लेखक-अरविंद जयतिलक
आज विश्व एड्स दिवस है। प्रत्येक वर्ष एक दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। गत वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यक्रम यूएनएड्स की रिपोर्ट पर गौर करें तो एड्स से होने वाली मौतों में तकरीबन 48 प्रतिशत की कमी आई है। वर्ष 2024 में भारत में एड्स के लगभग 25.44 लाख रोगी थे। लेकिन वर्ष 2010 के बाद से नए संक्रमणों में लगातार कमी आ रही है। भारत ने 2025-26 तक नए एचआईवी संक्रमणों और एड्स से संबंधित मौतों में 80 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा है और 95-95-95 लक्ष्य के करीब पहुंच रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि 95 प्रतिशत एचआईवी मामलों की पहचान हो चुकी है और 95 प्रतिशत को एआरटी दिया जा रहा है। 95 प्रतिशत उपचारित व्यक्तियों में वायरस को खत्म किया जा चुका है। अच्छी बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक एड्स बीमारी के खात्मे का लक्ष्य सुनिश्चित किया है। रिपोर्ट पर गौर करें तो गत वर्ष तकरीबन चार करोड़ लोग एचआईवी संक्रमण के साथ जीवन जी रहे थे जिनमें तकरीबन 86 प्रतिशत को पता था कि वे संक्रमित हैं। मतलब साफ है कि एड्स को लेकर जागरुकता बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र के एचआइवी/एड्स पर यूएनएड्स की रिपोर्ट पर विश्वास करें तो भारत एचआइवी संक्रमित लोगों का तीसरा सबसे बड़ा घर है। एड्स किस तरह जानलेवा साबित हो रहा है इसी से समझा जा सकता है कि वर्ष 2024 में दुनिया भर में 6.30 लाख लोगों की मौत हुई। लेकिन राहतकारी है कि यह आंकड़ा 2010 की तुलना में 54 प्रतिशत कम है। इसका श्रेय एचआईवी परीक्षण और उपचार की सुलभता को जाता है। वर्ष 2024 में 20 वर्ष से कम उम्र के लगभग 90 हजार बच्चों की मौत हुई है जो कुल मौतों का लगभग 14 प्रतिशत है। गौरतलब है कि मध्यम आय वाले देशों ने एड्स से निपटने के लिए 2020 तक 26 अरब डॉलर खर्च करके तकरीबन 90 प्रतिशत मरीजों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा था। इसमें काफी हद तक सफलता मिली है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने 2024 में एड्स से निपटने के लिए 3.3 अरब डॉलर का बजट रखा जिससे एड्स से निपटने में काफी मदद मिली। लेकिन 2025 में एड्स पर बजट को लेकर भिन्न स्थिति है। अमेरिका में पीईपीएफएआर 4.7 बिलियन डॉलर के वार्षिक बजट में 42 प्रतिशत कटौती का अनुमान है जबकि भारत ने राष्ट्रीय एड्स एव एसटीडी प्रतिक्रिया के लिए अपना बजट जारी रखा है।
वित्त वर्ष 2025 के लिए ग्लोबल फंड के लिए फंडिंग जो बहुपक्षीय योगदानों का सबसे बड़ा हिस्सा 1.65 बिलियन डॉलर थी जो वह वित्त वर्ष 2023 के स्तर से 375 मिलियन डॉलर कम है। यहां ध्यान देने वाली बात यह कि एड्स से बचाव के लिए सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर जागरुकता कार्यक्रमों में तेजी के बाद भी बचाव की दर महज 0.34 प्रतिशत ही है। बेहतर होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ, सरकारें और स्वयंसेवी संस्थाएं एड्स से बचाव के प्रभावी कदम उठाने के साथ लोगों को बताएं कि एड्स क्या है। यह सच्चाई है कि एड्स के बारे में लोगों को पर्याप्त जानकारी नहीं है और उसी का नतीजा है कि 1981 में एड्स की खोज से अब तक लगभग 30 करोड़ लोगों की जान जा चुकी है। आमतौर पर एड्स के संक्रमण की तीन मुख्य वजहें हैं-असुरक्षित यौन संबंध, रक्त का आदान प्रदान और मां से शिशु में संक्रमण। लेकिन यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में एड्स के तेजी से बढ़ते संक्रमण का एक अन्य कारण लोगों की बदलती जीवन शैली तथा युवाओं में रोमांच के लिए जोखिम लेने की प्रवृत्ति भी है। चिकित्सा वैज्ञानिकों की मानें तो भारत में 85.6 प्रतिशत एड्स पाश्चात्य जीवन पद्धति अपनाने से फैल रही है। इस लिहाज से 24 से 45 वर्ष के आयु के लोगों के इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका सदैव बनी रहती है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन का कहना है कि एचआईवी संक्रमण की सबसे ज्यादा संभावना संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संपर्क से होती है। लेकिन आश्चर्य है कि सुरक्षित यौन संबंध के प्रचार-प्रसार के बावजूद भी लोग चेतने को तैयार नहीं। युवा वर्ग तो और भी गंभीर नहीं है।
