लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷कानून की चक्की धीमी ही सही पर बहुत महीन पीसती है। हां, समय जरुर लगता है। भड़काऊ भाषणों और नफरती बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तल्खी के बाद अब उन सभी लोगों का हिसाब-किताब बराबर होना तय है जो चुनावों के समय अपनी जुहरीली जुबानी बर्बरता से समाज में नफरत का बीज रोपने का काम करते हैं। पहली गाज समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और विधायक आजम खान पर गिरी है, जो अकसर अपने विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में रहे। रामपुर के एमपी-एमएलए कोर्ट ने 2019 के लोकसभा के चुनाव के दरम्यान दिए गए भड़काऊ भाषण मामले में उन्हें तीन साल कैद और छः हजार रुपए आर्थिक दंड की सजा सुनायी है। इस फैसले के बाद अब उनकी विधायकी जानी तय है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक सांसद और विधायक को दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा (3) के अनुसार अगर किसी जनप्रतिनिधि को किसी अपराध में दो साल से अधिक की सजा मिलती है तो वह सजा की तारीख से ही सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है। वह 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकेगा। सर्वोच्च अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है और इसे इसी रुप में बनाए रखना होगा। अदालत यह भी कह चुका है कि संविधान धर्म को मानने का अधिकार देता है न कि धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगने का। हां, बेशक आजम खान को इस फैसले के खिलाफ उपरी अदालत में जाने का अधिकार हासिल है। लेकिन इस फैसले के बाद वह विधानसभा की सदस्यता से फिलहाल अयोग्य हो चुके हैं। आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद अब विधानसभा आजम खान की रामपुर सदर सीट की रिक्ति की अधिसूचना जारी कर चुनाव आयोग को भेज देगी। उसके बाद चुनाव आयोग इस खाली सीट पर उपचुनाव कराएगा। जानना आवश्यक है कि 2019 लोकसभा चुनाव के दरम्यान आजम खान ने अपने संबोधन में रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह, उनकी मां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की थी। इसके अलावा उन पर मुस्लिमों को भड़काने व कटुता फैलाने जैसे आरापे भी लगे। याद होगा उस समय आजम खान के भड़काऊ भाषण का विडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। अब उसकी कीमत आजम खान को अपनी विधायकी गंवाकर चुकानी पड़ रही है। बहरहाल इस बात की संभावना कम ही है कि उपरी अदालत में आजम खान को राहत मिलेगी। इसलिए कि नेताओं के भड़काऊ भाषणों और बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही सख्त रुख अख्तियार कर चुका है। अभी पिछले ही दिनों उसने नफरत भरे भाषणों को लेकर कहा कि धर्म के नाम पर हम कहां से कहां पहुंच गए हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ बयान देने वाला जिस भी धर्म का हो, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड सरकार को निर्देश भी दिया कि ऐसे नफरत भरे बयानों पर पुलिस स्वतः संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज करे। इसके लिए किसी की तरफ से शिकायत दाखिल होने का इंतजार न किया जाए। इस तल्ख टिप्पणी से समझना कठिन नहीं कि नफरत भरे बयानबाजी को लेकर सुप्रीम कोर्ट कितना सख्त है। एमपी-एमएलए कोर्ट का यह फैसला इस अर्थ में नजीर है कि इससे देश के नेता सबक लेंगे। किसी से छिपा नहीं है कि चुनावों में नेता जहरीले बयानबाजी से देश व समाज को विचलित करते हैं। उसका असर यह होता है कि समाज में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ता है। जब भी देश में चुनाव होता है राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म, भाषा और समुदाय के नाम पर वोट मांगते हैं। वे ऐसा कर किसी न किसी रुप में समाज को बांटने का ही काम करते हैं। उनकी मजहबी व जातिवादी राजनीति से न केवल जातियों के ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है