कंगाली के मीनार से कश्मीर का राग

कंगाली के मीनार से कश्मीर का राग

लेखक-अरविंद जयतिलक

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ एक बार फिर पाकिस्तान की बागडोर संभाल लिए हंै। इससे पहले भी वह वर्ष 2022 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वे अगस्त 2023 तक पद पर तब तक विराजमान रहे जब तक कि आमचुनाव के निमित्त संसद को भंग करने का ऐलान नहीं कर दिया गया। शहबाज शरीफ ने पद संभालते ही एक बार फिर कश्मीर का राग अलापा है। उन्होंने नेशनल असेंबली में कश्मीर और फिलिस्तीन की आजादी का राग अलापाते हुए एक प्रस्ताव पारित करने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि कश्मीर में कश्मीरियों के खून बहाए जा रहे हैं और पूरा वादी खून से सुर्ख है। उन्होंने वैश्विक समुदाय पर भी तंज कसते हुए कहा है कि इस मसले पर उनके होंठ सिले हुए हैं। मजेदार बात है कि दूसरी ओर उन्होंने भारत से दोस्ती की वकालत भी की है। जबकि भारत पहले ही कह चुका है कि टेरर और टाॅक एक साथ नहीं चल सकते। फिलहाल शहबाज शरीफ के जहरबुझे बयान से एक बात स्पष्ट है कि वे अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की तरह भारत विरोध के खोल से बाहर निकलने वाले नहीं हैं। जबकि वे अच्छी तरह जानते हंै कि उनके समक्ष बर्बाद हो चुके पाकिस्तान को संभालने-बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्हें पता है कि मौजूदा समय में पाकिस्तान कंगाली के कगार पर खड़ा है और अगर वे पाकिस्तान को आर्थिक संकट से निकालने में सफल नहीं हुए तो सेना कभी भी उनकी बांह मरोड़कर तख्त-ओ-ताज छिन सकती है। किसी से छिपा नहीं है कि सेना की मदद से ही वे प्रधानमंत्री बन सके हैं। पाकिस्तान की मौजूदा हालात पर नजर टिकाएं तो बढ़ता विदेशी कर्ज, विदेशी मुद्रा भंडार में अप्रत्याशित कमी और आयात-निर्यात के बिगड़ते संतुलन ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचा दिया है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार 16.1 फीसदी की तीव्र गिरावट के साथ दस साल के सबसे निम्नतम स्तर पर पहुंच चुका है। उसका रुपया अमेरिकी डाॅलर के मुकाबले तकरीबन 287 रुपए के भाव पर कारोबार कर रहा है। उत्पादन और खपत दोनों में जबरदस्त गिरावट है। रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। लाखों परिवारों के सामने भूखमरी की स्थिति है। आटा, दाल और चावल जैसी रोजमर्रा की वस्तएं खरीदने के लिए लोगों को सोचना पड़ रहा है। रोटी के लिए लोग जान गंवा रहे हैं। अभी गत माह पहले ही देखा गया कि आयात से भरे शिपिंग कंटेनर बंदरगाहों पर जमा हो रहे थे। क्योंकि खरीददार उनके लिए भुगतान के लिए डाॅलर सुरक्षित रखने में विफल साबित हो रहे थे। रोलिंग ब्लैक आउट और विदेशी मुद्रा की भारी कमी के कारण कल-कारखने के पहिए ठप्प पड़ चुके हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतें 331 और 329 रुपए प्रति लीटर के पार पहुंच चुकी है। मिट्टी के तेल की कीमत भी 190 रुपए प्रति लीटर के आसपास है। दूसरी ओर बिजली की आपूर्ति ठप्प पड़ती जा रही है। इस समय सिर्फ 20 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है जबकि बिजली की डिमांड 30 हजार मेगावाट से अधिक है। नेशनल ग्रिड बार-बार फेल हो रहा है। इसका असर न सिर्फ कल-कारखानों पर पड़ रहा है बल्कि अस्पतालों में आॅपरेशन थिएटर भी बंद करना पड़ रहा है। अगर शहबाज शरीफ अर्थव्यवस्था को सुधारने के बजाए कश्मीर राग में ही फंसे रहे तो पाकिस्तान को दिवालिया होने से बचाया नहीं जा सकता। पाकिस्तान में सबसे बुरा हाल आम आदमी का है। उसके जीवन पर संकट है। क्योंकि खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही है। गरीबी और बेरोजगारी रिकार्ड स्तर पर है। बीते साल 10 लाख युवाओं ने पाकिस्तान से पलायन किया है। गरीबी के कारण स्थिरता और सुरक्षा देने वाली सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था चरमरा उठी है। विडंबना यह कि एक ओर देश का आम आदमी आटे और चावल के अकाल का सामना कर रहा है वहीं देश में नेता और सेना के अधिकारियों की संपत्ति दिन दूनी और रात चैगुनी बढ़ रही है। सच कहें तो देश खजाना खत्म होने के लिए नेता और सेना के अधिकारी ही जिम्मेदार हैं। इसका फायदा आतंकी संगठन उठा रहे हैं और देश को बारुद के ढ़ेर पर रख दिया है। आए दिन बम विस्फोट में लोगों की जान जा रही है। देश में आतंकवाद की वजह से मानसिक स्वास्थ्य के रोगियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। हद तो यह है कि 20 करोड़ पाकिस्तानियों के लिए देश में सिर्फ 450 प्रशिक्षित मानसिक चिकित्सालय हैं। