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लेखक- राजेंद्र द्विवेदी

संघर्ष, त्याग और दूरदृष्टि से दलित चेतना को जागरूक करके बनाई गई कांशीराम की उपजाऊ सियासी जमीन को मायावती ने अहंकार, भय, पारिवारिक मोह एवं गलत निर्णयों से बंजर बना दिया है। यह कहा जा सकता है कि कांशीराम ने जिस सूझ-बूझ और राजनीतिक परिपक्वता के साथ परिवारवाद, सत्ता लोलुपता और ऐशो-आराम की जिंदगी को छोड़कर दलित चेतना के बाद सभी पिछड़े एवं अल्पसंख्यकों को जोड़कर एक मजबूत संगठन खड़ा किया, उसी संगठन ने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। कांशीराम ने कांग्रेस को हाशिये पर पहुंचाकर कम समय में ही बसपा को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाया।

तेज-तर्रार संघर्ष करने वाले विभिन्न जाति-धर्म के गरीब युवाओं का संगठन खड़ा किया, जिससे 2007 में बसपा को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार मिली। यह बसपा के उत्थान का चरम समय था। कांशीराम के निधन के बाद 2007 में उत्तराधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री बनी मायावती ने 5 वर्षों में 2012 तक कई ऐतिहासिक कार्य और निर्णय लिए, जो उनके राजनीतिक साहस और कठोर कदम उठाने का प्रमाण बने। उन्होंने दलित महापुरुषों के स्मारकों के निर्माण पर लखनऊ से लेकर नोएडा तक हजारों करोड़ खर्च किए। लेकिन इन्हीं स्मारकों के निर्माण में हुई अनियमितताएं मायावती के खिलाफ जांच एजेंसियों का सबसे बड़ा हथियार बन गईं।

2007 से 2012 तक मायावती ने नौकरशाहों के माध्यम से कानून-व्यवस्था को एक अनुशासित शासन दिया, जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक उदाहरण बन गया। मायावती के शासन और प्रशासनिक क्षमता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि उन्होंने निष्पक्षता से बड़े से बड़े लोगों पर भी कार्रवाई करने में हिचक नहीं दिखाई, फिर चाहे वह बसपा से जुड़े ही क्यों न रहे हों। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों एवं पार्टी में तानाशाही रवैये के चलते उन्होंने कई बड़े नेताओं को बेइज्जत कर बाहर निकाल दिया।

आज कांग्रेस, सपा और भाजपा में कई बड़े चेहरे हैं जो कभी बसपा में कांशीराम के संघर्ष के साथी रहे, लेकिन मायावती ने उन्हें समय-समय पर पार्टी से बाहर कर दिया। 2012 के बाद मायावती के गलत निर्णयों एवं कार्यकर्ताओं से दूरी बनाने के कारण पार्टी कमजोर होती गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को मात्र 1 सीट और 12% वोट मिले। 2014 और 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला। 2019 में सपा के साथ गठबंधन में 10 लोकसभा सीटें जरूर मिली थीं।

मायावती की कार्यशैली से बसपा को निरंतर नुकसान हुआ। कांशीराम ने जिन मूल्यों के साथ दलित चेतना का मिशन शुरू किया था, वह मायावती के पारिवारिक मोह के कारण कमजोर पड़ गया। उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाया, फिर हटाया, फिर दोबारा बनाया और अंततः पार्टी से ही निकाल दिया। बाद में उन्होंने घोषणा की कि वे जीते-जी किसी को उत्तराधिकारी नहीं बनाएंगी, लेकिन अपने भाई आनंद को अघोषित रूप से पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया।

बसपा की स्थापना से अब तक के सियासी उतार-चढ़ाव को देखा जाए तो यह मायावती के लिए सबसे बड़े संकट का दौर है और इसकी जिम्मेदार खुद मायावती ही हैं। बसपा के उत्थान और दलित चेतना के मूवमेंट को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर आज कांशीराम होते तो मायावती प्रधानमंत्री बन सकती थीं। लेकिन अब स्थिति उलट हो चुकी है। मायावती को अपने रिश्तेदार अशोक सिद्धार्थ और भतीजे आकाश आनंद से ही चुनौती मिलने का डर सता रहा है। दूसरी तरफ, उम्र बढ़ने के साथ संघर्ष करने की क्षमता भी कम हो गई है।

बसपा को मजबूत करने में भूमिका निभाने वाले विभिन्न जातियों और धर्मों से जुड़े जमीनी नेता अब पार्टी में नहीं हैं। लोकसभा, राज्यसभा और विधान परिषद में बसपा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी बसपा के केवल एक विधायक, उमाशंकर सिंह, बचे हैं। 1984 में फर्श से अर्श तक पहुंचने वाली बसपा 2025-26 में बेहद कमजोर हो चुकी है। मायावती को लेकर यह धारणा बन चुकी है कि वे भाजपा के दबाव में काम कर रही हैं। राहुल गांधी ने भी यह आरोप लगाया कि अगर बसपा गठबंधन में होती तो मोदी सरकार नहीं बनती।

इन तमाम राजनीतिक उठापटक और कयासों के बीच यह भी संभावना है कि मायावती को पार्टी के अंदर से ही चुनौती मिल सकती है। यह सच्चाई है कि जब तक मायावती किसी के साथ गठबंधन नहीं करेंगी, तब तक संघर्ष के बलबूते पार्टी को 2007 की स्थिति में नहीं पहुंचा पाएंगी।

अंत में कहा जा सकता है कि कांशीराम की उपजाऊ सियासी जमीन को मायावती ने बंजर बना दिया।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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