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♂÷2014, 2019 के चुनावों में भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य दलों के कई नेताओं के कुछ वक्तव्य, जिनमें ऐतिहासिक ग़लतियाँ थीं, बहुत चर्चा में आये थे। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है चूँकि राजनेताओं के पास अध्ययन का समय नहीं होता। आप नरेंद्र भाई, अमित शाह, उद्धव ठाकरे, मणि शंकर अय्यर, शशि थरूर, मायावती, राहुल गाँधी, कमल नाथ या ऐसे ही किसी अन्य राजनेता से किसी विषय के वृहद ज्ञान की आशा नहीं कर सकते। जिस व्यक्ति प्रतिदिन 100-200 लोगों से मिलना हो, विभिन्न समस्याओं पर बात करनी हो वो किसी विषय के गंभीर चिंतन के लिये मूल पुस्तकों को कब पढ़ेगा ?

वैश्विक राजनीति में कहीं भी यह सम्भव ही नहीं होता। इस कार्य के लिये विद्वान होते हैं, जिनका दैनंदिन कार्य अध्ययन, ज्ञान अर्जन करना होता है। उन्हीं का काम समाज का मन बनाना होता है, नैरेटिव सैट करना होता है। दुर्भाग्य है कि भारत में लचर और लगभग अनपढ़ मीडिया इस कार्य को कर रहा है। आइये मीडिया के घोषित ‘सदी के महानायक’ पर बात करते हैं। सदी के महानायक का नाम सुनते ही आपके ध्यान में कौन आया ? इनका धर्म, राष्ट्र, समाज की बौद्धिकता के उत्थान में क्या योगदान है ? कुछ भी नहीं तो यह सदी के महानायक कैसे घोषित हो गये ?

भारत में सदैव से शास्त्रार्थ की परम्परा रही है। विद्वान् आचार्य अपने सिद्धांतों को तथ्य, तर्क की कसौटी पर स्वयं भी कसते हैं और अन्य विद्वान भी उन्हें चुनौती देते हैं। “गाँधी और गाँधीवाद यानी अहिंसा और उनकी असफल राजनीति” पर तार्किक चर्चा किसी के लिये असुविधाजनक हो तो ध्यान रहे कि यह भारत की परंपरा है। सैद्धांतिक चुनौती को जबरन रोकना, चुनौती देने वाले को मार डालना तो एब्राह्मिक तथा साम्यवादी परंपरा है। यह चर्चा इसलिये भी आवश्यक है कि गाँधी की मृत्यु हुए 71 वर्ष बीत गये मगर गाँधीवाद अभी तक प्रचलन में है। गाँधी द्वारा प्रतिपादित बातें वाद बन कर प्रभावी नैरेटिव बनी हुई हैं।

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तो आइये प्रारम्भ करते हैं। गाँधी का जीवन दो प्रमुख अवधारणाओं ‘अहिंसा और ब्रह्मचर्य’ के इर्दगिर्द घूमा। यह दोनों अवधारणाएं भारत के लिये अपरिचित या नई नहीं हैं। भारत की मनीषा ने जीवन को जिन चार भागों में विभक्त किया वो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास हैं। अहिंसा के दर्शन की जड़ें भी सृष्टि के उषाकाल के ग्रन्थ वेद के अतिरिक्त जैन और बौद्ध दर्शन में प्रभावी रूप से हैं। भारत की चिति में ‘अहिंसा और ब्रह्मचर्य गहरे है मगर यह दोनों बातें व्यक्तिगत जीवन के लिये हैं। यह राज्य की योजना का अंग नहीं होतीं।

भारतीय मनीषा ने व्यक्ति के शिक्षण के समय को ब्रह्मचर्य में निबद्ध किया। गृहस्थ जीवन बिताने के बाद वानप्रस्थ और संन्यास को भी ब्रह्मचर्य के अंतर्गत रखा मगर वानप्रस्थ और संन्यास बाध्यता नहीं थी। महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र जैसे ऋषि, चक्रवर्ती सम्राट दिलीप, सगर, मान्धाता, राम, योगवतार कृष्ण जैसे अनंत नामों की शृंखला है जिन्होंने जीवन का शिक्षण काल ब्रह्मचारी के रूप में गुरुकुल में व्यतीत किया। बाद में यह सब गृहस्थ हुए। क्या किसी ने इनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बारे में पढ़ा-सुना है ?

ब्रह्मचर्य के प्रयोग राष्ट्र की चिति के विपरीत पहली बार गाँधी ने किये। गाँधी ने न केवल स्वयं ब्रह्मचर्य धारण किया बल्कि अपने अनेक साथियों, उनकी पत्नियों-पुत्रियों-बहनों से धारण करवाया। फिर ब्रह्मचर्य को परखने के लिये किशोरियों-तरुणियों के साथ दोनों का साथ-साथ नग्न सोना, परस्पर नग्न हो कर मालिश कराना, नग्न हो कर साथ-साथ स्नान करना जैसे भारतीय मनीषा के लिये अटपटे कार्य किये। सृष्टि के उषा काल से ही राष्ट्र के घटक ब्रह्मचर्य धारण करते रहे हैं मगर ऐसे कार्य कभी किसी ने भी नहीं किये।

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यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि यह सारे प्रयोग स्वयं गाँधी साहित्य में हैं। गाँधी के पट्ट शिष्य नेहरू, पटेल आदि इनके विरोध में थे। इनकी बाक़ायदा गाँधी से चिट्ठी-पत्री हुई मगर गाँधी इन हरकतों का सत्य के प्रयोग कह कर बचाव करते रहे। यह किस तरह सत्य के प्रयोग थे ? ब्रह्मचर्य की यह विचित्र अवधारणा भारतीय मनीषा के लिये तब भी अटपटी थी और आज भी अजीब है। गाँधी ने स्वेच्छा से ब्रह्मचर्य के नितांत निजी अर्थ किये। अहिंसा पर भी उनकी धारणा चिति के विपरीत थी। भारत के लिये अहिंसा का अर्थ दुष्ट के सामने झुकना नहीं है।

गाँधी महाभारत के जिस श्लोक अहिंसा परमोधर्मः से अहिंसा की महिमा प्रतिपादित करते थे वो अधूरा है। उसका अगला भाग ‘अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:’ अहिंसा परम् धर्म है, धर्म के लिए हिंसा परम धर्म है। अहिंसा पर भी गाँधी की दृष्टि भारतीय मनीषा से बिलकुल विपरीत थी। गाँधी के व्यक्तिगत जीवन में ही यह रहता तो सहा जा सकता था मगर इसका परिणाम धर्म, राष्ट्र और देश के लिये बहुत भयानक हुआ। इस पर आगामी भागों में विस्तृत चर्चा करेंगे।

लेखक~तुफ़ैल चतुर्वेदी

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार है
पहला भाग
क्रमशः

By Mukesh Seth

Chief Editor

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