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लेखक-राजेंद्र द्विवेदी

चुनाव में मुफ्त में चीज़ें देने की घोषणा पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी राजनीतिक दलों के लिए सबक है। जिस तरह से राजनीतिक दल चुनाव से पहले रेवड़ियां बांटने की घोषणाएं करते है और जीतने के बाद आधी-अधूरी रेवड़ियां बांटते भी हैं। इससे आर्थिक बोझ बढ़ता है और निठल्लों की एक फ़ौज खड़ी होती जा रही है। जो देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने चुनाव के पहले राजनीतिक दलों द्वारा रेवड़ियां देने पर गंभीर टिप्पणी की और कहा कि इस तरह की रेवड़ी बाँट कर लोगों को अकर्मण्य बनाया जा रहा है। जस्टिस बीआर गवई, आइंस्टीन जॉर्ज मसीह ने कहा कि मुफ्त राशन और पैसा मिलने से लोग काम करने के लिए तैयार नहीं है। जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि मैं महाराष्ट्र के कृषक परिवार से आता हूँ। चुनाव से पहले घोषित मुफ्त सुविधाओं के कारण किसानों को मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं। यह उचित नहीं है। राष्ट्रीय विकास के लिए लोगों को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के बजाय परजीवी का एक वर्ग बनाया जा रहा है। यह कार्य कोई एक दल नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं।

चुनाव जीतने के लिए मुफ्त रेवड़ी बांटने की प्रथा बहुत पुरानी है। 60 के दशक में यह प्रथा डीएमके ने शुरू की थी जो वर्तमान चुनावों में एक रेवड़ी कल्चर बन गया है। हर दल में यह होड़ होती है कि कौन सबसे अधिक फ्री की घोषणा करके अपने समर्थक वोटेजीवी बना सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 80 करोड़ से अधिक जनता को दिया जा रहा राशन सबसे बड़ी रेवड़ी के रूप में कहा जा सकता है। नई तरीके की राजनीति करने के लिए सियासत में आये केजरीवाल ने रेवड़ी कल्चर का एक ऐसा अभियान शुरू किया कि प्रधानमंत्री के फ्री राशन आवास व अन्य तमाम कल्याणकारी योजनाओं पर भारी पड़ गया। केजरीवाल 200 यूनिट मुफ्त बिजली, पानी, फ्री बस सेवा, फ्री वाई-फाई देकर एक नई तरीके के सियासत की नींव डाली और इसका अप्रत्याशित लाभ चुनाव में मिला भी। दिल्ली में 2015 और 2020 तथा पंजाब में सरकार बनाई। यही नहीं 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी 43 प्रतिशत वोट केजरीवाल को मिले। चुनाव जीतने के लिए मोदी को केजरीवाल की मुफ्त रेवड़ी योजना को जारी रखने की मजबूरी में घोषणा भी करनी पड़ी।

महिला वोट बैंक सत्ता तक पहुंचाने में सबसे अहम होता है। इसलिए महिलाओं को सीधे लाभ देने की होड़ सी मच गयी। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहन योजना, महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री लाड़की बहन योजना, छत्तीसगढ़ में मतारी बंधन स्कीम, राजस्थान में लाडों प्रोत्साहन, झारखण्ड में मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना’, तमिलनाडु में महिला मुखिया योजना, कर्नाटक में गृह लक्ष्मी योजना, पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी भंडार योजना जैसी महिलाओं को सीधी लाभ देने वाली योजनाओं की घोषणा की गयी और इसका लाभ भी मिला। इसी तरह से फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री बस सेवा, फ्री स्कूटी, फ्री टेबलेट, फ्री लैपटॉप, फ्री साइकिल, फ्री टीवी, फ्री राशन जैसे तमाम रेवड़ियां बांटने की घोषणाएं विभिन्न राजनीतिक दलों ने की और स्थिति ऐसी बन गयी है कि केंद्र और राज्य सरकारें फ्री रेवड़ी बांटने के कारण आर्थिक दिवालिया और घाटे में डूबी हुई है लेकिन इसके बाद भी फ्री की परम्परा रुक नहीं रही है। बिहार, पश्चिम बंगाल व आने वाले चुनाव में भी रेवड़ी की घोषणाएं शुरू हो गयी हैं। स्थिति यह हो गयी है कि देश में शिक्षा, स्वास्थ्य , रोजगार या अन्य मूल आवश्यकताओं के लिए बजट नहीं रह गया। आर्थिक स्थिति ख़राब होती जा रही है। समाज में एक परजीवी वर्ग बन गया है। इस परम्परा को रोकने की हिम्मत किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है। यह जरूर है उच्चतम न्यायालय ने ऐसी घोषणाओं पर रोक लगाई तो कम हो सकती है लेकिन समाप्त नहीं। क्योंकि नेताओं के लिए फ्री लाभ देना मजबूरी बन गयी है और वह इसे चुनाव जीतने का बहुत बड़ा हथियार भी मानते है।

लेकिन यह स्थिति बहुत ही गंभीर है। क्षेत्रीय दल से लेकर राष्ट्रीय दल जिस तरह रेवड़ी कल्चर को वोटजीवी बनाना चाहते हैं उससे अर्थव्यवस्था चौपट होगी ही और विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। रेवड़ी कल्चर का लाभ लेने वालों की कुल संख्या जैसा कि केंद्र और राज्य सरकार दावा करती है को जोड़ दिया जाए तो यह 100 करोड़ से हो जा रहा है। क्योंकि जब लोगों को फ्री की आदत पड़ गयी है तो क्यों काम करना चाहेंगे ? जस्टिस गवई की बात सही है कि फ्री रेवड़ी से लोग घरों में बैठ गए हैं। कार्य करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे हैं और यह फ्री कल्चर एक तरीके से अदृश्य बेरोजगारी का भयावह रूप भी बन गयी है।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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