लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷आइए हम नए वर्ष की ढ़ेर शुभकामनाओं के साथ संकल्प लें कि कोरोना महामारी पर विजय हासिल कर राष्ट्र व समाज निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे। उर्जा और उल्लास के साथ चतुर्दिक खुशहाली, समृद्धि और समरसता का वातावरण रचेंगे। जन-जन के मन में शुभकामनाएं प्रस्फुटित हों ऐसी कामना करें। हर नया वर्ष निराशाओं के भंवर से पार पाने और भविष्य के नए सपने बुनने-गढ़ने और उसे आयाम देने की प्रेरणा और संकल्प की ताकत देता है। यह संकल्प ही जीवन को उत्सवधर्मी और अपराजेय बनाता है। नई ऊंचाइयों को छूने और विफलताओं को विस्मृत करने की उर्जा देता है। वैमनस्यता, कटुता, दुर्भावना और हीनता को पीछे ढ़केल सहजता, उदारता और नवीनता को आत्मसात कर आगे बढ़ने की ताकत देता है। चैतन्यता से भरपूर यह संकल्प स्वयं के जीवन को समुन्नत बनाने के साथ-साथ समाज व देश की भाषा, संस्कृति, विविधता, सर्वधर्म समभाव और लोकमान्यताओं को संवारने और सहेजने का आत्मबल देता है। आइए हम समवेत प्रयास करें कि यह नया साल भी उत्सवधर्मी भारतीय जनमानस को एक नया संकल्प, नई ऊंचाई और नया विचार देगा। विचारों के इस संकल्प को उर्वरता और मुखरता प्रदान करने के साथ उत्थान व विकास की नई लकीर खिंचेगा। ऐसा इसलिए कि राष्ट्र व समाज के उत्थान में ही स्वयं के उत्थान व विकास के बीज निहित होते हैं। भारतीय जनमानस को इस नए साल में इसी उत्थान व विकास के बीज के प्रकीर्णन का संकल्प लेना होगा। इस बीज के प्रस्फुटन से ही देश में तरक्की का अमृत रस छलकेगा और सौहार्द का वातावरण निर्मित होगा। तरक्की व सौहार्द के जुड़ाव से ही राष्ट्र व समाज कीे चेतना मजबूत होती है। बड़े-बड़े संकल्पों और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। राष्ट्र का मान और शान बढ़ता है।यह नया साल भी इन्हीं संकल्पों को पूरित करने का एक सात्विक क्षण है। इसी क्षण में संकल्पों के जरिए भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी और धार्मिक-सांस्कृतिक टकराव को मिटाया जा सकता है। इसी क्षण में भारत राष्ट्र के सनातन मूल्यों को सहेजा जा सकता है। इसी क्षण में लोककल्याण के मार्ग के विध्न-बाधाओं को दूर किया जा सकता है। बस संकल्पों को साधने की जरुरत है। और यह कार्य हम छोटे-छोटे प्रयासों के जरिए कर सकते हैं। बस सिर्फ आसपास सकारात्मक नजरें दौड़ाने की जरुरत है। हमारे आसपास अभावग्रस्त लोगों की कमी नहीं है। हम चाहें तो इन्हें मदद और जागरुकता के जरिए नए साल का उपहार दे सकते हैं। इस समय भीषण ठंड है। ऐसे हजारों लोग हैं जिनके पास गरम कपड़े नहीं हैं। वे ठंड से ठिठुर रहे हैं। देखा जाता है कि हर वर्ष ठंड और भूख से हजारों लोग मरते हैं। हम इन्हें कपड़े और भोजन प्रदान कर उनकी रक्षा और सेवा का व्रत ले सकते हैं। सेवा को परमोधर्म कहा गया है। इसी सेवा भाव से हम स्कूल जाने वाले गरीब घरों के बच्चों की मदद कर सकते हैं। मसलन उन्हें स्वेटर, गर्म कपड़े और जूते-मोजे और पाठ्य-पुस्तकें देकर उनकी राह आसान कर सकते हैं। कई छोटे-बड़े स्वयंसेवी संगठन इस पुनीत कार्य में जुटे भी हैं। अगर यहीं कार्य हर संपन्न व्यक्ति के स्तर से हो तो समाज के अभावग्रस्त लोगों तक मदद पहुंचेगा और समाज में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। यह सकारात्मक संदेश रुपी उर्जा ही एक राष्ट्र को दुनिया के अग्रिम देशों की कतार में खड़ा करती है। सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करती है। अंतिम हाशिए पर खड़े-पड़े अभावग्रस्त लोगों के होठों पर मुस्कान व मिठास बिखेरती है। गांधी जी के सपने को साकार करती है। इस दिशा में सभी राज्य सरकारों का पहल स्वागतयोग्य है। वह रैन बसेरों के जरिए जरुरतमंदों की रक्षा कर रही है। सरकारें गरीबों और जरुरतमंदों के कल्याण के लिए कई लाभकारी योजनाएं चला रही हैं। लेकिन बढ़ती आबादी की चुनौतियों को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है। इससे निपटने के लिए जन-जन की भागीदारी और सहभागिता आवश्यक है। हर वर्ष लाखों टन भोजन बर्बाद बर्बाद हो जाता है। हमलोग घर में बचे भोजन को इधर-उधर