लेखक~के. विक्रम राव
♂÷हाल ही में लखनऊ के एक साहित्यिक आयोजन में शरीक हुआ था। अनूठी प्रतीति हुई। मनभावन लगी। साझा करने की इच्छा जगी। कारण था कि इस बौद्धिक समारोह में वक्ताओं के अभिनंदन पर न तो महकते फूलों का कोई हार मिला। न कोई रंगीन गुलदस्ता, न ऊनी शाल, ना रेशमी उत्तरीय। बस पाया तो सादर प्रणाम तथा प्लास्टिक गमले में रोपित श्याम हरी तुलसी का पौधा। नायाब भेंट है। आप्त अनुष्ठान लगा। सभाओं इस रस्म का प्रयोग असरदार था, मौसम पर विशेषकर। बंजर पर रोक, प्राणवायु को बाधित न होने देना। इससे आंगन की शोभा ज्यादा बढ़ेगी ही। कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं, वे बताते हैं कि विष्णुवल्लभ और कृष्णप्रिया होने के कारण लक्ष्मी और राधा की तुलसी सौतन है। यह भ्रामक है, क्योंकि नाम अनेक हैं पर व्यष्टि तो एक अकेली है। विपर्यक नहीं है। आज निर्माण योजनाओं से जंगल फैल रहे हैं। उर्वरता घटती और बंजरता बढ़ती जा रही है। अत: तुलसी की आवश्यकता और उपयोगिता अधिक हो गई है।
इसे स्वास्थ्य से जोड़ें। भागवत पुराण में तुलसी को जड़ी बूटियों की महारानी कहते हैं। फलों में आम तथा फूलों में गुलाब की भांति। धरा और परमधाम के दरम्यान द्वार है। वनस्पतियों में पवित्रता का प्रतीक है। जन-औषधि है, स्वास्थ्यकर है। श्वास प्राणवायु में सहायक है, गुर्दावृक्क को साफ़ रखती है। मंदार, कुंदा, कुरुवाका, उत्पला, चम्पक, अर्ण, पुन्नगा, नागकेसर, वकुला, लिली, पारिजात इत्यादि में खुशबू तो हैं, पर उनमें तुलसी श्रेयस्कर है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जिस शव का दहन तुलसी की टहनियों से होता है, वह मोक्ष पाता है। चेन्नई, नई दिल्ली, मुम्बई तथा अन्य क्षेत्रों में प्रकाशित वामपंथी, अंग्रेजी दैनिक हिन्दू के 10 अक्टूबर 2022 के अंक में संत पीटी शेषाद्रि ने अपने प्रवचन में बताया था कि भक्त प्रहृलाद ने पद्मपुराण में तुलसी की महिमा की चर्चा की थी। तब ऋषियों से भेंट पर भक्त सदानंद ने पापनाश तथा पुण्यवृद्धि हेतु तुलसी अवतरण के बारे में जानना चाहा था। उनके अनुसार समुद्र मंथन के समय धन्वंतरि अमृत कलश को लेकर आये। फिर तीन कण विष्णु भगवान नारायण की आंखों से गिरे थे। सर्वप्रथम आये लक्ष्मी तथा कौस्तुभ मणि जिन्हे भगवान ने अपने वक्ष पर लगाया। तीसरे कण से तुलसी जन्मी, जिसे उन्होंने अपने शरीर पर लगाया। तुलसी को विष्णु भगवान ने वर दिया कि जो उसकी आराधना करेगा, वह पापमुक्त हो जायेगा। हर पूजा पर अनिवार्य है। असंख्य गोदान के समय है।
