【अब देरी क्यों मस्जिद बनाने में?】

लेखक~डॉ.के. विक्रम राव

♂÷अयोध्या जनपद में सुन्नी वक्फ बोर्ड वाली मस्जिद तैयार करने में गंभीर विघ्न आ गये हैं। रामजन्म भूमि से केवल 25 किलोमीटर दूर सोहावल तहसील के ग्राम धन्नीपुर में प्रस्तावित पांच एकड़ भूमि पर बाबर के नमाजखाने के ऐवज में मिली भूमि में इबादतगाह निर्माण ​पर मुस्लिम समाज में तीव्र विभाजन हो गया है। मशहूर विधि वेत्ता, प्रखर इस्लामी चिन्तक तथा मिल्लत के अव्वल पुरोधा जनाब जफरयाब जिलानी साहब ने कह दिया कि किसी अदला—बदली में मिली जमीन पर मस्जिद निर्मित करना शरियत कानून के विरुद्ध है। वर्जित है। उनकी सुविचारित राय में यह नाजायज है। वक्फ बोर्ड को जिसकी स्थापना ही शरियत पर हुई है ऐसी नापाक हरकत नहीं करना चाहिये। वे बाबरी मस्जिद एक्शन समिति के संयोजक थे और अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव हैं।
इसी बोर्ड के गणमान्य सदस्य तथा मजलिसे इतिहादे मुसलमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा सांसद असदुद्दीन ओवैसी का भी ऐसा ही कहना है कि विनिमय में प्राप्त की गयी भूमि पर उपासना स्थल बनाना हराम है। इस राय को वे उच्चतम न्यायालय में सुनवायी के दौरान भी दर्ज करा चुके हैं। किन्तु अयोध्या मस्जिद निर्माण न्यास के सचिव जनाब अतहर हुसैन का मानना है कि नमाज के लिये ही मस्जिद बनायी जाती है। अत: वह धन्नीपुर की जमीन पर निर्मित हो सकती है। इन वरिष्ठ इस्लामी नेताओं का आरोप है कि यूपी वक्फ बोर्ड भाजपा सरकार के दबाव में है। इसीलिये दूसरे स्थल पर मस्जिद निर्माण हेतु राजी हो गया है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के वक्फ तथा हज के राज्य मंत्री जनाब मोहसीन रजा का भी मानना है कि मस्जिद धन्नीपुर में ही बने। इसका नाम किसी सुल्तान अथवा बादशाह के नाम पर न रखा जाये। वरन् मस्जिदे—मोहम्मद कहा जाये। इस भाजपायी मंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि उजबेक से भारत पर हमला करने आये मोहम्मद जहीरुद्दीन बाबर के नाम पर तो नयी इबादतगाह कतई न हो।

उधर अखिल भारतीय ईमाम ऐसोसियेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मियां साजिद रशीदी ने इस्लाम का वास्ता देकर ऐलान कर दिया है कि जिस जगह मुगलकाल में मस्जिद बनी थी उसी स्थल पर ही वह दोबारा निर्मित होगी। राममंदिर को तोड़कर यह किया जायेगा। उन्होंने कहा कि ”इस्लाम कहता है कि मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहेगी। कुछ अन्य इमारत बनाने के लिये मस्जिद नहीं तोड़ी जा सकती है।” उन्होंने कहा कि,”हमारा मानना है कि बाबरी मस्जिद वहां थी और वह हमेशा मस्जिद के रुप में वहीं रहेगी। कोई मंदिर को गिराकर वहां मस्जिद कभी भी नहीं बनायी गयी थी। लेकिन अब हमारे लिये ऐसा हो सकता है। अर्थात मंदिर गिराकर वहां फिर से मस्जिद बनाई जायेगी।”
इसी बीच वक्फ बोर्ड द्वारा गठित इंडो—इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के न्यास के सचिव जनाब अतहर हुसैन ने बताया कि पन्द्रह हजार वर्ग फीट पर नयी मस्जिद धन्नीपुर में ही बनेगी। हालांकि अधिकतर मुसलमानों का मानना है कि उच्चतम न्यायालय का निर्णय तथ्यों पर नहीं वरन् आस्था पर ​दिया गया है। दिल्ली के जामिया मिलिया के वास्तुकला संकाय के डीन प्रोफेसर एसएम अख्तर साहब ने बताया कि मस्जिद का रुप—आकार बनाना शीघ्र होगा। इस पांच एकड़ भूमि के मध्य में पूजास्थल होगा। मुख—दिशा पश्चिम में काबा शरीफ की ओर रहेगी। अस्पताल, अनुसंधान केन्द्र तथा भोजनालय भी बनें।

उच्चतम न्यायालय की खण्ड पीठ के न्यायमूर्ति—द्वय रोहिन्टन फाली नरीमन तथा केएम जोसेफ ने शिशिर चतुर्वेदी तथा कमलेश शुक्ला की याचिका (अगस्त 2020) को खारिज कर दिया। इसमें मांग की गयी थी कि उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारी इस नयी मस्जिद के नियंत्रण बोर्ड में नामित हो ताकि वित्तीय हेराफेरी को रोका जा सके। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने सरकारी प्रतिनिधि के मनोनयन का विरोध किया था। मस्जिद प्रशासन में शासकीय हस्तक्षेप गवारा नहीं होगा।

सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जनाब जफर फारुकी ने वकील जिलानी के आरोपों को नकारते हुये कहा कि, ”बोर्ड ने धन्नीपुर की पांच एकड़ जमीन पर स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान किया गया हैं। अत: ऐवज की कोई बात ही नहीं है।” अतहर हुसैन ने जिलानी को चुनौती दी कि वे अदालती मार्ग लें।
÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व स्वतंत्र पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷

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