【देश की धूल भी चन्दन से कम नहीं होती】

★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
{युगों युगों तक निराशा में आशा का संचार करती रहेंगी डाॅ0 क्षेम की रचनाएं}
[साहित्य वाचस्पति डॉ0 श्रीपाल सिंह क्षेम के 98वें जन्मदिवस पर विशेष लेख]
♂÷एक पल ही जियो, फूल बनकर जियो, शूल बनकर ठहरना नहीं जिन्दगी। जैसी अनेक रचनाओं के प्रणेता छायावादोत्तर युग के श्रेष्ठ कवि एवं समीक्षक साहित्य वाचस्पति डाॅ० श्रीपाल सिंह क्षेम का जन्म 02 सितम्बर सन् 1922 को जनपद मुख्यालय से 10 किमी पश्चिम में स्थित बशारतपुर ग्राम में हुआ। प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा जौनपुर में ग्रहण करने के पश्चात उच्च शिक्षा उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रहण की। इलाहाबाद उन दिनों हिन्दी साहित्य का केन्द्र था। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाणी ‘निराला‘, महीयसी महादेवी वर्मा, डाॅ० रामकुमार वर्मा, डाॅ० जगदीश गुप्त, डाॅ० धर्मवीर भारती जैसे दिग्गज साहित्यकारों से इलाहाबाद का वातावरण साहित्यिक हो चुका था। उस समय की साहित्यिक संस्था ‘परिमल‘ में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, डाॅ0 धर्मवीर भारती, विजयदेव नारायण शाही जैसे साहित्यकार सम्मिलित थे। डाॅ0 क्षेम भी इस संस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भ बने। नयी कविता के दौर में जब गीतों की उपेक्षा हो रही थी। तब डाॅ0 क्षेम ने उच्चकोटि के साहित्यिक गीतों की रचना करके गीतों को साहित्य में स्थापित करने का कार्य किया। डाॅ0 क्षेम के गीतों को श्रोता मन्त्रमुग्ध होकर सुनते थे। कवि सम्मेलन के मंचों पर उनकी उपस्थिति ही कार्यक्रम की सफलता के लिये पर्याप्त मानी जाती रही। डाॅ0 क्षेम ने जहां प्रेम और श्रृंगार की रचनायें की, वहीं उन्होंने राष्ट्रीय, सामाजिक दायित्वों का भी साहित्य के क्षेत्र में कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है-
जन्म की भूमि भी कुन्दन से कम नहीं होती।
राष्ट्र की रागिनी वन्दन से कम नहीं होती।।
आओ, चुटकी से उठा माथ से लगा लें हम।
देश की धूल भी चन्दन से कम नहीं होती।।
जैसी कविताओं से डाॅ0 क्षेम ने राष्ट्रीय ऊर्जा को संचारित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। नीलम तरी, संघर्ष-तरी, राख और पाटल जैसी अनेक पुस्तकों के रचयिता डाॅ0 क्षेम ने ‘कृष्ण द्वैपायन‘ जैसे उत्कृष्ठ महाकाव्य की रचना करके राष्ट्रभाषा को गौरवान्वित किया। साहित्य वाचस्पति डाॅ0 श्रीपाल सिंह क्षेम जितने सक्षम गीतकार थे उतने ही समर्थ समीक्षक भी रहे। छायावाद की काव्यसाधना, छायावाद के गौरवचिह्न उनकी उत्कृष्ठ गद्य रचनायें हैं।
उच्चकोटि के कवि एवं समीक्षक होने के साथ-साथ डाॅ0 क्षेम अत्यन्त सरल एवं उदार व्यक्ति थे। राजनीतिक लोगों से उनके अच्छे सम्बन्ध तो रहे किन्तु वे सभी दलों के राजनीतिज्ञों के प्रति समान भाव रखते थे। क्षेमस्विनी संस्था द्वारा उनके जन्मदिन पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में सभी दलों के नेता भाग लेते थे। अनेक ऐसे अवसर देखनें में आये हैं जब भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता व मंत्री रहे उमानाथ सिंह मुख्य अतिथि के रूप में कवि सम्मेलन के मंच पर विराजमान हैं तो वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व सांसद रहे कमलाप्रसाद सिंह मंच पर अध्यक्ष के रूप में आसीन रहे हैं।
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान डाॅ0 क्षेम की उपलब्धियों को देखते हुये उन्हें साहित्यभूषण एवं मधुलिमय के पुरस्कार से सम्मानित कर चुका है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने डाॅ0 क्षेम को साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया है। यद्यपि डाॅ0 क्षेम आज हमारे बीच नहीं है फिर भी उनकी रचनायें युगों-युगों तक निराशा में आशा का संचार करती रहेंगी।

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