लेखक: अरविंद जयतिलक
‘करीने से अजब आरास्ता कातिल की महफिल है,
वो किस दावे से कहते हैं हमारा ही तो ये दिल है’।
मशहूर शायर दाग देहलवी का यह शेर सियासी दलों के ऐसे सभी तकरीरों और नेक-नियति को बेपर्दा करता है जो सैद्धांतिक तौर पर राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ तो हैं लेकिन व्यवहारिक तौर पर दागियों के ही बगलगीर हैं। आज यह बगलगीरी और पैरोकारी सिर पर सवार नहीं होती तो लोकतंत्र के कंधे पर भी दागी सवार नहीं होते। इसे लेकर देश की अदालतों और जनमानस को चिंतित नहीं होना पड़़ता और न ही संसद और विधानसभाओं में पहुंचकर दागियों की फौज जनतंत्र को मुंह चिढ़ाती। हाल ही में कोर्ट सलाहकार सीनियर वकील विजय हंसारिया द्वारा देश की सर्वोच्च अदालत में पेश रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ है कि लोकसभा और राज्यसभा 776 सदस्यों में से 326 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें 210 गंभीर अपराधों से संबंधित हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। वहीं 28 राज्यों में सेे 14 मुख्यमंत्रियों ने भी अपने खिलाफ आपराधिक मामले की जानकारी दी हैं। उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट में मौजूदा एवं पूर्व सांसदों और विधायकों के खिलाफ कुल 4192 आपराधिक मामले लंबित हैं। लोकसभा के 543 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं जिनमें से 170 पर गंभीर मामले दर्ज हैं। वहीं राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। इनमें से 40 सांसदों के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं। केरल के 20 में से 19, तेलंगाना के 17 में से 14, ओडिसा के 21 में से 16, झारखंड के 14 में से 10 सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश में तकरीबन आधे सांसदों पर गंभीर आपराधिक मुकदमें हैं। यह बिडंबना देखिए कि दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर सर्वोच्च अदालत लगातार चेतावनी दे रहा है इसके बावजूद भी संसद और विधानसभाओं में पहंुचने वाले दागी जनप्रतिनिधियों की संख्या में कमी नहीं आ रही है। मतलब साफ है कि राजनीतिक दलों का ऐसे लोगों से परहेज नहीं है और न ही निर्वाचित करते समय जनता इसे तवज्जो दे रही है। यह स्थिति किसी भी संसदीय लोकतंत्र की जीवंतता के लिए भयावह और खतरनाक है। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने पूर्व और मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ उन लंबित आपराधिक मामलों का निपटारा दो महीने के दरम्यान करने को कहा था जिनके ट्रायल पर रोक लगी हुई थी। तब जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो टूक कहा था कि इस मामले में सुनवाई रोजाना हो और इसे बेवजह न टाला जाए। पीठ ने सभी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को भी ताकीद किया था कि इन निर्देशों के पालन में किसी तरह की बाधा नहीं होनी चाहिए। वे इसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी निपटाएं। सर्वोच्च अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि अगर किसी मुकदमें में उच्च न्यायालय ने रोक लगा रखी हो तो उसे जल्द से जल्द हटाया जाए। अच्छी बात है कि देश की सभी अदालतें ऐसे मामलों में तेजी से सुनवाई करते हुए निर्णय सुना रही हैं। देखा भी जा रहा है कि तमाम माननीयों को संसद और विधानसभाओं की सदस्यता से हाथ धोना पड़ रहा है। सदन की शोभा बढ़ाने वाले जेल की सलाखों के भीतर जा रहे हैं। दागियों को लेकर सर्वोच्च अदालत कितना गंभीर है वह इसी से समझा जा सकता है कि वह प्रधानमंत्री एवं राज्य के मुख्यमंत्रियों को भी ताकीद कर चुका है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले दागी लोगों को मंत्री पद न दिया जाए। क्योंकि इससे लोकतंत्र को क्षति पहुंचती है। सर्वोच्च अदालत यह भी कह चुका है कि भ्रष्टाचार देश का दुश्मन है और संविधान की संरक्षक की हैसियत से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री नहीं चुनेंगे। लेकिन विडंबना है कि अदालत के इस नसीहत का सियासी दलों पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा। इसका