विभिन्न सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि देश के बड़े महानगरों में संक्रमित यौनकर्मियों की तादाद में लगातार इजाफा हो रहा है। गत वर्ष पहले एक सर्वेक्षण से उद्घाटित हुआ था कि मुंबई के 70 प्रतिशत यौनकर्मियों के शरीर में एचआईवी वायरस पाया गया। इसी तरह सूरत में किए गए एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ कि वहां के यौनकर्मियों के शरीर में एचआईवी वायरस बढ़कर 43 प्रतिशत हो गया। यह एक खतरनाक संकेत है। देखा जाए तो इस स्थिति के लिए एड्स के विरुद्ध अभियान को गंभीरता से न लिया जाना ही मुख्य रुप से जिम्मेदार है। 2001 में राष्ट्रीय आचरण सर्वेक्षण (नेशनल बिहैवियर सर्वे) में 85000 लोगों से उनके यौन आचरण से जुड़े सवाल पूछे गए। इनमें 50 प्रतिशत से अधिक लोग 25 से 40 वर्ष के थे, के द्वारा बताया गया कि उन्हें एड्स के बारे में बहुत कम जानकारी है। हैरान करने वाला तथ्य यह कि बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में सिर्फ 60 प्रतिशत लोगों ने ही एड्स का नाम सुना था। सर्वे के मुताबिक देश के अन्य हिस्सों में भी एड्स संबंधी जानकारी सिर्फ 70 से 80 प्रतिशत लोगों को थी। यही नहीं वे इस जानकारी से भी वंचित थे कि एड्स यौन संपर्क से भी होता है। हालांकि अब ढाई दशक बाद अब लोगों में एड्स और इससे पीड़ि़त लोगों को लेकर जागरुकता और संवेदनशीलता दोनों बढ़ी है। एचआईवी के संक्रमण का दूसरा सबसे बड़ा प्रमुख कारण रक्त संक्रमण माना जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि चेतावनी के बावजूद भी देश के अस्पतालों में एचआईवी संक्रमित व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल की हुई सुई का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है जिससे एचआईवी का जोखिम बढ़ रहा है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में महिलाओं पर एचआईवी भार 39 प्रतिशत है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि एचआईवी पीड़ित दंपतियों में प्रसव के दौरान प्रिवेंशन ऑफ पैरेंटस टू चाइल्ड ट्रांसमिशन तकनीकी का प्रयोग करने के बाद भी 5 प्रतिशत मामले संक्रमित बच्चों के देखने को मिल रहे हैं। रिपार्ट में बताया गया कि 27 मिलीयन महिलाएं हर वर्ष बच्चों को जन्म देती हैं जिनमें 49000 महिलाएं एचआईवी संक्रमित होती हैं। देश में तकरीबन 20000 हजार से अधिक बच्चे प्रतिवर्ष माता-पिता के कारण एचआईवी संक्रमण का शिकार होते हैं।
एचआईवी का संक्रमण रोकने के लिए 2006 में नेशनल पीडियाट्रिक एन्टीरेट्रो तकनीकी आरंभ हुआ। अब तक देश में इसके चार सौ से अधिक एआरटी सेंटर भी स्थापित हो चुके हैं। लेकिन इस तकनीक के बाद भी आज बचाव की दर तकरीबन एक प्रतिशत से भी कम है। इसे ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट में इस जानलेवा महामारी से बचने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को अमल में लाने के साथ ही सामाजिक कार्यक्रमों एवं शिक्षा के जरिए इसके रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाने की जरुरत पर बल दिया गया है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय समाज में यौन विषयों पर चर्चा शुरु से वर्जना का विषय रहा है। इसका नतीजा यह है कि लोगों के बीच एड्स को लेकर भ्रम की स्थिति है। यही नहीं समाज में इस बीमारी से ग्रसित लोगों से असहिष्णुता का व्यवहार किया जाता है। यह मानवता के विरुद्ध है। आमजन को समझना होगा कि एड्स स्वयं में कोई रोग नहीं बल्कि एक संलक्षण है जो मनुष्य की अन्य रोगों से लड़ने की क्षमता को घटा देता है। बेहतर होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व के सभी देश एवं स्वयंसेवी संस्थाएं एड्स की रोकथाम के लिए लोगों को जागरुक बनाएं और साथ ही प्रभावी इलाज की व्यवस्था सुनिश्चत करें।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)



