लेखक-मुकेश शर्मा
मध्यप्रदेश की राजनीति में कैलाश विजयवर्गीय को बीजेपी का चाणक्य माना जाता है। जिस तरह केंद्र में अमित शाह को पार्टी का रणनीतिकार कहा जाता है, उसी तरह विजयवर्गीय को मप्र में संगठन और सत्ता के मामलों में निर्णायक भूमिका निभाने वाला नेता माना जाता है।
चाहे लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा के चुनाव हों, उन्होंने कई बार संकटमोचक के रूप में सामने आकर पार्टी को मुश्किल परिस्थितियों से निकाला है। उनके नेतृत्व में बीजेपी ने हर बार मजबूत स्थिति हासिल की है। राष्ट्रीय नेतृत्व भी उनकी सत्ता-संगठन की कुशलता से प्रभावित रहा है। पश्चिम बंगाल और हरियाणा जैसे राज्यों में पार्टी को मजबूती दिलाने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
पश्चिम बंगाल में प्रभारी बनने के बाद उनकी राष्ट्रीय पहचान और मजबूत हुई। उस समय वहां संगठन अपेक्षाकृत कमजोर था। विजयवर्गीय ने लगातार दौरे किए, स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट किया और बूथ स्तर पर संगठन निर्माण पर विशेष ध्यान दिया। उनकी प्रबंधन क्षमता और नेतृत्व पर पकड़ ने उन्हें पार्टी में विशिष्ट स्थान दिलाया।
मध्यप्रदेश के लिए अहम कड़ी
राजनीति में किसी नेता की उपयोगिता सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं मापी जाती। संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना और चुनौतीपूर्ण समय में पार्टी का मनोबल बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होता है। विजयवर्गीय इन सभी कसौटियों पर खरे उतरते हैं।
मध्यप्रदेश के संदर्भ में देखें तो वर्तमान समय में पार्टी के भीतर सामंजस्य और समन्वय की चर्चा लगातार हो रही है। सरकार और संगठन बाहर से एकजुट दिखते हैं, लेकिन अंदरूनी स्तर पर अलग-अलग समूहों की मौजूदगी भी महसूस की जाती है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान और प्रहलाद पटेल से जुड़े समूहों की सक्रियता को लेकर भी राजनीतिक हलकों में बातचीत होती रहती है। उज्जैन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की जमीनों का मामला सामने आने के बाद इन चर्चाओं ने और जोर पकड़ा है।
ऐसी स्थिति में कैलाश विजयवर्गीय को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो विभिन्न धाराओं को साथ लेकर चल सकते हैं। मालवा उनका कर्मक्षेत्र रहा है और इसी क्षेत्र के कारण मालवा आज बीजेपी का गढ़ माना जाता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मालवा की मजबूती को बनाए रखने में विजयवर्गीय की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका प्रभाव केवल मालवा तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में है।
संगठन निर्माता और रणनीतिकार
बीजेपी में ऐसे कई नेता हैं जिनका काम सिर्फ चुनाव लड़ना या सरकार चलाना नहीं होता। वे संगठन को खड़ा करने, रणनीति बनाने और कठिन समय में पार्टी को संभालने का काम भी करते हैं। विजयवर्गीय इसी श्रेणी के नेता हैं।
वे कई बार विधायक चुने गए और राज्य सरकार में नगरीय प्रशासन, उद्योग, आवास सहित अहम विभागों का जिम्मा संभाल चुके हैं। प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक क्षमता का यह मेल उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है। पार्टी नेतृत्व ने हमेशा उन्हें सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने वाला नेता माना है।
उनकी सबसे बड़ी ताकत संगठन पर पकड़ है। पार्टी का विस्तार सिर्फ बड़े भाषणों से नहीं होता, बल्कि बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने से होता है। विजयवर्गीय लंबे समय से इसी काम में लगे रहे हैं। कार्यकर्ताओं से उनकी सहज पहुंच और नियमित संवाद ने उन्हें जमीनी नेता के रूप में स्थापित किया है। यही वजह है कि जब भी पार्टी को किसी राज्य में संगठन को नई ऊर्जा देनी होती है, नेतृत्व उन पर भरोसा जताता है।
स्पष्टवादी शैली
कैलाश विजयवर्गीय की एक और पहचान उनकी स्पष्टवादिता है। वे कई बार बिना लाग-लपेट अपनी बात रखते हैं। उनके समर्थक इसे उनकी खासियत मानते हैं, जबकि आलोचक इसे विवादास्पद बताते हैं। बावजूद इसके संगठन में उनकी उपयोगिता कम नहीं हुई है, क्योंकि नेतृत्व उनके संगठनात्मक योगदान और चुनावी समझ को प्राथमिकता देता है।
कुल मिलाकर कैलाश विजयवर्गीय बीजेपी के उन नेताओं में हैं जिनकी पहचान केवल चुनावी नेता की नहीं, बल्कि संगठन निर्माता, कुशल रणनीतिकार और नेतृत्व के भरोसेमंद सहयोगी की है। नगर राजनीति से लेकर राष्ट्रीय संगठन तक उन्होंने अपने अनुभव और कार्यशैली से अलग पहचान बनाई है। बीजेपी की संगठनात्मक संस्कृति में ऐसे नेताओं का विशेष महत्व होता है जो कार्यकर्ताओं से निरंतर जुड़े रहें, चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारें और कठिन समय में पार्टी का मनोबल बनाए रखें।
इसी कारण विजयवर्गीय आज भी मप्र बीजेपी के प्रभावशाली और महत्वपूर्ण चेहरे माने जाते हैं। उनका राजनीतिक सफर यह दर्शाता है कि भारतीय जनता पार्टी में जनाधार के साथ-साथ संगठन के प्रति समर्पण, नेतृत्व का विश्वास और लगातार सक्रियता भी किसी नेता की असली ताकत तय करती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



