(30 जनवरी 2019 को राव साहब द्वारा लिखा गया लेख)
लेखक: डॉ के विक्रम राव

बापू (Mahatama Gandhi) की पुण्यतिथि पर नाथूराम विनायक गोड्से की भी याद आती है| जैसे ग्रहण की बेला पर राहु-केतु| गत चन्द वर्षों से इस जघन्य हत्यारे का महिमामंडन हो रहा है| जिस देश में पंचमी के दिन नाग को दूध पिलाते हों, वहाँ इसमें अचरज नहीं होगा|
आखिर कैसा, कौन और क्या था गोड्से? क्या वह चिन्तक था, कोई ख्यातिप्राप्त राजनेता था, हिन्दू महासभा का कभी निर्वाचित पदाधिकारी था, जेलयातना भोगा स्वतंत्रता सेनानी था? इतनी ऊंचाइयों के दूर-दूर तक भी गोड्से कभी पहुँच ही नहीं पाया था| पुणे शहर के उसके निम्नवर्गीय पुराने मोहल्ले के बाहर भी उसे कोई नहीं जानता था, जबकि तब वह चालीस की आयु के समीप था|
नाथूराम स्कूल से भागा हुआ छात्र था| नूतन मराठी विद्यालय में मिडिल की परीक्षा में फेल हो जाने पर उसने पढाई बंद कर दी थी| उसका मराठी भाषा का ज्ञान भी अल्प था| अंग्रेजी और इतर भाषाओँ की जानकारी तो शून्य ही थी| जीविका हेतु उसने पढाई छोड़ दी थी| सांगली शहर में दर्जी की दुकान खोल ली थी| उसके पिता विनायक गोड्से डाकखाने में बाबू थे, मासिक आय पांच रूपये थी| नाथूराम अपने पिता का लाडला था क्योंकि उससे पहले जन्मी सारी संतानें मर गई थीं| नाथूराम के बाद और भी पैदा हुए थे, जिनमें था गोपाल, जो नाथूराम के साथ सहअभियुक्त था|
नाथूराम की युवावस्था किसी खास घटना अथवा राष्ट्रवादी, अंग्रेज-विरोधी विचार के लिये नहीं जानी जाती है| स्वाधीनता संग्राम की हलचल से नाथूराम का तनिक भी न रूचि थी, न सरोकार था|
जो लोग नाथूराम गोड्से को श्लाघा का पात्र समझते हैं, उन्हें खासकर याद करना होगा कि गांधीजी की हत्या के बाद जब नाथूराम के पुणे आवास तथा मुंबई के मित्रों (विधायक गणपत संभाजी खुरान) के घर छापे पड़े थे, तो मारक अस्त्रों का भंडार पकड़ा गया था, जिसे उसने हैदराबाद के निजाम पर हमला करने के नाम पर बटोर था| यह दीगर बात है कि इन असलहों का प्रयोग कभी नहीं किया गया| मुंबई और पुणे के व्यापारियों से अपने हिन्दू राष्ट्र संगठन के नाम पर नाथूराम ने अकूत धन वसूला था, जिसका कभी लेखाजोखा तक नहीं पेश हुआ|
बारीकी से परीक्षण पर निष्कर्ष यही निकलता है कि कतिपय हिन्दू उग्रवादियों द्वारा नाथूराम भाड़े पर रखा गया था| जेल में उसकी चिकित्सकीय रपटों से ज्ञात होता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था| यह अड़तीस-वर्षीय बेरोजगार, अविवाहित और दिमागी बीमारी से त्रस्त, नाथूराम किसी भी मायने में सामान्य मनःस्थिति वाला व्यक्ति नहीं हो सकता| उसने गांधीजी की हत्या का पहला प्रयास 20, जनवरी 1948 को किया था| सहअभियुक्त मदनलाल पाहवा से मिलकर उसने नई दिल्ली के बिड़ला हाउस पर बम फेंका था, जहाँ गांधीजी प्रार्थना सभा कर रहे थे| बम का निशाना चूक गया| पाहवा पकड़ा गया, मगर नाथूराम भाग निकला और मुंबई में पनाह ली| दस दिन बाद अपने काम को पूरा करने वह दिल्ली आया था|
हत्या के बाद पकड़े जाने पर नाथूराम ने अपने को मुसलमान दर्शाने की कोशिश की थी| अर्थात्, एक ढेला, दो लक्ष्य| गांधीजी की हत्या हो जाती, दोष मुसलमानों पर जाता और उनका संहार शुरू हो जाता| ठीक उसी भांति जो 30 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिक्खों के साथ हुआ था| न जाने किन कारणों से अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नहीं बताया कि हत्यारे का नाम क्या था| तुरंत बाद आकाशवाणी भवन जाकर सूचना मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने देशवासियों को बताया कि महात्मा गांधी का हत्यारा एक हिन्दू था| सरदार पटेल ने मुसलमानों को बचा लिया|