भारत से तुलसी पश्चिम राष्ट्रों को गई। उसे “होली बेसिल” (पवित्र पौधा) कहते हैं। वहाँ वातावरण में स्वच्छता एवं शुद्धता और प्रदूषण का शमन करती है। तुलसी से घर परिवार में आरोग्य की जड़ें मजबूत करने, श्रद्धा तत्व को जीवित करने जैसे अनेकों लाभ हैं। तुलसी के नियमित सेवन से सौभाग्यशीलता के साथ ही, सोच में पवित्रता, मन में एकाग्रता आती है और क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। आलस्य दूर होकर शरीर में दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। तुलसी की सूक्ष्म व कारक शक्ति अद्वितीय है। यह आत्मोन्नति का पथ प्रशस्त करती है। गुणों की दृष्टि से संजीवनी बूटी है। तुलसी को प्रत्यक्ष देवी मानने और मंदिरों एवं घरों में उसे लगाने, पूजा करने के पीछे संभवत: यही कारण है कि यह सर्वदोष-निवारण औषधि सर्वसुलभ तथा सर्वोपयोगी है। धार्मिक धारणा है कि तुलसी की सेवापूजा व आराधना से व्यक्ति स्वस्थ एवं सुखी रहता है। अनेक भारतीय हर रोग में तुलसीदल—ग्रहण करते हुए इसे दैवीय गुणों से युक्त सौ रोगों की एक दवा मानते हैं। गले में तुलसी—काष्ठ की माला पहनते हैं।
तुलसी से जुड़ी कुछ कथायें भी हैं : एक वाकया है। तब सीता की खोज में हनुमान लंका गये थे। वहां विलम्ब हो रहा था। तभी हनुमान को एक घर में तुलसी का पौधा दिखा। वह विभीषण का महल था। लंका में विभीषण के घर तुलसी का पौधा देखकर हनुमान अति हर्षित हुये थे। इसकी महिमा के वर्णन में तुलसीदास ने कहा है : “नामायुध अंकित गृह शोभा वरिन न जाई। नव तुलसी के वृन्द तहंदेखि हरषि कपिराई।‘’ धर्मध्वज की पत्नी का नाम माधवी तथा पुत्री का नाम तुलसी था। वह अतीव सुन्दरी थी। जन्म लेते ही वह नारीवत होकर बदरीनाथ में तपस्या करने लगी। ब्रह्मा ने दर्शन देकर उसे वर मांगने के लिए कहा। उसने ब्रह्मा को बताया कि वह पूर्वजन्म में श्रीकृष्ण की सखी थी। राधा ने कृष्ण के साथ उसे रतिकर्म में देखकर मृत्युलोक जाने का शाप दिया था। कृष्ण की प्रेरणा से ही उसने ब्रह्मा की तपस्या की थी, अत: ब्रह्मा से उसने पुन: श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने का वर मांगा। ब्रह्मा ने “कहा—तुम भी जातिस्मरा हो तथा सुदामा भी अभी जातिस्मर हुआ है, उसको पति के रूप में ग्रहण करो। नारायण के शाप अंश से तुम वृक्ष रूप ग्रहण करके वृंदावन में तुलसी अथवा वृंदावनी के नाम से विख्यात होगी। तुम्हारे बिना श्रीकृष्ण की कोई भी पूजा नहीं हो पायेगी। राधा को भी तुम प्रिय हो जाओगी।‘’ ब्रह्मा ने उसे षोडशाक्षर राधा मंत्र भी दिया।
दूसरा किस्सा है कि महायोगी शंखचूड़ नामक राक्षस ने महर्षि से कृष्णमंत्र पाकर बदरीनाथ में प्रवेश किया। अनुपम सौंदर्यवती तुलसी से मिलने पर उसने बताया कि वह ब्रह्मा की आज्ञा से उससे विवाह करने की निमित्त वहां पहुंचा था। तुलसी ने उससे विवाह कर लिया। वे लोग दानवों के अधिपति के रूप में निवास करने लगे। जब शंखचूर्ण का उपद्रव बहुत बढ़ गया तो एक दिन हरि ने अपना शूल देकर शिव से कहा कि वे शंखचूड़ को मार डालें। शिव ने उस पर आक्रमण किया। सबने विचारा कि जब तक उसकी पत्नी पतिव्रता है तथा उसके पास नारायण का दिया हुआ कवच है, उसे मारना असम्भव है। अत: ईश्वर ने शंखचूड़ का कवच पहनकर स्वयं उसका सा रूप बनाकर वे उसके घर के सम्मुख दुंदुभी बजाकर अपनी देवताओं पर विजय की घोषणा किया। प्रसन्नता के आवेग में तुलसी ने उनके साथ समागम किया। तदनन्तर विष्णु को पहचानकर पतिव्रत धर्म नष्ट करने के कारण उसने शाप दिया : “ तुम पत्थर हो जाओ। तुमने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने भक्त के हनन के निमित्त उसकी पत्नी से छल किया है।