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो आज पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। नए मानकों के आधार पर जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुजर-बसर करने वाले लोगों की तादाद 8 करोड़ से पार है। पाकिस्तान के केंद्रीय योजना व विकास मंत्रालय के मुताबिक देश में गरीबों को अनुपात बढ़कर 40 फीसदी के पार पहुंच चुका है। जबकि 2001 में गरीबों की तादाद दो करोड़ थी। आश्चर्य होता है कि एक ओर देश के हुक्मरान विकास का दावा करते हैं वहीं दूसरी ओर गरीबी का लगातार विस्तार हो रहा है। भूखमरी से हर दिन सैकड़ों लोगों की जान जा रही है। रोजगार के अवसर घट रहे हैं और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। आज की तारीख में पाकिस्तान के हर नागरिक पर तकरीबन 1 लाख 50 हजार रुपए से अधिक का कर्ज है। किसानों की हालत बेहद दयनीय है। गरीबी और कर्ज में डूबे होने की वजह से उनकी आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। आज पाकिस्तान की स्थिति इराक, सीरिया और लेबनान से भी बदतर हो चुकी है। विचार करें तो इसके लिए पाकिस्तान स्वयं जिम्मेदार है। वह अपनी धरती पर आतंकियों को प्रश्रय देने के साथ वैश्विक समुदाय से मिल रही आर्थिक मदद को विकास पर खर्च करने के बजाए भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों पर खर्च कर रहा है। आतंकवाद पर उसके लचर रवैए का नतीजा है कि आज उसके एक बड़े भू-भाग पर परोक्ष रुप से आतंकियों ने कब्जा कर रखा है। एक दशक से उसके हुक्मरान दहशतगर्दी को नेस्तनाबूद करने का राग अलाप रहे हैं लेकिन परदे के पीछे आतंकियों की मदद कर रहे हैं। याद होगा वर्ष 2016 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल के कोझिकोड की रैली में विशाल जनसमुदाय को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के अवाम का आह्नान करते हुए कहा था कि उन्हें अपने हुक्मरानों से सवाल पूछना चाहिए कि उनके हुक्मरानों ने किस तरह का देश बना रखा है जिसकी छवि आतंकी देश जैसी बन रही है। उन्हें सवाल पूछना चाहिए कि उनके हुक्मरान अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी से लड़ने के बजाए आतंकवाद से कंधा क्यों जोड़े हुए हंै। उनसे पूछना चाहिए कि एक साथ आजादी प्राप्त करने के बाद भी क्या कारण है कि भारत साॅफ्टवेयर का निर्यात कर रहा है और उसके हुक्मरान आतंकवाद का निर्यात कर रहे हंै। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के हुक्मरानों को आईना दिखाते हुए यह भी कहा था कि भारत-पाकिस्तान के बीच बेरोजगारी खत्म करने और गरीबी मिटाने के लिए मुकाबला होना चाहिए। यह देखना चाहिए कि कौन-सा देश इन समस्याओं को पहले खत्म करता है। पाकिस्तान और विश्व की मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी के इस संदेश की खूब सराहना हुई थी। दुनिया भर में संदेश गया था कि भारत अपने पड़ोसी को लेकर कितना संवेदनशील है। लेकिन पाकिस्तान के रुख में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया। वह भारत विरोधी अपने पुराने रुख पर कायम है। नतीजा सामने है। आज भारत विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन चुका है वहीं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से मिलने वाली सहायता पर निर्भर होकर रह गयी है। अब शहबाज शरीफ को तय करना है कि वह पाकिस्तान को आतंक की राह पर बढ़ते देखना चाहते हैं या विकास के पथ पर।

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(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)

Mukesh Seth

Chief Editor

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