लेखक:अरुंधति राय
जम्बू द्वीपे, भारतवर्षे, रेवा खंडे में लोकतंत्र का डंका बजता है। चुनाव आते हैं तो लोकतंत्र इतना जवान हो जाता है कि हर नेता को उसमें आम आदमी का चेहरा दिखाई देने लगता है। लेकिन चुनाव बीतते ही पता चलता है कि लोकतंत्र के दरवाजे पर कोई और ही बैठा है—बाजारतंत्र। वह भी ऐसा बाजारतंत्र, जिसके हाथ में कैलकुलेटर है, जेब में मुनाफे की पर्ची है और आंखों पर आम आदमी की जेब का एक्स-रे चश्मा लगा है।
कहने को देश में लोकतंत्र है। जनता वोट देती है, सरकार बनाती है और फिर पांच साल तक बड़ी श्रद्धा से उसी सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और टैक्स के रूप में धन्यवाद देती रहती है। बाजारतंत्र इस पूरे समारोह का सबसे महत्वपूर्ण अतिथि है। वह आता नहीं, हमेशा मौजूद रहता है।
वैसे 1947 के बाद से ही बाजारतंत्र ने लोकतंत्र का गिरेबान पकड़ने की कोशिश शुरू कर दी थी। उस समय वामपंथ और समाजवाद जैसे दो-चार मजबूत पहरेदार भी थे। वे बाजार को देखकर आंखें तरेरते थे और कहते थे—“जरा संभलकर! यह देश जनता का है।”
बाजार भी कम सयाना नहीं था। उसने समझ लिया कि सीधे लड़कर लोकतंत्र को हराना मुश्किल है। इसलिए उसने धनबल का सहारा लिया। धीरे-धीरे समाजवाद को भाषणों में और वामपंथ को किताबों में सुरक्षित कर दिया गया। लोकतंत्र के अग्रणी दल को उसने अपना ऐसा मित्र बनाया कि दोनों में अंतर करना कठिन हो गया। अब बाजारतंत्र लोकतंत्र का पिछलग्गू नहीं, बल्कि उसका अदृश्य सलाहकार बन बैठा है।
जनता को पता तब चलता है जब चीनी का भाव बढ़ता है।
चीनी बेचारी ने भी क्या अपराध किया है? वह पहले चाय में मिठास घोलती थी, अब अखबार की सुर्खियों में कड़वाहट घोल रही है। खबर आई कि पंद्रह दिनों में चीनी के दाम पंद्रह रुपये किलो तक बढ़ गए। यानी चीनी ने भी महंगाई के क्षेत्र में “शॉर्टकट” अपना लिया है। लगता है उसे भी समझ आ गया कि देश में तरक्की करनी हो तो धीरे-धीरे नहीं, छलांग लगाकर करनी चाहिए।
इसके बाद खाद्य तेल ने भी अपना भाव बढ़ाकर बता दिया कि वह सिर्फ सब्जी नहीं पकाता, परिवार का बजट भी पकाता है।
मैंने खबर पढ़ी और कुछ देर बाद चक्कर आने लगे। पहले लगा कि महंगाई की खबर का असर है। फिर सोचा—नहीं, विज्ञान के युग में अनुमान पर भरोसा करना ठीक नहीं। घर में रखा टेस्टिंग किट निकाला। शुगर जांची तो वह भी महंगाई के साथ कदमताल करती मिली। रक्तचाप नापा तो उसने भी मानो घोषणा कर दी—“हम पीछे क्यों रहें?”
दोनों बढ़े हुए थे।
अब समझ में आया कि बाजारतंत्र कितना वैज्ञानिक है। वह सीधे जेब पर हमला करता है, फिर जेब से होता हुआ रक्तचाप तक पहुंच जाता है। अर्थशास्त्र और चिकित्सा विज्ञान के बीच इतना सुंदर तालमेल शायद किसी सरकारी नीति में भी नहीं दिखाई देता।
डॉक्टर से संपर्क किया। उन्होंने दवा लिखी और परहेज की लंबी सूची थमा दी—चीनी बंद, तेल बंद, नमक बंद।
मैंने मन ही मन ऊपर वाले को धन्यवाद दिया।
सोचा—हे ईश्वर, तू कितना दयालु है! बाजार ने चीनी महंगी की तो तूने मेरे लिए चीनी बंद करवा दी। तेल महंगा हुआ तो तूने तेल बंद करवा दिया। नमक भी बंद। यानी महंगाई ने जिन चीजों को मेरी पहुंच से दूर किया, डॉक्टर ने उन्हीं चीजों को मेरी जिंदगी से दूर कर दिया।
वाह रे भाग्य!
महंगाई से बचने की ऐसी योजना न वित्त मंत्रालय बना सकता है, न रिजर्व बैंक। डॉक्टर ने महीने भर की रक्तचाप की दवा सिर्फ 75 रुपये में लिख दी। मैंने हिसाब लगाया—चीनी नहीं खरीदनी, तेल नहीं खरीदना, नमक नहीं खरीदना। ऊपर से दवा भी 75 रुपये।
मुझे पहली बार लगा कि महंगाई के खिलाफ असली आत्मनिर्भरता तो मेरे घर में लागू हो चुकी है।
लेकिन समस्या अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।
घर में पतिदेव भी थे।
उनकी थाली में तेल, नमक और चीनी का प्रवेश देखकर मुझे लग रहा था कि बाजारतंत्र मेरे ही घर में अपना कार्यालय खोलकर बैठा है। मैं उबली सब्जियां खाऊं और वे गरमा-गरम तड़का लगाकर सब्जी खाएं—यह लोकतांत्रिक असमानता मुझे मंजूर नहीं थी।
मैंने उनका भी रक्तचाप नाप डाला।
ईश्वर की अगली कृपा देखिए—वह भी थोड़ा बढ़ा हुआ निकला!
