लेखक-अरविंद जयतिलक
जटिल वैश्विक रणनीतिक-सामरिक गोलबंदी और दांवपेचों के बीच दक्षिण अफ्रीका के शहर जोहान्सबर्ग में आयोजित जी20 देशों का 20 वां शिखर सम्मेलन समावेशी आर्थिक विकास, जलवायु, लचीलापन, स्वास्थ्य, आतंकवाद, सुरक्षित आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर केंद्रित रहा। इस सम्मेलन की थीम रही ‘एकजुटता, समानता और स्थिरता’। सम्मेलन के तीन मुख्य सत्रों में ‘समावेशी और स्थिर आर्थिक विकास’, ‘एक मजबूत दुनिया में जी20 का योगदान’ और ‘सभी के लिए एक सही और न्यायपूर्ण भविष्य’ पर चर्चा हुई। यह सम्मेलन सिर्फ इस मायने में ही महत्वपूर्ण नहीं है कि इसका आयोजन अफ्रीकी महाद्वीप में पहली बार हुआ है। बल्कि इस मायमें में भी महत्वपूर्ण रहा कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सकारात्मक सोच के जरिए असहमतियों और खींचतान के बावजूद भी वैश्विक लक्ष्यों को हासिल करना कोई कठिन लक्ष्य नहीं है। इस दृष्टि से यह सम्मेलन इस लक्ष पर खरा उतरा है। इस सम्मेलन के कुल 122 पैराग्राफ वाले दृष्टिकोण में यह साफ देखने को भी मिला है कि टकराव के बजाय सहमति पर मुहर लगी है जो कि इस सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि है। गौर करें तो सम्मेलन के दृष्टिकोण में मानवीय त्रासदी के लिए जिम्मेदार सुपर शक्तियों को उनकी कारगुजारियों पर परोक्ष रुप से कटाक्ष करते हुए अस्थिर होते वैश्विक अर्थव्यवस्था और संतुलन को लेकर गहरी चिंता जताई गई है। साथ ही इसके समाधान पर भी जोर दिया गया है। दुनिया के जिम्मेदार ताकतवर देशों से अपील की गई कि वे अपने उत्तरदायित्वों का भलीभांति निर्वहन करते हुए यूएन चार्टर के तहत क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करें। देखा भी जा रहा है कि दुनिया के तमाम देश युद्ध में उलझे हैं और परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ता जा रहा है। इस सम्मेलन के दृष्टिकोण पर नजर दौडाएं तो निम्न आय वाले देशों की गरीबी और असमानता पर विशेष फोकस करते हुए उससे निपटने पर जोर दिया गया है। विशेष रुप से अफ्रीकी महाद्वीप में पसरी गरीबी और भूखमरी से निपटने, आर्थिक असमानता दूर करने और बुनियादी जरुरतें पूरा करने पर बल दिया गया है। कहा गया है कि 600 मिलियन अफ्रीकी लोगों तक अभी भी बिजली की पहुंच नहीं है। इस सम्मेलन के उपरांत अब उम्मीद की जानी चाहिए कि जी20 और दुनिया के समर्थ देश अफ्रीकी महाद्वीप के पिछड़े देशों की आर्थिक सेहत सुधारने के लिए कदम आगे बढ़ाएंगे। सम्मेलन के दृटिकोण के जरिए विकासशील देशों के बिगड़ते हालात की ओर भी ध्यान खींचा गया है। इसमें कहा गया है कि घर में भोजन पकाने की ईंधन की कमी से तकरीबन दो मिलियन अफ्रीकी हर वर्ष जान गंवाते हैं। खाद्य सुरक्षा की जरुरतों को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि 2024 में दुनिया के 720 मिलियन लोग भूख से जूझ रहे हैं। इसी तरह तकरीबन 2.6 बिलियन लोगों का संतुलित पोषक भोजन तक पहुंच नहीं है। गौर करें तो यह स्थिति एक स्वस्थ और समृद्ध विश्व के लिए ठीक नहीं है। अगर जी20 के देश इस भीषण समस्या के समाधान में अपना सकारात्मक योगदान देते हैं तो ठीक है वरना हालात पहले से भी बदतर होंगे। ऐसा इसलिए कि खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (एसओएफआई) रिपोर्ट-2025 बताती है कि वर्ष 2024 में 63.8 करोड़ से 72 करोड़ लोग जो वैश्विक जनसंख्या का क्रमशः 7.8 और 8.8 प्रतिशत है, भूख का सामना करेंगे। रिपोर्ट की मानें तो कई देशों में बढ़ी हुई मुद्रास्फिति ने क्रय शक्ति को कमजोर कर दिया है। इससे गरीबी का फैलाव हुआ है। माना जा रहा है कि हालात इसी तरह बने रहे तो 2030 तक भूख और खाद्य असुरक्षा के उन्मूलन यानि एसडीजी लक्ष्य 2.1 को हासिल करना मुश्किल होगा। गौर करें तो संयुक्त राष्ट्र की 2024 की ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट भी बताती है कि दुनिया के 36 देशों में भूख का स्तर बेहद गंभीर है। इस नाते विश्व स्तर पर 2025 तक 673 मिलियन लोग भूख का अनुभव करेंगे जो कि कुल जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत है। विडंबना यह कि एक ओर करोड़ों लोग भूख और कुपोषण से दम तोड़ रहे हैं वहीं विश्व में हर साल लगभग 1.05 अरब टन खाना बर्बाद हो रहा है। यह कुल खाद्य उत्पादन का तकरीबन 19 प्रतिशत है। इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया भर में हर दिन लगभग एक अरब से ज्यादा थालियां बर्बाद होती