लेखक: एडवोकेट ब्रज किशोर मिश्रा

आज समस्त लोकतंत्र सेनानी स्वर्गीय श्री के. विक्रम राव जी की प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण कर रहे हैं। विक्रम राव जी उन लोगों में नहीं थे जो समय की हवा देखकर अपने विचार बदल लेते हैं, वे उस पीढ़ी के निर्भीक योद्धा थे जिसने सत्ता के भय के सामने झुकने से बेहतर संघर्ष का मार्ग चुना। पत्रकारिता को सिर्फ़ एक पेशा नहीं बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का रास्ता माना। उनके शब्दों में साहस था, वैचारिक स्पष्टता थी और राष्ट्रहित के प्रति अद्भुत निष्ठा भी। लेखक-चिंतक और विचारक के तौर पर उन्होंने जो लिखा उसे स्वयं अपने जीवन में जिया भी।

जब देश पर आपातकाल थोपा गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने लोकतंत्र की आवाज़ को कुचलने का प्रयास किया तब विक्रम राव जी ने प्रतिरोध का मार्ग चुना। उस समय जब बड़े-बड़े लोग सत्ता के आगे नतमस्तक हो रहे थे तब उन्होंने खुलकर विरोध किया। सेंसरशिप, गिरफ्तारियाँ, दमन और भय के उस वातावरण में भी उनकी आवाज़ नहीं डगमगाई। वे आंदोलन का हिस्सा बने, जेल गए, प्रताड़नाएँ सहीं और बड़ौदा डायनामाइट कांड में स्व० जॉर्ज फ़र्नाडिस के साथ सह-अभियुक्त बने। बड़ौदा डायनामाइट कांड सिर्फ़ एक मुकदमा नहीं बल्कि स्व० विक्रम राव जी के उस संघर्ष का प्रतीक था जिसमे उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा रखा था।

उनके संघर्ष का भार केवल उन्होंने नहीं उठाया। उनके परिवार ने भी उस कठिन समय में असंख्य कष्ट सहे। असुरक्षा, आर्थिक दबाव और सामाजिक कठिनाइयों के बीच भी परिवार ने जिस धैर्य और साहस के साथ उनका साथ निभाया वह भी लोकतंत्र की उस लड़ाई का मौन लेकिन अमूल्य अध्याय है।

विक्रम राव जी बड़े ट्रेड यूनियन नेता रहे किंतु उनका चिंतन राष्ट्रविरोधी वैचारिक आग्रहों से हमेशा दूर था। वे श्रमिकों के अधिकारों के पक्षधर थे परंतु राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते थे।

25 जून को आपातकाल की प्रत्येक बरसी पर लोकतंत्र सेनानी समिति द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में विक्रम राव जी की उपस्थिति केवल औपचारिक नहीं होती थी, वे आते थे तो मानो संघर्ष का पूरा इतिहास साथ लेकर आते थे। उनके शब्दों में अनुभव था, चेहरे पर संघर्ष की तपिश थी और व्यक्तित्व में ऐसी ऊर्जा थी जो हर लोकतंत्र सेनानी का उत्साह बढ़ा देती थी। आज उनकी अनुपस्थिति गहरा खालीपन छोड़ती है।

किन्तु सत्य यह है कि ऐसे लोग कभी जाते नहीं। वे अपने संघर्षों, अपने विचारों और अपने साहस के कारण समाज की चेतना में जीवित रहते हैं। आज देश जिस खुली हवा में लोकतंत्र का अनुभव कर रहा है, उसमें राव साहब जैसे लोगों का त्याग और तप स्पष्ट दिखाई देता है।

उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर हम सभी लोकतंत्र सेनानी उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह संकल्प लेते हैं कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा के लिए उनके दिखाए मार्ग पर सदैव अडिग रहेंगे।

स्वर्गीय श्री के. विक्रम राव जी को शत-शत नमन।

(लेखक आपातकाल लोकतंत्र सेनानी समिति के प्रदेश अध्यक्ष हैं)

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