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लेखक-अरविंद जयतिलक

केंद्र की मोदी सरकार ने देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए गठित रामनाथ कोविंद की सिफारिशों पर अपनी मुहर लगा दी है। उल्लेखनीय है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में ‘एक देश एक चुनाव’ की संभावना तलाशने के लिए एक हाई लेवल कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी, गुलाम नबी आजाद, फाइनेंस कमीशन के पूर्व चेयरमैन एन के सिंह, संविधानविद् सुभाष कश्यप, देश के जाने-माने एडवोकेट हरीश शाल्वे और संजय कोठारी समेत कुल सात सदस्य शामिल थे। हालांकि अधीर रंजन चौधरी ने गृहमंत्री को पत्र लिखकर इस कमेटी में शामिल होने से इंकार कर दिया था। इस कमेटी का काम यह जानना था कि देश में एक साथ चुनाव कराए जाने में कितना वक्त लगेगा और कितने चरण में संपन्न हो सकता है। इसके अलावा इस कमेटी से यह भी पूछा गया था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए किस तरह का सुरक्षा प्रबंध, कितना ईवीएम और कितना मैनपॉवर होना चाहिए। कमेटी की रिपोर्ट स्वीकारने के बाद अब सरकार का कहना है कि वह इस मसले पर आम सहमति बनाने काी कोशिश के साथ शीतकालीन सत्र में विधेयक लाएगी।

गौरतलब है कि कोविंद समिति ने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कुल 18 संवैधानिक संशोधनों की सिफारिश के साथ ढ़ेर सारे सुझाव दिए हैं। अब सरकार के लिए इसे अमलीजामा पहनाना इसलिए बड़ी चुनौती है कि विधेयक को लोकसभा से पारित कराने के लिए कम से कम 362 और राज्यसभा में 163 सांसदों का समर्थन चाहिए। इसके अलावा कम से कम 15 राज्यों की विधानसभा से भी पारित होना आवश्यक होगा। देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस कठिन अग्निपरीक्षा को कैसे पार करती है। फिलहाल इस मसले पर सियासी घमासान शुरु हो चुका है। जहां मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और उसके सहयोगी दल एक देश एक चुनाव को अव्यवहारिक और गैर-जरुरी बता विरोध कर रहे हैं वहीं सरकार के सहयोगी दल इसके समर्थन में हैं। फिलहाल सरकार के तेवर को देखते हुए लग रहा है कि वह वर्ष 2029 में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए मन बना चुकी है। गौर करें तो ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का विचार कोई नया नहीं है। 1952 में प्रथम आमचुनाव से लेकर 1967 के चौथे आम चुनाव तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होते रहे। उसके बाद सत्तारुढ़ दलों की महत्वकांक्षा और अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग ने चुनावी कैलेंडर की तस्वीर बदल दी। अब अगर ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ फलीभूत होता है तो निःसंदेह देश का फायदा होगा।

धन के अपव्यय से बचा जा सकेगा। वैसे भी इस मसले पर चुनाव आयोग, नीति आयोग और विधि आयोग अपना-अपना दृष्टिकोण प्रकट कर चुके हैं। 1999 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के सुझाव के साथ-साथ सख्त कानूनी ढांचे की सिफारिश की थी। आयोग द्वारा भी गत वर्ष की गयी मसौदा सिफारिशों में संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की बात कही जा चुकी है ताकि एक साथ चुनाव सुनिश्चित हो सके। विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव दो चरणों में कराए जा सकते हैं, बशर्ते संविधान के कम से कम दो प्रावधानों में संशोधन किए जाएं और बहुमत से राज्यों द्वारा उनका अनुमोदन किया जाए। विधि आयोग के अलावा 2015 में कानून और न्याय मामलों की संसदीय समिति ने भी ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की सिफारिश की थी। इन संस्थाओं के सुझावों के बाद ही सरकार इस दिशा में आगे बढ़ी है।

विचार करें तो एक साथ चुनाव होने के ढ़ेर सारे फायदे हैं। मसलन हर वर्ष पांच से ज्यादा राज्यों में चुनाव होते हैं जिसपर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। अगर पांच साल में एक बार चुनाव होगा तो करोड़ों रुपए की बचत होगी और उस धन का उपयोग गरीबी, भूखमरी और कुपोषण से लड़ने में हो सकता है। इसके अलावा कम अवधि के लिए आचार संहिता लागू होगी जिससे सामान्य सरकारी कामकाज में भी अवरोध उत्पन नहीं होगा। लोकसभा और विधानसभा का चुनाव साथ होने से काले धन के प्रवाह पर भी रोक लगेगी। यह सच्चाई है कि चुनावों में काला धन का जमकर उपयोग होता है जिससे नतीजे भी प्रभावित होते हैं। चुनाव आयोग द्वारा हर चुनाव में हजारों करोड़ रुपए काला धन जब्त किया जाता है। दूसरी ओर एक साथ चुनाव होने से शिक्षा क्षेत्र का कामकाज प्रभावित होने से बचेगा। चुनाव में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की ड्यूटी लगती है और पठन-पाठन बाधित होता है। बार-बार चुनाव होने से आम जीवन भी प्रभावित होता है।

