लेखक:संजय राय
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे परिवर्तनकारी तकनीकों में से एक है। जिस तरह औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन का स्वरूप बदला और इंटरनेट ने सूचना की दुनिया में क्रांति ला दी, उसी प्रकार एआई आने वाले वर्षों में शासन, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, रक्षा और समाज—हर क्षेत्र को नई दिशा देने जा रही है। लेकिन हर बड़ी तकनीक अपने साथ उतने ही बड़े जोखिम भी लेकर आती है। आज भारत ऐसे ही एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां एआई का अनियंत्रित और गैर-जिम्मेदार इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतंत्र, सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।
बीते कुछ वर्षों में डीपफेक वीडियो, नकली ऑडियो और एआई से तैयार की गई तस्वीरों की बाढ़ ने यह साबित कर दिया है कि अब किसी भी व्यक्ति की आवाज़ और चेहरा कुछ ही मिनटों में हूबहू तैयार किया जा सकता है। आम नागरिक के लिए यह पहचानना लगभग असंभव हो गया है कि जो वीडियो उसके मोबाइल पर पहुंचा है, वह वास्तविक है या पूरी तरह कृत्रिम। यही स्थिति सबसे बड़ा खतरा पैदा करती है। लोकतंत्र की नींव विश्वास पर टिकी होती है। यदि जनता को दिखाई और सुनाई देने वाली हर चीज़ संदेह के घेरे में आ जाए, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें स्वतः कमजोर होने लगती हैं।
भारत की परिस्थितियां इस खतरे को और अधिक संवेदनशील बनाती हैं। यह विविधताओं वाला देश है, जहां धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े विषय भावनात्मक होते हैं। यदि एआई के माध्यम से किसी समुदाय के विरुद्ध भड़काऊ वीडियो, किसी धार्मिक स्थल के बारे में झूठा दृश्य या किसी राजनीतिक नेता का फर्जी बयान वायरल कर दिया जाए, तो उसके परिणाम केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहते। ऐसी सामग्री मिनटों में तनाव, हिंसा और व्यापक अशांति का कारण बन सकती है।
आज दुनिया सूचना युद्ध के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि लोगों के मन और मस्तिष्क पर भी लड़े जाते हैं। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को देखते हुए यह मान लेना भूल होगी कि शत्रुतापूर्ण विदेशी ताकतें एआई का उपयोग देश की सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करने के लिए नहीं करेंगी। संगठित दुष्प्रचार अभियानों के माध्यम से चुनावों को प्रभावित करना, सांप्रदायिक तनाव पैदा करना, सुरक्षा बलों के बारे में भ्रम फैलाना या आर्थिक अस्थिरता का माहौल बनाना अब तकनीकी रूप से पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। यदि किसी दंगे, आतंकी हमले या युद्ध जैसी आपात स्थिति में हजारों एआई जनित वीडियो और तस्वीरें एक साथ सोशल मीडिया पर फैल जाएं, तो प्रशासन के लिए वास्तविक और नकली सूचनाओं में अंतर करना भी कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा भी दांव पर लग सकती है।
विडंबना यह है कि एआई से उत्पन्न इस चुनौती का समाधान केवल तकनीक से नहीं होगा। इसके लिए स्पष्ट और प्रभावी कानून आवश्यक है। भारत ने डेटा संरक्षण, डिजिटल भुगतान और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में समय के साथ नियामक ढांचा विकसित किया है। अब आवश्यकता है कि संसद व्यापक इंडिया एआई अधिनियम पारित करे, जो एआई के विकास को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ उसके दुरुपयोग पर कठोर नियंत्रण स्थापित करे।
इस कानून का पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह होना चाहिए कि देश में संचालित सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वीडियो प्लेटफॉर्म और डिजिटल सेवाओं को एआई से निर्मित सामग्री पर स्पष्ट और प्रमुख चेतावनी देना अनिवार्य बनाया जाए। आज अधिकांश बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के पास ऐसी तकनीक उपलब्ध है जो एआई जनित सामग्री की पहचान कर सकती है। यदि वे कॉपीराइट उल्लंघन, अश्लील सामग्री और हिंसक वीडियो की पहचान कर सकती हैं, तो एआई सामग्री की पहचान भी कर सकती हैं। इसलिए यह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नियामकीय इच्छा का प्रश्न है।
