लेखक-संजय राय
लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि वह असहमति को स्थान देता है। नागरिक सरकार से सवाल पूछ सकते हैं, सड़कों पर उतर सकते हैं, धरना-प्रदर्शन कर सकते हैं और अपनी आवाज़ बुलंद कर सकते हैं। संविधान ने यह अधिकार इसलिए दिया है कि सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे। लेकिन क्या लोकतंत्र का यह अधिकार किसी को अभद्रता, अश्लीलता और महिलाओं के अपमान का भी अधिकार देता है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है।
हाल में जंतर-मंतर पर हुए युवा विद्यार्थियों (जेन जी) के प्रदर्शन के दौरान जिस प्रकार की भाषा सुनने और देखने को मिली, उसने लोकतांत्रिक विमर्श के स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि किसी आंदोलन में अपनी बात रखने के लिए प्रधानमंत्री को मां, बहन या महिलाओं से जुड़ी गालियों का सहारा लेना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि तर्क कमजोर पड़ चुके हैं और भाषा हिंसक हो चुकी है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन किसी की गरिमा को कुचलने का अधिकार नहीं है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अधिकांश गालियां महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई हैं। दो पुरुषों के बीच विवाद हो, लेकिन अपमान किसी महिला का किया जाता है। यह मानसिकता केवल भाषा की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की भी समस्या है। सार्वजनिक मंच से जब ऐसी भाषा बोली जाती है, तब उसका असर लाखों युवाओं पर पड़ता है। धीरे-धीरे अभद्रता सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनने लगती है और समाज संवेदनहीन होता जाता है।
दुर्भाग्य यह भी है कि राजनीतिक दल अक्सर ऐसी घटनाओं पर सिद्धांत नहीं, बल्कि सुविधा के आधार पर प्रतिक्रिया देते हैं। यदि अभद्र भाषा उनके विरोधियों की ओर से आई हो तो उसकी आलोचना होती है, लेकिन अपने समर्थकों द्वारा वही भाषा बोली जाए तो मौन साध लिया जाता है। लोकतंत्र में यह दोहरा आचरण सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है। राजनीति यदि नैतिकता खो दे, तो समाज भी दिशा खोने लगता है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा कटु भाषा की नहीं, बल्कि संयमित संवाद की रही है। महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ी शासन का सबसे प्रखर विरोध किया, लेकिन उनके शब्दों में शालीनता थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सत्ता को चुनौती दी, लेकिन विरोध को कभी व्यक्तिगत अपमान का माध्यम नहीं बनाया। भारतीय लोकतंत्र के बड़े आंदोलनों की ताकत उनकी भाषा और नैतिक ऊंचाई थी, न कि अश्लील नारों में।
हां, भारतीय लोकजीवन में “गारी” की एक अलग परंपरा भी रही है। ब्रज, अवध, मिथिला और विशेष रूप से बनारस में विवाह, होली और लोक उत्सवों में गारियां गाई जाती हैं। उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि अपनापन, हास्य और सामाजिक आत्मीयता का वातावरण बनाना होता है। बनारस की गाली भी इसी लोक-संस्कृति का हिस्सा मानी जाती है। वहां मित्रों के बीच कही गई कई बातें बाहर के व्यक्ति को कठोर लग सकती हैं, लेकिन उनके पीछे दुर्भावना नहीं होती। इसलिए बनारसी गाली की सांस्कृतिक परंपरा और राजनीतिक मंचों पर महिलाओं को अपमानित करने वाली भाषा को एक तराजू पर नहीं तौला जा सकता।
कवि वृंद ने लिखा है—
“फीकी पै नीकी लगै कहिए समय विचारि।
सब को मन हर्षित करें ज्यों विवाह की गारि।।”
अर्थात वही गारी उचित है जो समय, प्रसंग और भावना के अनुरूप सबके मन में प्रसन्नता उत्पन्न करे। जहां अपमान, घृणा और हिंसा हो, वहां गारी नहीं, केवल अभद्रता रह जाती है।
गोस्वामी तुलसीदास का दोहा भी विचारणीय है—
“अमिय गारि गारी गरल, गारि कीन्ह करतार।
तुलसी महिमा गारि की, समझैं बुध न गंवार।।”
इसका एक अर्थ यह भी लगाया गया है कि कटु वचन कभी-कभी सुधार का माध्यम बन सकते हैं, किंतु जब उनका उद्देश्य केवल अपमान हो, तब वे अमृत नहीं, विष बन जाते हैं।
कबीर का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“आवत गारी एक है, उलटत होत अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक।।”
यदि गाली का उत्तर गाली से दिया जाएगा तो समाज अंतहीन वैमनस्य में फंस जाएगा। संयम ही संवाद का पहला नियम है।
लोकवाणी का यह संदेश भी आज याद रखने योग्य है—
“सीख वाको दीजिए जाको सीख सुहाय।
सीख न दीजिए बानरा, घर बया को जाय।।”
अर्थात विचार भी तभी प्रभावी होते हैं जब उन्हें सम्मानजनक ढंग से प्रस्तुत किया जाए। अपमान और आक्रोश में दिया गया उपदेश कभी स्वीकार नहीं होता।
यह भी विचारणीय है कि महिलाओं के प्रति अभद्र भाषा को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर नहीं छोड़ा जा सकता। भारतीय कानून में महिलाओं की गरिमा और सार्वजनिक शालीनता की रक्षा के लिए अनेक प्रावधान पहले से मौजूद हैं। आवश्यकता इनका प्रभावी और निष्पक्ष अनुपालन सुनिश्चित करने की है। यदि भविष्य में इस विषय पर और कठोर कानूनी उपायों पर विचार हो, तो वे संविधान, समानता और विधिसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप होने चाहिए।
लेकिन कानून से पहले समाज को स्वयं बदलना होगा। परिवारों में बच्चों को यह सिखाना होगा कि किसी से असहमति हो सकती है, लेकिन अपमान कभी समाधान नहीं होता। विद्यालयों में संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं के लिए आचार संहिता बनानी होगी और मीडिया को भी ऐसी भाषा का महिमामंडन करने से बचना होगा।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि भाषा की मर्यादा से भी चलता है। जिस दिन विरोध की जगह गाली और तर्क की जगह अपमान ले लेगा, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगेगी। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन अभद्रता उसकी सबसे बड़ी शत्रु है। इसलिए समय की मांग है कि हम विचारों का संघर्ष करें, व्यक्तियों का नहीं; तर्क की भाषा बोलें, गाली की नहीं; और ऐसा लोकतांत्रिक समाज बनाएं जहां विरोध की आवाज़ बुलंद हो, लेकिन उसकी भाषा हमेशा मर्यादित रहे।

(लेखक आज अख़बार के नेशनल ब्यूरो हैं)




