लेखक-अरविंद जयतिलक
भारत की राजधानी नई दिल्ली में भारत, अमेरिका, जापान और आस्टेªलिया के समूह क्वाॅड (क्वाड्रिलेटरल सेक्युरिटी डायलाॅग) के विदेश मंत्रियों की बैठक संपन्न हो गया। समूह देशों ने बैठक में होर्मुज संकट और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा के साथ आतंकवाद पर ‘जीरो टाॅलरेंस’ की नीति पर आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता जाहिर की। सदस्य देशों ने अपने साझा बयान में ‘मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत’ पर प्रतिबद्धता जताते हुए इस क्षेत्र में समुद्री गतिविविधयों की निगरानी के लिए तकनीक और क्षमताएं साझा करने की शानदार पहल की है। इसे इंडो-पैसिफिक मैरिटाइम सर्विसलांस कोआॅपरेशन इनिशिएटिव नाम दिया है। इसके जरिए हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में जहाजों और समुद्री सुरक्षा की आसानी से निगाहबानी हो सकेगी। उल्लेखनीय है कि दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत समुद्री व्यापार का रास्ता हिंद-प्रशांत क्षेत्र से होकर गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र की निगाहबानी क्वाॅड समूह के लिए आवश्यक है। समूह के सदस्य देशों ने अहम खनिजों मसलन क्रिटिकल रेयर अर्थ मिरल्स के लिए साझा फ्रेमवर्क तैयार किया है। किसी से छिपा नहीं है कि हर इलेक्ट्राॅनिक्स और उच्च उत्पादों के लिए आवश्यक रेयर अर्थ मिनरल्स की 90 प्रतिशत आपूर्ति चीन से होती है। लेकिन अब समूह देशों ने इस मामले में चीन के दबदबे की तोड़ निकाल ली है। समूह देशों के इस पहल से चीन की बेचैनी बढ़ गई है और उसने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि छोटे गुट के जरिए टकराव न न पैदा किया जाए। यह पहली बार नहीं है जब क्वाॅड समूह की बैठक को लेकर चीन की बौखलाहट बढ़ी है। गत वर्ष पहले अमेरिका के डेलवेयर के विलमिंगटन में क्वाॅड (क्वाड्रिलेटरल सेक्युरिटी डायलाॅग) देशों का ऐतिहासिक सालाना लीडर्स समिट संपन्न हुआ तब भी चीन भन्नाया हुआ था। तब सदस्य देशों ने अपने साझा बयान में दक्षिण चीन सागर का जिक्र करते हुए दो टूक कहा था कि ‘हम पूर्वी दक्षिण चीन सागर के हालात को लेकर चिंतित हैं और सभी को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करना चाहिए।’ सच्चाई भी यही है कि इस क्षेत्र की संप्रभुता को मिल रही चुनौती के लिए एकमात्र चीन जिम्मेदार है। उसके द्वारा निर्मित इस परिस्थिति से निपटने के लिए ही क्वाॅड जैसे संगठन की जरुरत महसूस की गई। याद होगा 2007 में भारतीय संसद को संबोधित करते हुए जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने स्पष्ट रुप से कहा था कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती सामरिक चुनौतियों से निपटने के लिए हम सभी को तैयार रहना होगा। उनकी दूरदर्शी सोच और परिकल्पना ही आगे चलकर क्वाॅड के गठन का आधार बनी। गौर करें तो क्वाॅड के गठनकाल से ही चीन की बेचैनी बढ़ी हुई है। उसे लग रहा है कि क्वाड में शामिल देश उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। वह क्वाड को एक उभरता हुआ ‘एशियाई नाटो’ के तौर पर देख रहा है। वह जानता है कि क्वाड की मजबूती से इस क्षेत्र में उसकी मनमानी पर नियंत्रण लगेगा और समुद्र के जरिए दुनिया पर राज करने की उसकी मनोकामना पूरी नहीं होगी। समझना होगा कि क्वाॅड के सदस्य देश अपने पहले वर्चुअल सम्मेलन के दौरान ही चीन को अपने हद में रहने की सलाह दे चुके हैं। तब अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन ने कहा था कि आस्टेªलिया के साथ चीन की आक्रामकता, जापान के सेनकाकू द्वीपों के आसपास उत्पीड़न और भारत के साथ सीमा पर तनातनी को लेकर अमेरिका किसी भ्रम में नहीं है। वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हर परिस्थितियों से निपटने को तैयार है। याद होगा गत वर्ष इसी क्षेत्र में अमेरिका समेत 13 देशों ने ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ (आईपीईएफ) व्यापारिक समझौते को आकार देकर चीन की बढ़ती दादागीरी और धौंसबाजी पर निर्णायक लगाम लगाने की कवायद की थी। चीन की इस हरकत से सभी देश परेशान है। दूसरी ओर वह इस इलाके में सुरक्षा बेड़ा खड़ा कर अन्य देशों की संप्रभुता और सुरक्षा को चुनौती दे रहा है। ऐसे में उस पर नकेल कसना बेहद जरुरी हो गया है। अच्छी बात है कि इस क्षेत्र के सदस्य देशों के बीच सहमति बनती जा रही है। सभी देश सैटेलाइट सिस्टम का इस्तेमाल कर चीन की हरकतों पर लगाम कसने को तैयार हैं। द्वीपीय देशों का भारत के साथ आने से चीन की बेचैनी और छटपटाहट और बढ़ेगी। लेकिन जिस तरह से हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देश चीन के खिलाफ मोर्चा बना रहे हैं उससे स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में अब चीन की दादागीरी नहीं चलने वाली है। चीन के खिलाफ यह पहल इसलिए भी आवश्यक है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुख्य धुरी है। मौजूदा समय में यह क्षेत्र भू-राजनीतिक व सामरिक रुप से वैश्विक शक्तियों के मध्य रण का क्षेत्र बना हुआ है। इस क्षेत्र की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या के तकरीबन एक तिहाई से ज्यादा है। विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 60 फीसदी और विश्व व्यापार का 75 फीसदी कारोबार इसी क्षेत्र से होता है। देखें तो इस क्षेत्र में अवस्थित बंदरगाह विश्व के व्यस्ततम बंदरगाहों में शुमार हैं। यह क्षेत्र इसलिए भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि यहां उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाने वाले क्षेत्रीय व्यापार और निवेश की अपार संभावनाएं हैं। किसी से छिपा नहीं है कि यह क्षेत्र उर्जा व्यापार के लिहाज से भी इस क्षेत्र के देशों के लिए अति संवेदनशील है। ऐसे में इस क्षेत्र को आर्थिक व सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखने के लिए ही क्वाड के अलावा ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ और ‘भारत-प्रशांत द्वीप सहयोग’ जैसे नए-नए गठजोड़ आकार ले रहे हैं। तथ्य यह भी कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को ‘मुक्त एवं स्वतंत्र’ क्षेत्र बनाने के लिए अमेरिका भारत-जापान संबंधों के महत्व को सार्वजनिक रुप से स्वीकार चुका है तथा साथ ही अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र की नीति सर्वोच्च प्राथमिकता में है। दो राय नहीं कि विगत दशकों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर चीन की विशिष्ट पहचान बनी है और वह आर्थिक सुधारों के जरिए विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। लेकिन अब वह जिस आक्रामक तरीके से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी दखलदांजी बढ़ा रहा है उससे अमेरिका, भारत, आस्टेªलिया, जापान के अलावा इस क्षेत्र से जुड़े अन्य देशों का चिंतित होना लाजिमी है। चीन इन देशों की मौजूदा गोलबंदी को समझ रहा है इसीलिए वह इन देशों की भू-संप्रभुता व सामुद्रिक सीमा का लगातार अतिक्रमण कर रहा है। दरअसल उसकी मंशा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत, आस्टेªलिया, फ्रांस और जापान की भूमिका को सीमित कर अपने प्रभाव का विस्तार करना है। उसे भय है कि अगर इस क्षेत्र में इन देशों की निकटता बढ़ी तो परिस्थितियां उसके प्रतिकूल हो सकती है। इसलिए और भी कि जापान ‘एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग’ (एपीईसी) संगठन में भारत की सदस्यता का लगातार वकालत कर रहा है। चीन अच्छी तरह जानता है कि अगर भारत इस संगठन का सदस्य बनता है तो उसकी मनमानी और विस्तारवादी नीति पर लगाम लग सकता है। बहरहाल क्वाॅड देशों की बैठक बेहद सफल रही और उम्मीद किया जाना चाहिए कि सदस्य देशों के बीच आर्थिक और सामरिक-रणनीतिक साझेदारी बढ़ेगी।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