बल्कि कई बार तो तनाव व हिंसा का माहौल भी निर्मित हो जाता है। देश के सियासी दल सत्ता संधान के निमित्त जाति अस्मिता के सवाल को उछालकर जातियों की गोलबंदी कर व्यवस्था का जातीयकरण करते हैं और उसका सियासी लाभ उठाते हैं। नतीजतन देश को अनगिनत बार चुनावी दंगे का सामना करना पड़ता है। अकसर देखा जाता है कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए मजहबी लोगों को आगे कर अपने पक्ष में फतवा कराते हैं। अपने चुनावी घोषणापत्र में मजहबी आधार पर आरक्षण देने की बात करते हैं। ऐसे-ऐसे चुनावी वादे करते हैं जिसे पूरा करना संभव ही नहीं है। लेकिन आजम खान के मामले में आए इस फैसले से अब कोई भी राजनीतिक दल या उसके नेता चुनाव जीतने के लिए अपने भाषण व अपील में धर्म, जाति व समुदाय के लोगों को लुभाने और उनका ध्रुवीकरण कराने का हिमाकत नहीं करेंगे। अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें आजम खान जैसा खामियाजा भी भुगतना होगा। विचार करें तो आजम खान तो एक बानगी भर हैं। देखें तो हर राजनीतिक दल में ऐसे नेताओं की भरमार है जो वोट हासिल करने के लिए कुछ भी बोलने से परहेज नहीं करते हैं। यह ठीक नहीं है। इस तरह की जुबानी बर्बरता बहुधर्मी व बहुजातीय भारतीय समाज की मजबूत नींव को कमजोर करती है। त्रासदी यह है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने नेताओं को ऐसे कुत्सित आचरण प्रदर्शित करने से रोकता नहीं है। जबकि उनकी जिम्मेदारी है कि ऐसे बदजुबान नेताओं को नियंत्रित करें। विचार करें तो आजादी के दशकों बाद तक चुनावों में वाणी के संयम का ध्यान रखा जाता था। किसी भी दल का नेता अपने विरोधी दल के नेता को अपनी वाणी से आहत नहीं करता था। अगर ऐसा हो भी गया तो वह माफी मांगने में देर नहीं लगाता था। अच्छी बात यह थी कि हर राजनीतिक दल के शीर्ष नेता अपने नेताओं को चुनाव में बेहतर आचरण प्रदर्शन के लिए प्रशिक्षित करते थे। ऐसा नहीं है कि उस समय वाणी से असंयमित नेता नहीं थे। यदा-कदा वे बदजुबानी कर जाते थे। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के समय बिहार के एक सांसद ने विपक्षी नेता आचार्य जेबी कृपलानी को सीआईए का एजेंट कह दिया था। कृपलानी जी को यह बात इतनी चुभ गयी कि वे बीमार पड़ गए। जब पंडित नेहरु को इस बात की जानकारी मिली तो वे अपने दल के नेता के आचरण से बहुत दुखित हुए। उन्होंने अपने सांसद को बुलाकर डांट-फटकार लगायी और कृपलानी जी से माफी मांगने को कहा। यही नहीं नेहरु जी कृपलानी जी से मिलने अस्पताल गए। यह घटना भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती को बयां करता है। पहले के नेता चुनावों में अपने प्रतिद्वंदी नेताओं का सम्मान करते थे। ऐसा ही एक वाकया 1988 का है जब इलाहाबाद में उपचुनाव हो रहा था। तब जनमोर्चा के उम्मीदवार विश्वनाथ प्रताप सिंह और कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील शास्त्री आमने-सामने थे। दोनों ने जमकर अपनी नीतियों का बखान किया। लेकिन पूरे चुनाव में दोनों ने एकबार भी एकदूसरे का नाम तक नहीं लिया। लोकतंत्र को ऐसे ही उच्च आदर्शों की जरुरत है। पंडित नेहरु जब विपक्षी दलों पर तंज कसते थे तो कहते थे कि जो कांग्रेस में सबसे खराब नेता है वह विपक्षी दल के सर्वश्रेष्ठ नेता से अच्छा है। चैधरी चरण सिंह जब भी कांग्रेस पर हमलावर होते थे तो कहते थे कि जिस दिन इंदिरा गांधी ज्वार और बाजरे में अंतर बताना सीखे जाएंगी वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। डा0 लोहिया चुनाव के दरम्यान पंडित नेहरु की सरकार की आलोचना करते समय भाषा की मर्यादा का समुचित ख्याल रखते थे। कहते हैं न कि नैतिकता के उच्च आदर्शों का परखा जाना कभी खत्म नहीं होता हैं। लेकिन आज की तारीख में देश के मौजूदा नेताओं ने अपनी बदजुबानी से नैतिकता व शुचिता के परखच्चे उड़ा दिए हैं। अब वक्त आ गया है कि देश के राजनीतिक दल चुनाव में बदजुबानी करने वाले अपने नेताओं की नकेल कसें।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