मैंने इसे संयोग नहीं, दैवीय हस्तक्षेप माना।
तुरंत डॉक्टर को फोन किया और उनके लिए भी वही परहेज लिखवा लिया।
अब हमारा घर बाजारतंत्र के खिलाफ देश का सबसे छोटा लेकिन सबसे सफल प्रतिरोध केंद्र बन चुका है। सुबह दोनों बिना चीनी की चाय पीते हैं। दोपहर में उबली सब्जियां खाते हैं। नमक की तरफ ऐसे देखते हैं जैसे वह कोई प्रतिबंधित वस्तु हो। तेल की बोतल रसोई में रखी है, मगर उसकी हैसियत अब शोपीस से ज्यादा नहीं।
महंगाई ने सोचा था कि वह हमारी कमर तोड़ेगी।
हमने अपनी कमर बचाने के लिए खाना ही ऐसा शुरू कर दिया कि उसमें टूटने को कुछ बचा ही नहीं!
यही आम आदमी की असली ताकत है। वह फीनिक्स पक्षी की तरह है—राख से फिर उठ खड़ा होता है। फर्क बस इतना है कि पौराणिक फीनिक्स आग से निकलता था और आज का आम आदमी महंगाई की राख से।
उसकी जिजीविषा अद्भुत है। वह पेट्रोल महंगा होने पर बाइक कम चलाता है, सब्जी महंगी होने पर दाल ज्यादा खाता है, दाल महंगी होने पर आलू खोजता है और आलू महंगा होने पर डॉक्टर की सलाह लेकर उबली सब्जियों पर आ जाता है।
सरकार कहती है—महंगाई नियंत्रण में है।
बाजार कहता है—बिलकुल!
आम आदमी कहता है—कहां है?
सरकार आंकड़े दिखाती है। बाजार भाव दिखाता है। आम आदमी अपनी खाली जेब दिखाता है। तीनों के आंकड़ों में इतना अंतर है कि लगता है देश में तीन अलग-अलग भारत बसते हैं—एक सरकारी भारत, एक बाजार का भारत और तीसरा वह भारत जिसमें आम आदमी किराने की दुकान पर खड़ा होकर दुकानदार से पूछता है, “भैया, कुछ सस्ता है?”
दुकानदार मुस्कुराता है।
“साहब, हवा सस्ती है।”
आम आदमी पूछता है—“वह भी पैक करके बेचोगे?”
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां जनता को बोलने की पूरी आजादी है। वह महंगाई पर बोल सकती है, चिंता कर सकती है, सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सकती है और चुनाव में वोट भी दे सकती है। लेकिन बाजारतंत्र की खूबसूरती इससे भी बड़ी है—वह जनता की आवाज सुनकर भी अपने भाव नहीं बदलता।
आम आदमी जितना चिल्लाता है, बाजार उतना ही मुस्कुराता है।
आखिर बाजार को लोकतंत्र से डर क्यों लगे? लोकतंत्र में हर पांच साल बाद जनता की जरूरत पड़ती है, बाजार को रोज जरूरत पड़ती है। इसलिए बाजार जनता की नब्ज चुनाव आयोग से कहीं बेहतर पहचानता है।
और मजे की बात यह है कि बाजारतंत्र का इलाज भी आम आदमी ही खोजता है।
चीनी महंगी? चीनी बंद।
तेल महंगा? तेल बंद।
नमक महंगा? नमक बंद।
रसोई का बजट बिगड़ा? डॉक्टर की सलाह से भोजन ही बदल दो।
अब बाजार बेचारा क्या करे?
वह चीनी महंगी करेगा तो हम चीनी छोड़ देंगे। तेल महंगा करेगा तो तेल छोड़ देंगे। नमक महंगा करेगा तो नमक छोड़ देंगे। कल को अगर वह पानी महंगा कर दे तो शायद डॉक्टर कहेंगे—“पानी भी सीमित मात्रा में पीजिए।”
तब बाजारतंत्र की असली हार होगी।
क्योंकि आम आदमी के पास पैसा भले कम हो, लेकिन जुगाड़ की प्रतिभा असीमित है।
इसलिए मैं अब बड़े आराम से बैठकर देख रही हूं कि लोकतंत्र को बाजार कैसे पटखनी देता है। बाजार की ताकत बहुत बड़ी है, लेकिन आम आदमी की जीवटता उससे भी बड़ी है।
बाजार कीमत बढ़ा सकता है, स्वाद नहीं छीन सकता।
सरकार आंकड़े बदल सकती है, जिंदगी का अनुभव नहीं।
लोकतंत्र कमजोर पड़ सकता है, मगर उम्मीद नहीं।
और जब तक उम्मीद जिंदा है, तब तक आम आदमी भी जिंदा है।
बाकी रही चीनी और तेल की बात—उन्हें महंगा होने दीजिए।
हमने दोनों से रिश्ता ही खत्म कर लिया है।
अब देखती हूं बाजारतंत्र लोकतंत्र को पटखनी देता है या हमारा उबला हुआ भोजन बाजारतंत्र की अकड़ निकालता है।
हां नहीं तो!

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