प्रमुख कारण है कि सर्वोच्च अदालत ने दागी सांसदों और विधायकों को मंत्री पद के अयोग्य मानने में सीधे हस्तक्षेप के बजाए इसकी नैतिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ दिया है। उसने व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा। यहां ध्यान देना होगा कि दागी माननीयों को लेकर सर्वोच्च अदालत एक-दो बार नहीं बल्कि अनगिनत बार सख्त टिप्पणी कर चुका है। लेकिन हर बार देखा जाता है कि राजनीतिक दल अपने दागी जनप्रतिनिधियों को बचाने और उन्हें टिकट देने के लिए कुतर्क गढ़ते नजर आते हैं। याद होगा गत वर्ष पहले जब सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के जरिए दोषी सांसदों व विधायकों की सदस्यता समाप्त करने और जेल से चुनाव लड़ने पर रोक लगायी तो राजनीतिक दलों ने किस तरह बखेडा खड़ा किया। अकसर राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक मंचों से मुनादी पीटा जाता है कि राजनीति का अपराधीकरण लोकतंत्र के लिए घातक है। वे इसके खिलाफ कड़ा कानून बनाने और चुनाव में दागियों को टिकट न देने की हामी भरते हैं। लेकिन जब उम्मीदवार घोषित करने का मौका आता है तो दागी ही उनकी पहली पसंद बनते हैं। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने राजनीति में आपराधीकरण को रोकने के लिए आदेश दिया था कि उम्मीदवार कम से कम तीन बार अखबार और टीवी चैनल में प्रचार कर अपनी अपराधिक पृष्ठभूमि को सामने लाएं। न्यायालय के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने इस बारे में एक अधिसूचना भी जारी की। लेकिन राजनीति का अपराधीकरण नहीं रुका। देखा जाता है कि उम्मीदवार किसी भी छोटे-छोटे अखबार में ब्यौरा देकर खानापूर्ति करने में सफल रहते हैं और यह जनता के संज्ञान में नहीं आता है। यही नहीं वे टीवी चैनलों में समय तय न होने के कारण देर रात इस बारे में प्रचार करते हैं और उसे जनता देख नहीं पाती है। नतीजा दागियों का असली चेहरा जनता के सामने नहीं आता है। उसका नतीजा यह होता है कि भारतीय जनमानस में दागियों के साख को तनिक भी बट्टा नहीं लगता। मजेदार बात यह भी कि राजनीतिक दल भी इसे संज्ञान लेने में रुचि नहीं दिखाते हैं। उल्टे चुनावी समय में दागी उम्मीदवारों पर ही भरोसा जताते नजर आते हैं। दरअसल राजनीतिक दलों को विश्वास हो चुका है कि जो जितना बड़ा दागी है उसके चुनाव जीतने की उतनी ही बड़ी गारंटी है। गौर करें तो पिछले कुछ दशक में ऐसी राजनीतिक मनोवृत्ति को जबरदस्त बढ़ावा मिला है। लेकिन विचार करें तो इस स्थिति के लिए सिर्फ राजनीतिक दल और उनके नियंता ही जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि इसके लिए देश की जनता भी बराबर की गुनाहगार है। जब देश की जनता ही साफ-सुथरे प्रतिनिधियों को चुनने के बजाए जाति-पांति और मजहब के आधार पर बाहुबलियों और दागियों को चुनेगी तो स्वाभाविक रुप से राजनीतिक दल उन्हें टिकट देंगे ही। नागरिक और मतदाता होने के नाते जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह ईमानदार, चरित्रवान, विवेकशील और कर्मठ उम्मीदवारों को अपना जनप्रतिनिधि चुने। यह तर्क देना उचित नहीं कि कोई भी दल साफ-सुथरे लोगों को चुनावी मैदान में नहीं उतारता है इसलिए दागियों को चुनना हमारी मजबूरी है। यह एक खतरनाक और शुतुर्गमुर्गी सोच है। देश की जनता को समझना होगा कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में नेताओं के आचरण का बदलते रहना स्वाभावगत प्रक्रिया है। लेकिन उन पर निगरानी रखना और यह देखना कि बदलाव के दौरान नेतृत्व के आवश्यक और स्वाभाविक गुणों की क्षति न होने पाए यह जनता की जिम्मेदारी है। देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तरक्की के लिए जितनी सत्यनिष्ठा व समर्पण राजनेताओं की होनी चाहिए उतना ही जनता की भी। लोकतंत्र में जनता ही संप्रभु होती है। समझना होगा कि दागियों को राजनीति से बाहर खदेड़ने की सिर्फ जिम्मेदारी राजनीतिक दलों के कंधे पर डालकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह दागियों को चुनने के बजाए साफ-सुथरे लोगों को चुनें।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)





