेषन के कार्यकाल में आयोग फिर बहुसदस्यीय बनाया गया। निर्वाचन आयोग के इतिहास से स्पष्ट है कि अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार और आयोग के बीच अधिकारों को लेकर तनाव सामने आता रहा है।
इसलिए आज की बहस को ‘किसने क्या किया’ तक सीमित करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं देगा। यदि कांग्रेस अतीत में निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को लेकर उठे सवालों का जवाब देती है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि भविष्य के लिए वह कौन सी संस्थागत व्यवस्था चाहती है। इसी तरह भाजपा और वर्तमान सरकार से भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह ऐसी व्यवस्था को मजबूत करे जिसमें आयोग की स्वतंत्रता पर किसी तरह का संदेह पैदा न हो।


लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता सत्ता में बैठे व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। किसी एक ईमानदार, साहसी या प्रभावशाली मुख्य निर्वाचन आयुक्त के आने से संस्था मजबूत हो सकती है, लेकिन व्यवस्था स्थायी तभी बनेगी जब संस्थागत सुरक्षा मजबूत हो। टी.एन. शेषन जैसा व्यक्तित्व बार-बार पैदा होगा, यह मानकर लोकतंत्र नहीं चल सकता। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि साधारण परिस्थितियों में भी निर्वाचन आयोग असाधारण स्वतंत्रता के साथ काम कर सके।
इसके लिए नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल, पद की सुरक्षा, आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और सरकार से प्रशासनिक दूरी जैसे मुद्दों पर व्यापक विचार होना चाहिए। आयोग के निर्णयों और आंतरिक प्रक्रियाओं में जहां गोपनीयता आवश्यक हो, वहां भी जवाबदेही का स्पष्ट ढांचा होना चाहिए। असहमति दर्ज करने के अधिकार और उसे संस्थागत रिकॉर्ड में सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी लोकतांत्रिक भरोसा बढ़ा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्वाचन आयोग को राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा नहीं बनने दिया जाना चाहिए। राजनीतिक दल आयोग की आलोचना कर सकते हैं, उसके फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं और सुधार की मांग कर सकते हैं। लेकिन चुनावी संस्था की विश्वसनीयता को लगातार राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में खींचना अंततः मतदाता के विश्वास को प्रभावित करता है।
‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोप हों या आयोग के भीतर असहमति को लेकर उठे सवाल, इनका समाधान नारे और राजनीतिक जवाबी हमलों से नहीं हो सकता। प्रमाण, प्रक्रिया और संस्थागत जांच ही ऐसे आरोपों की कसौटी होनी चाहिए। किसी भी आरोप को केवल इसलिए सत्य नहीं माना जा सकता कि वह राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है और केवल इसलिए खारिज भी नहीं किया जा सकता कि वह विपक्ष की ओर से आया है।
मीडिया की भूमिका भी इसी बिंदु पर महत्वपूर्ण हो जाती है। मीडिया का काम किसी राजनीतिक पक्ष के आरोप को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने रखना, दस्तावेजों की पड़ताल करना और जनता को यह बताना है कि विवाद का वास्तविक आधार क्या है। लोकतंत्र में मीडिया आईना है; आईने का काम चेहरा बदलना नहीं, उसे दिखाना है।
आखिरकार सवाल राजीव गांधी बनाम नरेंद्र मोदी, कांग्रेस बनाम भाजपा या राहुल गांधी बनाम निर्वाचन आयोग का नहीं है। सवाल यह है कि भारत का मतदाता अपने वोट को लेकर कितना आश्वस्त है। चुनाव आयोग के प्रति भरोसा किसी सरकार, दल या नेता की कृपा से नहीं, उसकी संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्ष आचरण से पैदा होगा।
लोकतंत्र की बुनियाद चुनाव हैं और चुनाव की बुनियाद विश्वास। यदि यह विश्वास कमजोर हुआ तो नुकसान किसी एक राजनीतिक दल का नहीं होगा। इसलिए समय की मांग यह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को अपनी-अपनी राजनीतिक सुविधा के बजाय लोकतांत्रिक आवश्यकता के रूप में देखें। अतीत की घटनाओं से सबक लिया जाए, वर्तमान विवादों की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य के लिए ऐसी संस्थागत व्यवस्था बनाई जाए जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को बराबर भरोसा हो सके।क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव जीतना या हारना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था पर विश्वास बनाए रखना पूरे राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है।
(लेखक आज अखबार में नेशनल ब्यूरो हैं)



