लेखक:श्रीमुख तिवारी
और अंततः झारखंड के बच्चे जीते।
सरकार ने उनकी सुनी, उनकी सारी मांगे मानी गईं।
लगभग महीने भर चले इस आंदोलन में यदि कोई बच्चों के साथ लगातार खड़ा रहा है, तो वे भैरव सिंह हैं। पहले ही दिन से, आंदोलन पूरा होने तक… छात्रों के लिए आवश्यक व्यवस्था करते, उनके भोजन पानी की चिंता करते, उनके लिए दरी – तिरपाल बिछाते उनके साथ बने रहे। छात्रों के साथ धूप में जले, बारिश में भीगे, रात रात भर जगे… जब छात्रों पर लाठियां बरसीं तो लाठी खाने में उनके साथ रहे, अपना हाथ भी तुड़वाया…
शुरुआती दिनों में इन्होंने भोजन की व्यवस्था खुद देखी। इनके यार दोस्त, साथी तन मन धन लेकर खड़े हुए। फिर लगा कि इतने भर से काम नहीं चलेगा, समाज को जोड़ना होगा। ये लोग वहां काम करने वाली संस्थाओं, मंदिरों के पास गए और उन्हें भंडारा लगाने के लिए तैयार किया। समाज को जोड़ा, महिलाएं अपने अपने घरों से रोटियां बना बना कर लाने लगीं… आश्चर्यजनक लग रहा है न? लगेगा, क्योंकि इस बात पर चर्चा हुई ही नहीं।
रांची दुर्गापूजा समिति, श्री श्री रविशंकर फाउंडेशन के लोग, हिन्दू जागरण मंच, शंकर दुबे शंकर फाउंडेशन, चैती दुर्गापूजा समिति… ऐसी और भी कुछ संस्थाएं आगे आईं और चुपचाप छात्रों के लिए आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करती रहीं। दिल्ली में “मंदिर बंद था” कह कर हिन्दू विरोध का एजेंडा चलाने वालों को देखा था हमने… यहां सारी धार्मिक संस्थाएं सेवा दे रही थीं, पर चुपचाप बिना किसी मीडियाबाजी के…
वह दिल्ली वाला लड़का जो सावन में बिरयानी लेकर पहुंचा था, उसके लिए वामीडिया खूब प्रशस्ति गाती रही, पर भैरव या उनके जैसे स्वयंसेवकों पर बात करने से भी बचते रहे लोग… दिल्ली वाला क्रेडिट खोर गिरोह एक दिन के लिए आया तो उनके लिए खूब बात हुई, पर रांची में अनशन पर बैठे बच्चे की कोई चर्चा नहीं… खैर! यही वामी चरित्र है।
यह पहली बार नहीं है जब भैरव सामाजिक हित के लिए अपना धन और समय खर्च कर के लड़ रहे हैं, वे दशक भर से लड़ ही रहे हैं। वे प्रेम जाल में फंसा कर बेची जाती वनवासी बच्चियों के लिए लड़ते हैं, संगठित तरीके से हिंदुओं की जमीन लूटे जाने पर पड़ते हैं, हिंदू हित के लिए लड़ते हैं…
भैरव चाहते तो चार गंदी गालियां दे कर भी भरपूर चर्चा पा सकते थे। आजकल यही चलन में भी है। पर उन्होंने पब्लिसिटी का यह हिट शॉर्टकट नहीं अपनाया। उन्होंने वही किया जो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले किसी सभ्य व्यक्ति को करना चाहिए।
कहा जा सकता है कि भैरव जैसे युवकों की इस देश को बहुत आवश्यकता है।

(लेखक प्रख्यात ब्लॉगर हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