‘’ शिव ने प्रकट होकर उसके क्रोध का शमन किया और कहा : “तुम्हारा यह शरीर गंडक नामक नदी तथा केशतुलसी नामक पवित्र वृक्ष होकर विष्णु के अंश से बेन समुद्र के साथ विहार करेगा। तुम्हारे शाप से विष्णु गंडकी नदी के किनारे पत्थर के होंगे और तुम तुलसी के रूप में उन पर चढ़ाई जाओगी। शंखचूड़ पूर्वजन्म में सुदामा था, तुम उसे भूलकर तथा इस शरीर को त्यागकर अब तुम लक्ष्मीवत विष्णु के साथ विहार करो। शंखचूड़ की पत्नी होने के कारण नदी के रूप में तुम्हें सदैव शंख का साथ मिलेगा। तुलसी समस्त लोकों में पवित्रतम वृक्ष के रूप में रहोगी।” फिर शिव अंतर्धान हो गये और वह शरीर का परित्याग करके बैकुंठ चली गई। कहते हैं तभी से विष्णु के शालिग्राम वाले रूप की तुलसी की पत्तियों से पूजा होने लगी।
तीसरा किस्सा है : श्रीकृष्ण ने कार्तिक की पूर्णिमा को तुलसी का पूजन करके गोलोक में रमा के साथ विहार किया। अत: वही तुलसी का जन्मदिन माना जाता है। प्रारम्भ में लक्ष्मी तथा गंगा ने तो उसे स्वीकार कर लिया था, किन्तु सरस्वती बहुत क्रुद्ध हुई। तुलसी वहां से अंतर्धान होकर वृंदावन में चली गई। इसलिए उन्हें वृन्दा भी कहा गया है। जहां तुलसी बहुतायत से उगती है वह स्थान वृन्दावन कहा जाता है। इसी वृन्दा के नाम पर श्रीकृष्ण की लीलाभूमि का नाम वृन्दावन पड़ा। नारायण पुन: उसे ढूंढकर लाये तथा सरस्वती से उसकी मित्रता करवा दी। सबके लिए आनंददायिनी होने के कारण वह नंदिनी भी कहलाती है।
तुलसी पौधे उगाने और सींचने मे बहुत हर्ष तथा रोमांच की अनुभूति होती है। मेरा निजी तजुर्बा है। उस वक्त (1975 जून के) आपातकाल के दौर मे डेढ़ सदी पुराने बड़ौदा केन्द्रीय सेल मे कैद था। खाली समय खूब था। वहाँ उपजाऊ जमीन भी विषाल थी। जेल अधीक्षक श्री पाण्ड्या ने मुझे तुलसी के बीज उपलब्ध कराये। दिन मे फुर्सत ही थी। लाइब्रेरी से मंगाई पुस्तको को पढ़ने के समय के बाद बाकी तुलसी का पौधा उगाने मे लग जाता था। दो ढाई महीनो बाद देखा कि हजारो पौधा लहलहाने लगे। मन बड़ा मुदित हुआ। फिर वह टूट गया क्यों कि दिल्ली के तिहाड़ जेल में ले जाया गया। वहाँ पौधे लगाना संभव नहीं था। मगर तुलसी माँ की ही अनुकंपा थी कि भारत में राजनीतिक दृश्य बदला। लोकसभा चुनाव में मोरारजी देसाई और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जनता पार्टी सत्ता (1977) में आई। किन्तु रिहा होकर भी मैंने अपनी पत्नी डॉ. सुधा राव के विशाल रेल बंगले (बन्दरियाबाग, लखनऊ) मे तुलसी उगाया। अत्यधिक संतोष हुआ। नैसर्गिक आह्लाद भी।

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷






