फेंक देते हैं। अगर हम आसपास के लोगों तक भोजन पहुंचाएं तो उनका भला हो सकता है। वैसे भी भारत की सनातक संस्कृति और मूल्य-विचार मिलजुलकर रहने और मिल-बांटकर खाने की प्रेरणा देते हैं। हमें इन आजमाए हुए मूल्यों पर आगे बढ़ना चाहिए तभी एक स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण होगा। हमारे आसपास ऐसे लोगों की कमी नहीं जो बीमार और अस्वस्थ हैं। उनके पास धन का अभाव है तथा साथ ही जागरुकता की कमी भी है। हम उन्हें सहयोग कर अस्पताल पहुंचा सकते हैं। इस कार्य में देश के लाखों चिकित्सक अहम भूमिका निभा सकते हैं। वे अपने आसपास रहने वाले गरीब लोगों का निःशुल्क इलाज व दवा प्रदान कर उनकी सेवा कर सकते हैं। चिकित्सकों को दूजा भगवान की संज्ञा दी गयी है। लिहाजा उन्हें भगवान जैसा आदर्श विचार का संकल्प लेना चाहिए। इसी तरह देश के वकील, नौकरशाह, सरकारी कर्मचारी और उद्योगपति भी देश को संवारने में अपना सकारात्मक योगदान दे सकते हैं। देश प्रदूषण की समस्या से कराह रहा है। हर वर्ष लाखों लोग प्रदूषण के कारण जान गंवाते हैं। प्रदूषण के कारण लोगों की उम्र कम होती जाती है। इस प्रदूषण के लिए कहीं न कहीं हम देश के नागरिक ही जिम्मेदार है। आइए हमलोग संकल्प लें कि इस वर्ष प्रदूषण नहीं फेलाएंगे और पर्यावरण की रक्षा करेंगे। प्रदूषण की तरह गंदगी भी एक भीषण समस्या है। गंदगी के कारण विभिन्न किस्म के रोग उत्पन होते हैं। सरकार हर वर्ष इन रोगों से निपटने के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च करती है। गंदगी मिटाने के लिए देश में स्वच्छता कार्यक्रम चलाया जा रहा है। देश के प्रधानमंत्री मन की बात के जरिए लोगों को जागरुक कर रहे हैं। हमलोग इस नए साल में समूहबद्ध होकर अपने आसपास की गंदगी को साफ करने और वातावरण को स्वच्छ बनाने का संकल्प ले सकते हैं। अगर ऐसा करते हैं तो बीमारियो पर खर्च होने वाली धनराशि को शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मदों में खर्च किया जा सकता है। देश में नशाखोरी भी एक भयावह समस्या है। बिडंबना यह है कि युवाओं में नशाखोरी की प्रवृत्ति कम होने के बजाए बढ़ रही है। विगत दशकों में हर छोटे-बडे़ समारोहों में शराब सेवन का प्रचलन बढ़ा है। इससे युवाओं का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। साथ ही घर-परिवार का माहौल भी दूषित व तहस-नहस हो रहा है। दूसरी ओर शराब सेवन के कारण समाज में अपराध और बलात्कार जैसी बुराइयां बढ़ रही हैं। युवाओं में धूम्रपान की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। कहा जाता है कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। इस वर्ष युवाओं को संकल्प लेना चाहिए कि वह शराबखोरी और ध्रुम्रपान का परित्याग करेंगे। गांधी जी ने नशामुक्त भारत का सपना देखा था। उस सपने को देश के युवा पूरा कर सकते हैं। भारत एक विविधतापूर्ण बहुधर्मी व संस्कृति संपन्न देश है। यह देश की खुबसुरती है। लेकिन जब देश में धार्मिक-सांस्कृतिक टकराव होते हैं तो देश की एकता और अखंडता को चोट पहुंचती है। हिंसा से हजारों लोगों की जान चली जाती है। हजारों करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान होता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इन हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम देने के लिए युवाओं का इस्तेमाल होता है। अभी गत वर्ष ही देश में कुछ नीतिगत मसलों पर व्यापक स्तर पर हिंसा और उपद्रव देखने को मिला। इस उपद्रव में बड़े पैमाने पर युवा चेहरे शामिल देखे गए। यह ठीक नहीं है। राष्ट्र निर्माण में युवा उर्जा का उपयोग होना चाहिए न कि नकारात्मक कार्यों में। युवाओं को भी समझना होगा कि वे राष्ट्र की पूंजी है और उनका नकारात्मक इस्तेमाल न हो। सच तो यह है कि युवा वर्ग ही देश में बदलाव का सबसे बड़ा संवाहक है। देश को बदलने, संवारने और सहेजने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसके ही कंधों पर है। आइए हम इस नए वर्ष में भारत राष्ट्र व समाज को समृद्ध, शक्ति संपन्न, समरस और महान बनाने का संकल्प लें।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















