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लेखक -अमित सिंघल

चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार विरोध और स्वच्छ प्रशासन, गरीबी उन्मूलन एवं विकास जैसे मुद्दे विपक्ष से हथिया लिया है और राष्ट्रवाद को विपक्ष तर्जनी से भी नहीं छुएगा, तो विपक्ष को कुछ नए मुद्दे तलाशने होंगे, जिसे प्रधानमंत्री मोदी अभी कुछ वर्षो तक तो नहीं ही छुएंगे।

क्या है वे मुद्दे जिन पे अधिकतर लोगो को अभी भी रोष है?

पहला मुद्दा है भारत को डिजिटल क्रांति एवं कृत्रिम बुद्धि, एवं जलवायु परिवर्तन से लाभ पहुँचाना एवं दुष्प्रभावों से बचाना। आज जब विश्व में खाद्यान्नों, पेट्रोल, खनिज, मैन्युफक्चर्ड गुड्स (जैसे कि टीवी, फ्रिज, AC, कपड़े, कार, कीली, फोन, बल्ब इत्यादि) एवं सेवाओं (होटल, इंटरनेट, टीवी चैनल, फिल्म, समाचार, हवाई यात्रा, इत्यादि) के दाम स्थिर है, तब राष्ट्र उस समय की नीतियों से नहीं चल सकता जो भुखमरी, कमी, लाइसेंस-परमिट राज के समय बनी थी। विपक्ष को नारेबाजी से हटकर स्पष्ट विज़न एवं कार्यक्रम प्रस्तुत करना होगा कि इस नए युग वाले भारत की प्रगति कैसे सुनिश्चित करेगा।

दूसरा मुद्दा है आरक्षण का।

यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं ना तो आरक्षण हटाने या प्रतिशत कम करने की बात कर रहा हूँ। यह किसी भी राजनैतिक दल में हिम्मत नहीं है, चाहे वह भाजपा ही क्यों ना हो। लेकिन सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग, दोनों में आरक्षण को लेकर नाराजगी है। सामान्य वर्ग का आक्रोश तो सबको दिखाई देता है, लेकिन आरक्षित वर्ग की नाराजगी छुपी हुई है। उन्हें पता है कि आरक्षण को उनके ही अभिजात वर्ग ने कब्जिया लिया है। एक ही खानदान की चौथी पीढ़ी आरक्षण का मजा ले रही है। इसमें संशोधन की आवश्यकता है, जिससे उन्ही शुद्र और पिछड़े वर्ग के वंचित लोगो को आरक्षण का लाभ पहली बार मिले। इससे विपक्ष को सामान्य और आरक्षित वर्गों का भारी समर्थन मिलेगा।

तीसरा मुद्दा महिलाओ के सशक्तिकरण का है।

वह युवा जो वर्ष 2024 में पहली बार वोट देने के योग्य होंगे, उनमे आधी नवयुवतियां होंगी। उनके लिए अभी भी सार्थक और ठोस प्रयास नहीं किये गए है। सत्ता में महिलाओ की भागेदारी बहुत ही कम है। उनके लिए संसद और विधानसभाओ में 33 प्रतिशत सीट आरक्षित करने का मुद्दा विपक्ष को महिलाओ का समर्थन दिला सकता है।

चौथा मुद्दा, कृषि।

अगर किसानों को उपज का अधिक दाम मिलता है, तो उपभोक्ताओं को महंगा उत्पाद खरीदना पड़ सकता है। इन दोनों परस्पर विरोधी हितो को कैसे एक छत के नीचे लाये, कैसे बिचौलियों को इस खरीद-फरोख्त से बाहर करे, कैसे कृषक समाज को उद्यम की तरफ मोड़े, इस विषय पे ज्यादा कार्य नहीं हुआ है। केवल न्यूनतम मूल्य को बढ़ाने और कृषि सुधारो का विरोध करना ही काफी नहीं है। आखिरकार यह सोच का विषय होना चाहिए कि इन कृषि सुधारो के विरोध में केवल कुछ क्षेत्र के ही किसान क्यों खड़े है?

अंत में, आतंकवाद, नक्सलवाद से निपटने, भारतीय संस्कृति का मज़ाक उड़ाने का मुद्दा है। क्या विपक्ष के पास कोई बोल्ड विचार है, जिससे वे सभी भारतीयों (ना कि केवल लेफ्टिस्ट) के विचारो को प्रभावित कर सके?

प्रधानमंत्री मोदी लगातार भाजपा का वोट बेस बढ़ाते जा रहे है। 20 से 22 प्रतिशत वोट को वे वर्ष 2014 के चुनावो में 31 प्रतिशत, और 2019/2024 के चुनावो में 38 प्रतिशत पे ले आये है। NDA का वोट शेयर 45% पार कर रहा है।

कारण यह है कि प्रधानमंत्री मोदी लगातार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की बात करते है, ना कि किसी संकीर्ण समुदाय के इंटरेस्ट की बात करते है।

आप देख सकते है कि कैसे मोदी जी ने इन सभी विषयो – डिजिटल, महिलाओ एवं कृषि क्षेत्र – पर ठोस कार्य किया है। आशा है आरक्षण को आरक्षित वर्ग के अभिजात वर्ग के कब्जे से मुक्ति दिलाएंगे।

दूसरी ओर, राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, स्तालिन,लालू यादव, अखिलेश यादव,वामपंथी दलों के विज़न में सभी भारतीयों को साथ लेकर चलने की बात नहीं है। अर्थात, ये दल अब यादव-मुस्लिम या दलित वोटो के आधार पर सत्ता में आने का सपना देख रहे है जो आज के विध्वंसात्मक युग में संभव नहीं है।

विपक्ष को अपनी सड़ी-गली राजनीति का रचनात्मक विनाश करना होगा, और उसके खंडहरों से नयी संरचना को जन्म देना होगा।

(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और यह उनके निजी मत हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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