है। अगर जी20 के देश बर्बाद किए जा रहे अन्न को बचाने का रोडमैप तैयार करते हैं तो निःसंदेह मानवता का कल्याण होगा। इसे ध्यान में रखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मेलन में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य) के अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी वैचारिक मानवीय सोच और दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। उसकी बानगी इस शिखर सम्मेलन में भी देखने को मिली। उन्होंने वैश्विक विकास के उद्देश्य से चार नई पहलों का प्रस्ताव रखा। यह पहल है-वैश्विक ज्ञान भंडार की स्थापना, अफ्रीका कौशल गुणक पहल, वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल प्रतिक्रिया टीम और ड्रग-टेरर नेक्सस का मुकाबला करने की पहल। उन्होंने जी20 देशों से आग्रह किया कि वे समावेशी और सतत विकास पर जोर दें ताकि सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को आसानी से हासिल किया जा सके। उन्होंने भारतीय मूल्यों और सभ्यागत संस्कारों को दुनिया के लिए मार्गदर्शक, कल्याणकारी और प्रेरणादायक कहा। उन्होंने उम्मीद जताई कि जी20 वैश्विक पारंपरिक ज्ञान भंडार पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करेगा जो कि टिकाऊ जीवन के समय-परिक्षणित मॉडल को प्रदर्शित करता है। इससे भविष्य की पीढ़ियों तक ज्ञान के भंडार को पहुंचाने में मदद मिलेगी। भारत के लिए सुखद है कि 2023 में जी20 दिल्ली समिट के दौरान अपनाए गए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं का जिक्र इस सम्मेलन के दृष्टिकोण में भी समाहित है। मसलन घोषणापत्र के पैरा 6 हर तरह के आतंकवाद की भर्त्सना करता है। इसी तरह एआई डिजिटल और इमर्जिंग तकनीक की संभावनाओं को पूरी तरह इस्तेमाल करने का जिक्र है। याद होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली समिट में सबका विकास का आह्नान करते हुए कहा था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता, उत्तर-दक्षिण विभाजन, पश्चिम व पूर्व के बीच अंतर, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा जैसी चुनौतियों से पार पाने के लिए मिलजुल कर कदम बढ़ाना होगा। तब उन्होंने आतंकवाद पर दोहरा नजरिया रखने वाले देशों को आगाह करते हुए कहा था कि आतंकवाद की बीमारी किसी सीमा, राष्ट्रीयता और नस्ल को नहीं पहचानती। सभी देशों को चाहिए कि वे एकजुटता दिखाते हुए आतंकवाद के खिलाफ कठोरता से पेश आएं। गौर करें तो प्रधानमंत्री मोदी एक दशक से अंतर्राष्ट्रीय मंचों के जरिए आतंकवाद के खिलाफ अपना स्पष्ट व कड़ा रुख अख्तियार करते आ रहे हैं। उन्होंने 2024 के रियो डी जेनेरियो शिखर सममेलन से लेकर जापान के ओसाका सम्मेलन तक हर शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के विरुद्ध मजबूत कदम उठाने की पैरवी की है। वे आसियान संगठन के जरिए भी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र संधि का शीध्र अनुमोदन करने का समर्थन संयुक्त राष्ट्र संघ से कर चुके हैं। किसी से छिपा नहीं है कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जो खुलकर आतंकवाद को प्रश्रय देते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ऐसे देशों से दुनिया को सतर्क रहने की जरुरत पर बल देते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जोहान्सबर्ग में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान आस्टेªलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से भी मुलाकात की। उन्होंने भारत, आस्टेªलिया और कनाडा के बीच तकनीक और नवाचार को लेकर एक नई साझेदारी की है। उन्होंने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह पहल तीन महाद्वीपों, तीन महासागरों के तीन लोकतांत्रिक साझेदारों की आपसी पार्टनरशिप को गहरा करेगी। निःसंदेह इस पहल से तीनों देश उभर रही तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला की विविधता, क्लीन एनर्जी और एआई के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। उम्मीद किया जाना चाहिए कि जोहान्सबर्ग सम्मेलन में जिस गंभीरता से वैश्विक आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों के साथ आतंकवाद, जलवायु सरीखे ज्वलंत समस्याओं से निपटने पर चर्चा हुई है और जिस गंभीरता के साथ नेताओं की घोषणा और प्रतिबद्धता को अपनाया गया है उसे धरातल पर उतारने की ईमानदार पहल भी होगी।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




