लेखक -मनोज श्रीवास्तव
सोमवार से उत्तर प्रदेश विधानसभा का सत्र चलने जा रहा है। रविवार को सर्वदलीय बैठक प्रस्तावित है। उसके पहले शनिवार से राज्य की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपने पार्टी के विधायकों से मिल कर मार्गदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को अखिलेश यादव ने भी अपनी पार्टी के विधायकों की बैठक बुलाई है। लोकसभा की भांति यहां भी समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में दो विधायकों वाली कांग्रेस भी सदन के अंदर सरकार को घेरने और बाहर ड्रामा प्ले कर सकती है। करना भी चाहिये, पहले भी किया गया है, कोई साइकिल से आता है तो कोई कार्टून बन कर, सरकार का ध्यान जनसमस्याओं की ओर आकर्षित करने के लिये और मीडिया के माध्यम से अपने विरोध के स्वर को जनता तक पहुंचाने के लिये तरह-तरह के उपक्रम करते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के लोग यदि केंद्र वाले नाटक की पुनरावृत्ति किये तो सरकार के पास उससे निपटने का क्या उपाय हो सकता है।
संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे।वह लोकतंत्र में विरोध करने के लिये हर तरीके का स्वागत करते हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। यह कठिन से कठिन विषयों का त्वरित समाधान के लिये जाने जाते हैं।विपक्ष के लोग यदि उत्तर प्रदेश की विधानसभा में संसद की तरह मनोरंजन करेंगे तो विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना विरोध जता रहे सभी सदस्यों को उत्तर प्रदेश सरकार के खर्चे पर श्रीरामजन्मभूमि मंदिर का स्थलीय निरीक्षण करवा सकते हैं। चूंकि शनिवार को विधानसभा अध्यक्ष अयोध्या जाकर मंदिरों में दर्शन किये, संतों से मिले, प्रशासनिक अधिकारियों से भी मिले, इस लिये एक अनुमान यह भी है कि लोकतांत्रिक विरोध के लोकतांत्रिक समाधान हेतु सभी को श्रीरामजन्मभूमि मंदिर का चप्पा-चप्पा घुमवा दिया जाय। कहाँ कैमरा, कहां चढ़ावा, कहां टिन्नू यादव का कमरा, कहां कैस गिना जाता, कहां धातु संग्रहित होती सबका अवलोकन कराया जा सकता है। अयोध्या में संत पवित्र सरयू के जल और गोमूत्र से स्वागत भी कर सकते हैं।
बहुत हद तक संभावना है इस बार तीन दिन की सदन के कार्यवाही में विपक्ष और सरकार के सह-मात की लोकतांत्रिक लड़ाई का केंद्र राम मंदिर में चढ़ावा चोरी हो। आपको ध्यान होगा कि योगी पार्ट-1 की सरकार में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के मुंह से किसी प्रश्न के उत्तर में यह निकल गया था कि पिछली सरकार में अमुख धन लगता है सैफई का लग रहा था। मौर्य का इतना कहना था कि तत्कालीन नेता विरोधी दल अखिलेश यादव इतने आक्रोश में आ गये कि वह उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के पिता तक चढ़ गये। “जानते हैं क्यों? अखिलेश यादव इस हकीकत को कभी नहीं भूलते की अति पिछड़ों में केशव मौर्य के सामने वह कई बार बौना साबित हुये हैं। चाहे 2017 का चुनाव व या 2022 का वह चुनाव जिसमे ऐन मौके पर योगी सरकार के तीन-तीन कद्दावर मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी भाजपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गये, फिर भी अकेले केशव मौर्य ने गैर यादव समाज के पिछड़ों में अखिलेश यादव को दिन में तारा दिखा कर मुख्यमंत्री बनने का सपना तोड़ दिया। तब से अखिलेश यादव राजनीति में भाजपा को नंबर दो और केशव मौर्य को दुश्मन नम्बर एक मानने लगे”। किसी तरह विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने विषय शांत किया। उसी सत्र में दूसरे दिन नेता विरोधी दल अखिलेश यादव के प्रश्नों के उत्तर में कहा कि अमुख कार्य में मनमाना अपव्य हुआ। यह धन आपके बाप के घर का था तो नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव खड़े हुये और बबुनी बन कर बोले ऐसी भाषा हमारे संस्कार में नहीं है। एक दिन पहले मौर्य समाज के नेता का मानमर्दन करने की इच्छा से आप बाप तक चढ़ गये, जब सही-सही आपके बाप पर कोई चढ़ गया तो आप बगले झांकने लगे। 24 फरवरी 2023 को प्रयागराज में एडवोकेट उमेश पाल की दिन दहाड़े हत्या होती है। उत्तर प्रदेश का विधानसभा सत्र चल रहा था। नेता विरोधी दल के रूप में इस जघन्य हत्या के मामले को अखिलेश यादव उठाये तो लेकिन उठाने से ज्यादा वह कानून व्यवस्था पर योगी आदित्यनाथ की सरकार के कानून व्यवस्था का मजा ले रहे थे। वह योगी आदित्यनाथ को छेड़ रहे थे। तब तक अचानक ही योगी के मुंह से निकल गया है वह इस माफिया को मिट्टी मिला दूंगा।फिर क्या सदन में सन्नाटा फैल गया। मुख्यमंत्री रहते अतीक, मुख्तार, डीपी यादव, और न जाने किससे- किससे न मिल कर स्वच्छ छवि का अभिनय कर रहे थे। अखिलेश के दोहरे चरित्र का पोल तब खुला जब वह बाद में उन्हीं माफियाओं की कब्र पर जाकर माथा टेका और फूल चढ़ाया। जो राम मंदिर कभी नहीं गया वह चढ़ावा चोरों के पकड़े जाने से चोरों को छोड़ कर संतों का अपमान कर रहा है। अखिलेश यादव को भगवान श्रीराम में रत्ती भर आस्था थी तो वह श्रीराम की तरह ही पार्टी पर अधिकार करते, न कि पार्टी पर कब्जा करने के लिये भरे मंच पर तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष और अपने पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल सिंह यादव के साथ जिस तरह का व्यवहार किये थे वह न किये होते। जो मुजफ्फरनगर के दंगाइयों को सरकारी मेहमान बना दिया, “जो हमारी बेटी उसका कल” योजना चला कर कक्षा 6 से 12 तक की हिन्दू छात्राओं को वंचित कर दिया, जो सरकारी पैसे से कब्रिस्तान की बाउंड्री बनाने में बेहिसाब धन लूटा वह अचानक हिन्दू वादी दिखने की कोशिश कर रहा है। यह हिंदुत्व की एकता की ताकत है कि अखिलेश का दोहत चरित्र उजागर हो रहा है।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)