दूसरा, केवल प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि कंटेंट निर्माता की भी कानूनी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति या संस्था एआई से तैयार सामग्री को वास्तविक बताकर प्रसारित करती है, विशेषकर तब जब उसका उद्देश्य जनता को भ्रमित करना, सामाजिक वैमनस्य फैलाना या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना हो, तो इसे दंडनीय अपराध बनाया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि झूठ को तकनीक के सहारे सच बनाकर प्रस्तुत किया जाए।
तीसरा, सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या सामाजिक सद्भाव को प्रभावित करने वाली ऐसी एआई सामग्री को तत्काल हटाने का निर्देश दे सके, जिसे जानबूझकर बिना खुलासे के प्रसारित किया गया हो। हालांकि इस प्रक्रिया में न्यायिक समीक्षा, पारदर्शिता और स्पष्ट अपील व्यवस्था भी अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो और लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहें।
चौथा, चुनावों के दौरान एआई आधारित राजनीतिक प्रचार के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल, उम्मीदवार या प्रचार एजेंसी को यह स्पष्ट रूप से बताना अनिवार्य होना चाहिए कि कौन-सा वीडियो, भाषण, पोस्टर या ऑडियो एआई की सहायता से तैयार किया गया है। लोकतंत्र में मतदाता को सत्य जानने का अधिकार है।
निस्संदेह, एआई कोई शत्रु नहीं है। चिकित्सा में रोगों की पहचान, कृषि में उत्पादकता बढ़ाने, भारतीय भाषाओं के विकास, न्यायिक प्रक्रियाओं में सहायता और सरकारी सेवाओं की दक्षता बढ़ाने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत को एआई अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन नवाचार और जवाबदेही साथ-साथ चलें, यही किसी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
इसके साथ ही डिजिटल साक्षरता को राष्ट्रीय अभियान का रूप देना होगा। लोगों को यह सिखाना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर तस्वीर और वीडियो सत्य नहीं होती। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में एआई साक्षरता को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व किया है। अब समय आ गया है कि वह जिम्मेदार एआई शासन का भी वैश्विक मॉडल प्रस्तुत करे। यदि संसद वर्तमान सत्र में व्यापक एआई कानून लाकर यह संदेश देती है कि भारत नवाचार का समर्थक है, लेकिन दुष्प्रचार और तकनीकी अराजकता का नहीं, तो यह केवल वर्तमान ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के हित में भी होगा।
इतिहास बताता है कि संकट आने के बाद बनाए गए कानून अक्सर परिस्थितियों के दबाव में बनते हैं। दूरदर्शी राष्ट्र वे होते हैं जो संकट की आहट सुनकर पहले से तैयारी कर लेते हैं। एआई के मामले में भारत के पास अभी भी समय है, लेकिन यह समय तेजी से निकल रहा है। हर दिन बिना प्रभावी कानून के बीतना, फर्जी सामग्री फैलाने वालों के लिए एक नया अवसर है। और यदि किसी राष्ट्रीय आपातकाल, दंगे, युद्ध या बड़े आतंकी संकट के दौरान एआई जनित दुष्प्रचार का सुनियोजित हमला हुआ, तब कानून बनाने का समय नहीं बचेगा।
इसलिए यह केवल तकनीकी नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रहित का विषय है। संसद को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक संतुलित, दूरदर्शी और कठोर एआई कानून बनाना चाहिए। यही भारत के लोकतंत्र, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

(लेखक आज अखबार में नेशनल ब्यूरों हैं)





