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(राजेश बैरागी)
(गौतम बुद्ध नगर)

आज फिर वह दिन आया जब 32 बरस पहले हिंडन नदी के इस ओर विकास से कोसों दूर बुरी तरह पिछड़े क्षेत्र को नोएडा की भांति विकसित करने की योजना को संस्थागत रूप दिया गया। नोएडा तब लगभग 15 बरस का हो रहा था।उसका पहला फेज तेजी से विकासशील था जबकि फेज दो में कुछ औद्योगिक इकाइयां नोएडा के औद्योगिक शहर के स्वरूप को साकार करने में लगी थीं। क्षेत्र में अपराधिक राजनीति का बोलबाला था। उत्तर प्रदेश में राज्य सरकारें बनने से ज्यादा गिर रही थीं। ऐसे में एक और औद्योगिक विकास प्राधिकरण की स्थापना का विचार चौंकाने वाला था। हालांकि मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि आम नागरिक जिन चीजों को कल्पनातीत मानकर खारिज करता रहता है, सरकार और शासन में बैठे क्षमतावान लोग उन भविष्य की योजनाओं पर काम करते रहते हैं। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की स्थापना ऐसी ही कल्पनाशील परिकल्पना थी। नोएडा का आदर्श सामने था परंतु जैसा मैंने ऊपर बताया कि क्षेत्र में अपराध मिश्रित राजनीति अपने पूरे उभार पर थी। निवेशकों और उद्यमियों को आकर्षित करना आसान नहीं था।ऐसी विषम परिस्थितियों में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की नींव रखी गई। नोएडा प्राधिकरण के ऋण स्वरूप तीन करोड़ रुपए के आर्थिक सहयोग से ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के कोष का आगाज हुआ। सरकारों के निरंतर अस्थिर होने का असर यहां भी होता रहा और अध्यक्ष व मुख्य कार्यपालक अधिकारियों को भी जब तब बदला जाता रहा।32 वर्ष की विकास यात्रा में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को किस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है? सूक्ष्म तौर पर कहूं तो यह प्राधिकरण एक शहर के तौर पर नोएडा से कहीं बेहतर है। लगभग सभी नगरीय सुविधाएं यहां हैं आंतरिक परिवहन को छोड़कर। यहां एक से बढ़कर एक योग्य मुख्य कार्यपालक अधिकारी आए और अनेक अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारियों ने भी इस शानदार शहर को बसाने में अपना श्रेष्ठ योगदान दिया। कुछ मायनों में तो यह औद्योगिक शहर नोएडा से भी आगे निकलने की तैयारी में है जिसमें मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट हब और लॉजिस्टिक हब जैसी सुविधाएं शामिल हैं। बेशक यह सभी विकास परियोजनाएं शहर के सतत् विकास की ही कड़ी हैं परंतु इसके लिए पूर्व में और वर्तमान में नियुक्त अधिकारियों की नेतृत्व क्षमता को नजरंदाज तो नहीं किया जा सकता है।

By Mukesh Seth

Chief Editor

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