चुनावी रैलियों से यातायात प्रभावित होता है और वायु प्रदूषण से विस्फोटक स्थिति उत्पन होती है। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी कि एक साथ चुनाव होने से जनता की भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा। पांच साल में एक बार चुनाव होने से जनता के बीच भी उत्साह उत्पन होगा। यह सच्चाई है कि देश में बार-बार चुनाव होने से लोगों का चुनाव के प्रति आकर्षण कम होता है और उसका कुप्रभाव लोकतंत्र की बुनियाद पर पड़ता है। बहुत से लोग रोजगार एवं अन्य कारणों से दूसरे जगहों पर रहते हैं। उन्हें मतदान के लिए बार-बार अपने मूलस्थान पर आना संभव नहीं होता। एक तो आने-जाने में छुट्टियों का नुकसान होता है और दूसरा धन व्यय करना पड़ता है। लेकिन अगर एक साथ चुनाव हो तो लोग एक बार में दोनों चुनाव में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। लेकिन बिडंबना है कि कुछ राजनीतिक दल इसके फायदे के बजाए कल्पित नुकसान के कुतर्क को आगे बढ़ा रहे हैं। याद होगा गत वर्ष ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के मसले पर जब प्रधानमंत्री ने बैठक बुलायी तो किस तरह कुछ राजनीतिक दलों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया था।

दरअसल इस बहिष्कार के पीछे उनका मकसद यह साबित करना था कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ असंवैधानिक और संघीय व्यवस्था के खिलाफ है और सरकार इसके जरिए अपना राजनीतिक हित साधना चाहती है। यह आरोप ठीक नहीं है। विमर्श से पहले ही इस नतीजे पर पहुंच जाना कि एक साथ चुनाव देश हित में नहीं है लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। इन राजनीतिक दलों की नजर में एक साथ चुनाव होने से कई तरह की समस्याएं उत्पन होंगी। मसलन चुनाव जीतने के लिए बड़े राजनीतिक दल भारी पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल करेंगे जबकि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए उनका मुकाबला कठिन होगा। यानी बड़े राजनीतिक दल छोटे राजनीतिक दलों को चुनाव में हरा देंगे। यानी यों कहें तो उनका सोचना है कि एक साथ चुनाव होगा तो मतदाता केंद्र एवं राज्य में एक ही दल को बहुमत देगा। लेकिन यह चिंता निर्मूल है। उदाहरण के लिए 2014 और 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ-साथ कई राज्यों की विधानसभाओं के भी चुनाव हुए लेकिन नतीजे अलग-अलग रहे। क्या यह रेखंाकित नहीं करता है कि देश का मतदाता परिपक्व हो चुका है? कुछ क्षेत्रीय दलों का तर्क यह भी है कि चुनावों के दौरान देश के बड़े राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को उछालेंगे जिसमें क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के मुद्दे गौण पड़ जाएंगे। यानी देश की जनता क्षेत्रीय मुद्दों के बजाए राष्ट्रीय मुद्दों को तवज्जों देगी और उसका नुकसान क्षेत्रीय दलों का उठाना होगा।

उनकी आशंका है कि एक साथ चुनाव होने से चुनाव का स्वरुप व्यक्ति केंद्रीत हो जाएगा और राष्ट्रीय दल प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव में बढ़त बना लेंगे। यानी देश की जनता जिस व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाएगी उसी दल का राज्यों में भी दबदबा होगा। उन्हें यह भी आशंका है कि एक साथ चुनाव होने से परिणाम देर में आएंगे और सत्तारुढ़ दल उसमें हेरा-फेरी करा सकता है। गौर करें तो क्षेत्रीय दलों की आशंका ठीक वैसा ही है जैसा कि वे ईवीएम को लेकर छाती पीटते रहे हैं। संभवतः ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों का देश की जनता पर भरोसा कम और अपने कपोलकल्पित आशंकाओं पर ज्यादा हैं। सच कहें तो इस तरह की नकारात्मक प्रवृत्ति देशहित के खिलाफ है।

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(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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