लेखक~डॉ.के. विक्रम राव
मगर इस पानीपत युद्ध से हिन्दु—मुस्लिम एकता और अफगानी लुटेरों का दृढ़ता से मुकाबला करना भी एक ऐतिहासिक दृष्टान्त है। इतिहास याद रखता है कि शूरवीर कमाण्डर इब्राहीम खान गर्दी और मराठा जनरल सदाशिवराव भाउ के नेतृत्व में संयुक्त रुप से हिन्द की सेना इन अफगानियों से टकराई। पानीपत भले ही हार गये पर हिन्दु—मुसलमान सेना ने अफगानी लुटेरे अहमद शाह दुर्रानी को पीछे खदेड़ा। दुखद विवरण यह रहा कि इन अफगानी पठानों ने महान हिन्दुस्तानी योद्धा इब्राहीम गर्दी को कैद में तड़पा कर मार डाला। पर यह रणबांकुरा जो फ्रांसीसी तोपखाने में कुशलता से शिक्षित था ने अपने समर कौशल से इस्लामी आक्रामकों को क्षीण किया। इस जंग में हैदराबाद के तेलुगु—भाषी निजाम सिपाही भी देश पर शहीद हुये। अफगानी से भिड़ते।
यहां एक आवश्यक उल्लेख एक गद्दार, देशद्रोही का। अहमदशाह अब्दाली की सेना की सहायता करने में लखनऊ—फैजाबाद के नवाब शुजाउद्दौला की घातक किरदारी रही। वह नवाब सफदरजंग का पुत्र था। उसने अफगान हमलावरों की मदद की। मुगल सम्राट को कमजोर किया। मात्र अपने वंश हेतु काम किया। अंग्रेजों और अंतत: सारे अवध को उपनिवेश बनने की नींव डाली।
तो यह ज्वलंत उदाहरण है हिन्दू—मुस्लिम (मराठा—इब्राहीम खां गर्दी) की राष्ट्रभक्ति का तथा अवध नवाब की गद्दारी का। इस घटना पर एक चलचित्र में बना था। इसमें इब्राहीम खां गर्दी की भूमिका में थे मशहूर अभिनेता मुकेश खन्ना, जो महाभारत में भीष्म पितामह की के रोल में थे। मराठा सेनापति की भूमिका में पंकज धीर थे, जो महारथी कुन्तीपुत्र कर्ण बने थे। हर भारतीय युवक को यह फिल्म देखनी चाहिये ताकि भारत पर फख्र कर सके।

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷






