जो लोग अभी भी नाथूराम गोड्से के प्रति थोड़ी बहुत नरमी बरतते हैं, उन्हें इस निष्ठुर, क्रूर हत्यारे के बारे में तीन प्रमाणित तथ्यों पर गौर करना चाहिए : गांधीजी को मारने के दो सप्ताह पूर्व नाथूराम ने अपने जीवन को काफी बड़ी राशि के लिये बीमा कम्पनी से सुरक्षित करा लिया था| जाहिर है उसके मौत के बाद उसके परिवारजन इस बीमा राशि से लाभान्वित होते| (पृष्ठ 18 व 19 : गांधीवध और मैं, लेखक: गोपाल विनायक गोड्से, प्रकाशक: वितस्ता प्रकाशन पुणे: 1982)| ऐतिहासिक मिशन को लेकर चलने वाला व्यक्ति बीमा कम्पनी से क्या ऐसा मुनाफा कमाना चाहेगा? मृत्युदंड से बचने के लिये नाथूराम के अधिवक्ता ने दो चश्मदीद गवाहों के बयानों में विरोधाभास का सहारा लिया था| उनमें से एक ने कहा कि पिस्तौल से धुंआ नहीं निकला था| दूसरे ने कहा कि गोलियां दगी और धुंआ निकला था| दलील थी कि हत्या किसी और के पिस्तौल से हो सकती है| संदेह का लाभ पाकर नाथूराम छूट जाता| माजरा कुछ मुम्बइया फिल्मों जैसा रचने का एक भोंड़ा प्रयास था|
अब जानिये गोड्से के परम सखा, फाँसी पर लटके नारायण दत्तात्रेय आपटे को| उसने 29 जनवरी की रात दिल्ली के वेश्यालय में गुजारी थी| ताकत बढ़ाने हेतु| आपटे और गोड्से ने जेल के भीतर सुविधाओं की मांग की| हालांकि स्नातक वा पर्याप्त शिक्षित न होने के कारण उसे पंजाब जेल नियम संहिता के अनुसार साधारण कैदी की तरह रखा जाना चाहिये था| देश के हर शहीद ने अंग्रेज जेलों में विशिष्ट सुविधाओं को मांगना तो दूर, उनका तिरस्कार किया था| अपने मृत्युदंड के निर्णय के खिलाफ नाथूराम ने लंदन की प्रिवी काउंसिल में अपील की थी| तब भारत स्वाधीन हो गया था, फिर भी नाथूराम ने ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ लार्ड्स की न्यायिक पीठ से सजा-माफ़ी की अभ्यर्थना की थी| अंग्रेज जजों ने उसे अस्वीकार कर दिया था| उसके भाई गोपाल गोड्से ने जेल में प्रत्येक गांधी जयंती में बढ़चढ़कर शिरकत की, रक्तदान शिविरों में हिस्सा लिया क्योंकि जेल नियम में ऐसा करने पर सजा की अवधि में छूट मिलती है| पूरी सजा के पहले ही गोपाल रिहाई पा गया था| पुणे के निकट खड़की उपनगर के सेना मोटर परिवहन विभाग में एक क्लर्क था गोपाल गोड्से, जो जिरह के दौरान गांधी हत्या से अपने को अनजान और निर्दोष बताता रहा| अदालत ने उसे आजीवन कारावास दिया| जल्दी रिहा होकर, पुणे के अपने सदाशिवपेठ मोहल्ले से गोपाल गुर्राता रहा कि उसका भाई नाथूराम शहीद है और स्वयं को वह एक राष्ट्रभक्त आन्दोलनकारी की भूमिका में पेश करता रहा| बेझिझक वह कहता रहा कि एक अधनंगे, कमजोर, असुरक्षित फकीर की हत्या पर उसे पश्चाताप अथवा छोभ नहीं है|
कुछ लोग नाथूराम गोड्से को उच्चकोटि का चिन्तक, ऐतिहासिक मिशनवाला पुरुष तथा अदम्य नैतिक ऊर्जा वाला व्यक्ति बनाकर पेश करते हैं| उनके तर्क का आधार नाथूराम का वह दस-पृष्ठीय वक्तव्य है जिसे उसने बड़े तर्कसंगत, भावनाभरे शब्दों में लिखकर अदालत में पढ़ा था कि उसने गांधीजी को क्यों मारा? उस समय दिल्ली में ऐसे कई हिंदूवादी थे, जिनका भाषा पर आधिपत्य, प्रवाहमयी शैली में अभिव्यक्ति का नैपुण्य तथा वैचारिक तार्किकता का ज्ञान भरपूर था| उनमें से कोई भी नाथूराम का ओजस्वी वक्तव्य लिखकर जेल के भीतर भिजवा सकता था| जो व्यक्ति मराठी भी भलीभांति न जनता हो, अंग्रेजी से तो निरा मूढ़ रहा हो, वह व्यक्ति ऐसा बयान क्या लिख सकता था? विश्वास करना कठिन है| यह वैसा ही है जैसा कि कमजोर छात्र परीक्षा में अचानक सौ बटा सौ नम्बर ले आये! हम भारतीय अपनी दोमुहीं, छ्लभरी सोच को तजकर, सीधी, सरल बात करना कब शुरू करेंगे, कि हत्या एक जघन्य अपराध और सिर्फ नृशंस हरकत है| वह भी लुकाटी थामे, एक वृद्ध अधनंगे, श्रृद्धालु हिन्दू की जो राम का अनन्य, आजीवन भक्त रहा|

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार के साथ ही IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट रहें हैं और अब गोलोकधाम वासी हैं)

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