जब मालूम था तो प्रदर्शन क्यों!

जब मालूम था तो प्रदर्शन क्यों!

लेखक-राजेश बैरागी

मुझे नहीं लगता कि प्रक्रिया अधीन किसी काम की मांग को लेकर कुछ लोगों के साथ किसी कार्यालय पर प्रदर्शन किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने के अधिकार को इस प्रकार उपयोग करना न केवल इस अधिकार की गरिमा को समाप्त करता है बल्कि इससे अन्य नागरिकों को समस्या पेश आती है और उस कार्यालय के कामकाज पर भी खराब असर पड़ता है।
दरअसल बीते कल कुछ लोग यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के मुख्यालय पर प्रदर्शन करने आए थे। उनके हाथों में एक वामपंथी दल से संबंधित झंडे थे। ये लोग किसान कम और भाड़े के मजदूर अधिक लग रहे थे।उनका प्रदर्शन प्राधिकरण क्षेत्र के कुछ गांवों के अवशेष किसानों को अतिरिक्त प्रतिकर भुगतान न होने के विरुद्ध था। ये लगभग एक सौ लोग थे। उन्होंने आकर नारेबाजी की।उनका नेतृत्व अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव दिगंबर सिंह कर रहे थे। थोड़ा सा प्रदर्शन करने के बाद उन्होंने प्राधिकरण के अधिकारियों से मुलाकात की। अधिकारियों ने उन्हें अतिरिक्त प्रतिकर भुगतान की प्रक्रिया जारी होने तथा शीघ्र ही इस संबंध में समाचार पत्रों में सूचना प्रकाशित होने की जानकारी दी। इतना सुनकर प्रदर्शनकारी वापस लौट गए। क्या प्रदर्शनकारी और उनके नेता मात्र इतनी जानकारी हासिल करने आए थे? क्या यह जानकारी किसी एक व्यक्ति द्वारा हासिल नहीं की जा सकती थी?इन लोगों के आगमन के दौरान कुछ देर के लिए सड़क और यीडा मुख्यालय के आगे जाम लगा, कार्यालय में काम प्रभावित हुआ। क्या यह प्रदर्शन के अधिकार के लिए उचित था? अपने समर्थकों के बीच खुद को स्थापित रखने के लिए लोकतंत्र के इस अधिकार का दुरुपयोग निरंतर किया जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र के पहरुओं के लिए यह दुरुपयोग अपनी दुकान चलाने के लिए आवश्यकता के औचित्य को पीछे छोड़ चुका है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Mukesh Seth

Chief Editor

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