लेखक:डॉ.के. विक्रम राव

आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। इसी दिन (3 मई 1991, शुक्रवार) अफ्रीकी राष्ट्र नामीबिया की राजधानी विंडहोक में एक यूनेस्को सेमिनार में “स्वतंत्र और बहुलतावादी अफ्रीकी प्रेस को बढ़ावा देने” की योजना बनी थी। उसी दिन (3 मई) को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया था।

हम पत्रकारों के लिए आज का दिन आत्म-विश्लेषण, स्वमंथन और विवेकपूर्ण विवेचन का दिन है। स्वच्छ मीडिया की कसौटी पर पाठक और दर्शक की दृष्टि में वह कितना निष्ठावान पाया गया ?

अपने छः दशक के श्रमजीवी पत्रकार के दौर में इस कसौटी पर मैं कैसा उतरा ? खरा कितना और खोटा तो क्यों ? इसके जज तो आप लोग होंगे। मैं निजी प्रमाण अपने लेखन के बारे में पेश करता हूं। इसका मूल्यांकन कृपया आप करें।

अपनी शीघ्र प्रकाशित होने वाली आत्मकथा “तूफान तो आए कई, झुका न सके” (पंकज शर्मा, अनामिका प्रकाशन, पता : 21-ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, मो. 9773508632) के कुछ प्रसंगों को आपके परीक्षण हेतु पेश कर रहा हूँ। यह मेरे पत्रकारी जीवन की वास्तविक घटनाएं हैं।

ईमानदारी की कसौटी अक्सर चुनौती के रूप में हम श्रमजीवी पत्रकारों के समक्ष आ पड़ती है। चूके तो जीवनभर का कलंक जुड़ जाता है। ऐसा ही एक मोड़ मेरे पत्रकारी जीवन में भी आया था। एक रात अपनेअहमदाबाद “टाइम्स” के कार्यालय में बैठा था। एक सज्जन आए। उनका आग्रह था : “एक खबर न छपे, यह प्रार्थना करने आया हूं।” पहले तो मैं तनिक चौंका, फिर उनसे कहा : “यहां खबर छपाने लोग आते हैं। आप तो मंदिर में गौहत्या कराने आए हैं।” वे सहम गए। फिर मैंने पूछा आखिर खबर क्या है ? गुजरात के वे नामी गिरामी उद्योगपति सहमकर बोले : “मेरी इकलौती बेटी और मेरा ड्राइवर तीन दिन से घर नहीं आए। यदि यह खबर छप गई तो मेरे कुटुम्ब का सर्वनाश हो जाएगा।”

तनिक रुक कर मैं बोला : “आप जाइए। आराम से सोइए। मेरे अखबार में यह खबर मेरे रहते कदापि नहीं छपेगी। किसी नागरिक के घर बच्चा क्या हरकत कर बैठता है, यह हमारे लिए खबर नहीं है।” वे संतुष्ट होकर घर लौट गए। उनकी हालत यूं थी कि मानो भारी असबाब उतारकर कुली लंबी सांस ले रहा हो। उस कसौटी पर खरा उतरने से मेरा मन बड़ा खुश हुआ।


मेरा बाल्यकाल अभावों में गुजरा। एक शाम (सितंबर, 1942) घर की रसोई ठंडी थी। अनाज खत्म हो गया था। लखनऊ के नजरबाग मोहल्ले के पंसारी ने पुराना बकाया न चुकाने तक नया राशन देने से इन्कार कर दिया था। पिताजी जेल में। हम आठ भाई-बहन, उसमें सबसे बड़े प्रताप केवल अठारह वर्ष के। विश्वविद्यालय में छात्र थे। बड़े होने पर मां ने मुझे बताया कि कांग्रेस नेता और हेरल्ड के डायरेक्टर रफी अहमद किदवाई ने अपने साथी अजीत प्रसाद जैन (बाद में केंद्रीय मंत्री) को युवराजदत्त सिंह, राजा साहब ओयल (लखीमपुर खीरी), के पास भेजा। सहायता राशि लाकर उन्होंने पंसारी का बकाया चुकाया। दानापानी लाये। रसोई फिर गर्म हुई। भूख दूर हुई।

