【महाराष्ट्र मीडिया पर्सन्स एन्ड मीडिया इंस्टीट्यूशन बिल को राष्ट्रपति ने दी मंजूरी】

【महाराष्ट्र मीडिया पर्सन्स एन्ड मीडिया इंस्टीट्यूशन बिल को राष्ट्रपति ने दी मंजूरी】

★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★

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{दो वर्ष पूर्व फडणवीस सरकार ने महाराष्ट्र के पत्रकारों समचारसमूहो की सुरक्षा के मद्देनजर कड़े प्रावधानों वाला बिल सदन से पास करा भेजा था राष्ट्रपति के पास}
[कामकाज के दौरान पत्रकार पर हमले के मामले में तीन साल तक कि सज़ा,50 हज़ार जुर्माने सहित ग़ैर ज़मानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है]
(IFWJ समेत अन्य पत्रकार संगठन भी करते थे पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कड़े क़ानून की मांग,योगी से मिल कर चुका है IFWJ यूपी में भी कड़े क़ानून लागू करने की मांग)
♂÷दो वर्ष पूर्व देवेंद्र फडणवीस सरकार द्वारा पत्रकारों व समाचार समूहों की सुरक्षा के मद्देनजर पास किये गए क़ानून को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज मंगलवार को मंजूरी दे दी है।

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विदित हो कि देश भर में आये दिन पत्रकारों पर हमले के मामले सामने आते रहते है तो वहीं 2017 में गौरी लंकेश की हत्या होने के बाद गृहमंत्रालय ने पत्रकारों व समचारसमूहों की सुरक्षा के मद्देनजर कड़े क़ानून बनाकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश राज्य सरकारों को दिया था।
महाराष्ट्र की तत्कालीन फडणवीस सरकार ने दो वर्ष पूर्व दोनों सदन से महाराष्ट्र मीडिया पर्सन्स एन्ड मीडिया इंस्टिट्यूशन्स बिल पास कराकर राष्ट्रपति की मंजूरी हेतु भेज दी थी।महाराष्ट्र सरकार देश की ऐसी अकेली सरकार बन बन गयी है जिसने पत्रकारों व समाचार समूहों के लिए इस तरह के क़ानून को अमल में लाया है।
इस एक्ट में कामकाज के दौरान पत्रकार पर हमले के मामले में तीन साल तक की सजा और 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान और इस कानून के तहत पत्रकार पर हमले के मामलों को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट के बीच प्रेस की सुरक्षा के कानून को लागू कर राष्ट्रपति ने मंजूरी दी। मीडिया पर्सन्स एंड मीडिया इंस्टीट्यूशंस विधेयक
महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चल रहे सियासी उठापटक के बीच महाराष्ट्र में पत्रकार और समाचार समूहों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कानून को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी।
महाराष्ट्र मीडिया पर्सन्स एंड मीडिया इंस्टीट्यूशंस विधेयक 2017 के लागू होने के साथ महाराष्ट्र देश का अकेला ऐसा राज्य बन गया है जहां प्रेस की सुरक्षा के लिए इस तरह का कानून बनाया गया है। फड़नवीस सरकार द्वारा यह कानून दो साल पहले पास किया गया था।
इसके तहत कामकाज के दौरान पत्रकार पर हमले के मामले में तीन साल तक की सजा और 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है।इस कानून के तहत पत्रकार पर हमले के मामलों को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है। खास बात यह है कि ऐसी हिंसा के मामलों की जांच कम से कम डिप्टी एसपी या एसीपी रैंक के अधिकारी द्वारा कराई जाएगी। हालांकि झूठी शिकायत करने के मामले में सजा के यही प्रावधान शिकायतकर्ता पर भी लागू होंगे।
इस कानून के तहत अपराध साबित होने पर अदालत द्वारा समाचार समूह के हुए नुकसान हमलावर को ही चुकाना होगा। इसके अतिरिक्त पत्रकारों के इलाज का खर्च भी उसे ही उठाना होग। महाराष्ट्र की तर्ज पर अब बिहार और छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य राज्य भी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
मालूम हो कि 2017 में पत्रकार गौरीलंकेश की हत्या के बाद गृहमंत्रालय द्वारा सभी राज्यों को पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्दश दिया गया था।
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए गए हैं।पुलिस, माओवादी, अपराधियों और भ्रष्ट नेताओं द्वारा पत्रकारों को निशाना बनाए जाने को लेकर भी विशेषतौर पर चिंता जताई गई है इसमें 2018 में अपने कामकाज के सिलिसले में कम से कम 6 पत्रकारों की हत्या के मामलों को शामिल किया गया है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से IFWJ प्रेसिडेंट डॉ. के.विक्रम राव ने मिलकर पत्रकारों की सूरत के बाबत कड़े क़ानून बनाये जाने की मांग करते हुए ज्ञापन दिया गया था तो वहीं उन्होंने अपने प्रतिनिधिमण्डल के साथ इस संदर्भ में दिल्ली में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री व गृहमंत्री से भी मिलकर मांगपत्र सौंपा था।आईएफडब्ल्यूजे अध्यक्ष डॉ.के.विक्रम राव ने बताया कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी प्रतिनिधिमण्डल ने उनसे महाराष्ट्र की ही तर्ज़ पर कठोर क़ानून बनाये जाने की जरूरत बताई है।
जिसपर मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी क़दम उठाये जायेंगे।
विदित हो कि देश भर में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए पत्रकारों के अन्य संगठन भी आवाज़ उठाते रहते हैं।

Mukesh Seth

Chief Editor

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