बड़ौदा पुलिस की हिरासत में मुझ कैदी के साथ (22 मार्च 1976) सवाल-जवाब के दौरान एक गुजराती डीआईजी साहब (पी.एन. राइटर) ने ताना मारा “प्रेस सेंसरशिप (25 जून 1975) लागू होते ही देशभर के पत्रकार पटरी पर आ गये थे। आपको अलग राग अलापने की क्यों सूझी ?” कटाक्ष चुटीला था। मैंने अपने जवाब में डीआईजी से पूछा : “कौन सा दैनिक आप पढ़ते हैं ?” वे बोले, “दि टाइम्स ऑफ़ इण्डिया।” बड़ौदा में तब मैं उसी का ब्यूरो प्रमुख था। मेरा दूसरा सवाल था, “इस अठारह पृष्ठवाले अखबार को पढ़ने में 25 जून के पूर्व (जब सारे समाचार बिना सेंसर के छपते थे) कितना समय आप लगाते थे ?” उनका संक्षिप्त उत्तर था, “यही करीब बीस मिनट।” मेरा अगला और अन्तिम सवाल था, “और अब ?” रायटर साहब बोले, “बस आठ या नौ मिनट।” 

तब “पटरी से मेरे उतर जाने” का कारण मैंने उन्हें बताया, “आप सरीखे पाठक से छीने गये ग्यारह मिनटों को वापस दिलाने के लिये ही मैं जेल में आया हूँ।”


मेरी कैद के प्रथम दिन से ही मेरी प्रेस सेंसरशिप के (1975-77) प्रतिरोधात्मक संकल्प शक्ति को तोड़ने की साजिश सी.बी.आई. रचती रही थी। आला पुलिस हाकिमों ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर मुझको जार्ज फर्नांडिस के विरूद्ध वादामाफ गवाह (एप्रूवर) बनाने का सतत यत्न किया था। एक दिन तो उनलोगों ने मुझको अल्टिमेटम दे डाला कि यदि मैं सरकारी गवाह नही बनेंगे तो मेरी पत्नी को भी सहअपराधी बनाकर बड़ौदा जेल में ले आयेंगे। सी.बी.आई. की धमकी से मैं हिल गया था। तब मेरी पुत्री विनीता चार वर्ष की और बेटा सुदेव तीन वर्ष के थे। दूसरे शनिवार को मेरी पत्नी बड़ौदा जेल भेंट करने आईं। उनसे मैंने पूछा। सुधा ने बेहिचक कहा : “जेल में खाना पकाऊँगी। यहीं रहेंगे। पर साथी (जार्ज फर्नांडिस) से गद्दारी नही करेंगे|” अगले दिन सी.बी.आई. वाले जानने आये। मेरा जवाब तीन ही शब्दों में था, “लड़ेंगे, झुकेंगे नहीं”। फिर यातनाओं का सिलसिला ज्यादा लम्बाया।

आपातकाल के दो परिदृश्य भी याद आए। मार्च के प्रथम सप्ताह (9 मार्च 1977, मेरे संपादक-सांसद स्व. पिता श्री के. रामा राव की सोलहवीं पुण्यतिथि पर) डॉ. सुधा मेरे दोनों बच्चों (विनीता और सुदेव) के साथ मुझसे भेंट करने तिहाड़ जेल, दिल्ली, आईं। वहां चार-वर्षीया विनीता ने जेल गार्ड से पूछा : “मेरे पिताजी घर कब आएंगे।” गार्ड बोला :“तुम्हारी शादी पर, या शायद कभी नहीं।” 

प्रधानमंत्री जिसका मैं आजीवन आभारी रहूंगा, वे थे मोरारजीभाई देसाई। मुझे टाइम्स प्रबंधन ने आपातकाल में मेरे बड़ौदा जेल में रहते निलंबित कर दिया था और तिहाड़ जेल में रहते बर्खास्त कर दिया था। इस जनता पार्टी के प्रधानमंत्री ने हमारे खिलाफ डायनामाइट मुकदमे को वापस ले लिया। मालिक अशोक जैन को कोलकता फोन पर आदेश दिया कि जो श्रमिक आपातकाल में बर्खास्त किए गए थे, सवेतन पुनर्नियुक्त कर दिए जायें। मुझे लखनऊ तैनात किया गया। छः वर्ष कार्यरत रहा। 
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(लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तंभकार हैं)

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