लेखक-कलूड़ा अभिनव
हमारे लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संविधान में नहीं बल्कि उसे प्रभावी बनाने वाली संसदीय संस्थाओं, परंपराओं तथा प्रक्रियाओं में निहित है। संसद सिर्फ कानून निर्माण का मंच भर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, जनप्रतिनिधित्व और शासन-व्यवस्था की पारदर्शिता का सर्वोच्च संस्थान है।
ऐसे में जब संसदीय कार्यप्रणाली और संवैधानिक प्रक्रियाओं को ज्यादा समझने की आवश्यकता है तो ‘भारतीय संसद’ पुस्तक इस विषय पर एक प्रामाणिक, तथ्यपरक और व्यावहारिक कृति के रूप में सामने आती है। मूलतः अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस पुस्तक का हिंदी संस्करण भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है और इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक देवेंद्र सिंह लोकसभा सचिवालय में अपर सचिव के पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं इसलिए संसदीय कार्यप्रणाली का उनका दीर्घ प्रशासनिक अनुभव पुस्तक को विशेष विश्वसनीयता प्रदान करता है। यही कारण है कि इसमें संसदीय इतिहास, संवैधानिक प्रावधानों, विधायी एवं वित्तीय प्रक्रियाओं, संसदीय समितियों, प्रश्नकाल और राजनीतिक व्यवस्था का केवल विवरण नहीं, बल्कि संतुलित और व्यावहारिक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है। सरल, प्रवाहपूर्ण और शोधपरक शैली में लिखी गई यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों, संसदीय कार्यवाही को कवर करने वाले पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों तथा लोकतंत्र के गंभीर अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है।
‘भारतीय संसद’ पुस्तक भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लगभग सभी आयामों का समग्र और तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। पुस्तक के लेखक उस धारणा को चुनौती देते हैं जिसमें कहा जाता है कि हमारा लोकतंत्र पश्चिम की देन है। पुस्तक में भारत को लोकतंत्र की जननी बताते हुए कहा गया है कि इसका आधार शुक्राचार्य के नीतिशास्त्र सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में है। लेखक मानते हैं कि भारतीय संविधान ने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की कई प्रक्रियाओं को अपनाया गया है किंतु लोकतांत्रिक चिंतन और जनभागीदारी की परंपरा भारत की अपनी है और आज के लोकतंत्रों से कहीं अधिक मजबूत असैा प्राचीन है।
पुस्तक में भारतीय संसद के विकासक्रम का भी विवरण है। लेखक 1919 के अधिनियम से द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना, 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज के अंगीकरण तथा 1954 में लोकसभा और राज्यसभा नामों के प्रचलन में आने जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों को भारतीय संसदीय लोकतंत्र के विकास की निर्णायक कड़ियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक भूमिका का व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करने के साथ ही पुस्तक में कहा गया है कि प्रधानमंत्री के पद छोड़ने के साथ मंत्रिपरिषद का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है। राष्ट्रपति की पुनर्विचार शक्ति और वीटो जैसे संवैधानिक प्रावधानों को 1986 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह तथा 2006 में राष्ट्रपति रहे ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के उदाहरणों से स्पष्ट किया गया है।
संसद के विशेषाधिकार, लाभ के पद, दलबदल विरोधी कानून और संसदीय समितियों का विश्लेषण पुस्तक को और समृद्ध बनाता है। पुस्तक में कहा गया है कि बिना अनुमति लगातार 60 दिन तक अनुपस्थित रहने पर संसद सदस्य की सीट रिक्त घोषित की जा सकती है। लेखक ने इस संदर्भ में शिबू सोरेन और जया बच्चन के मामलों के माध्यम से लाभ के पद की अवधारणा को विस्तार से स्पष्ट किया है। वहीं 52वें और 91वें संविधान संशोधनों के संदर्भ में दलबदल विरोधी कानून का सरल और तथ्यपरक विवेचन है। लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, लोक उपक्रम समिति तथा 24 विभाग संबंधी स्थायी समितियों की भूमिका का भी संसदीय मामलों के अध्येताओं के लिए प्रभावी विश्लेषण पुस्तक की उपयोगिता बढ़ाता है।
पुस्तक का वित्तीय कार्यवाही संबंधी अध्याय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बजट, विनियोग विधेयक, वित्त विधेयक, लेखानुदान, अनुपूरक अनुदान और कटौती प्रस्ताव जैसी जटिल प्रक्रियाओं को सरल भाषा में समझाया गया है। पुस्तक में कहा गया है कि विभाग संबंधी स्थायी समितियां मंत्रालयों के बजट, विधेयकों और नीतियों की गहन समीक्षा कर संसद के वित्तीय नियंत्रण और कार्यपालिका की जवाबदेही को सुदृढ़ बनाती हैं। समग्र रूप से ‘भारतीय संसद’ संसदीय नियमों का मात्र संकलन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत संरचना और संसदीय कार्यप्रणाली का गंभीर, शोधपरक और प्रामाणिक अध्ययन है। तथ्यपरकता, संतुलित विश्लेषण और सहज प्रस्तुति इस कृति को विद्यार्थियों, शोधार्थियों, जनप्रतिनिधियों, संसदीय पत्रकारों तथा लोकतंत्र में रुचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए एक अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय संदर्भ ग्रंथ बनाती है।
प्रश्नकाल को संसदीय लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही का सबसे प्रभावी मंच बताते हुए पुस्तक में प्रश्नकाल की वर्तमान व्यवस्था और उसके ऐतिहासिक विकास को भी प्रस्तुत किया गया है। लेखक कहते हैं कि भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 के तहत पहली बार गैर-सरकारी सदस्यों को सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार मिला और 16 फरवरी 1893 को भिन्गा के राजा उदय प्रताप सिंह ने तत्कालीन केंद्रीय विधान परिषद में पहला प्रश्न पूछा। स्वतंत्र भारत में प्रथम लोकसभा के साथ 17 मई 1952 से प्रश्नकाल की नियमित परंपरा प्रारंभ हुई। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर ने इसे संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। पुस्तक में प्रश्नों के प्रकार तारांकित, अतारांकित यानी मौखिक और अल्प सूचना प्रश्न, उनकी स्वीकृति, उत्तर देने की प्रक्रिया तथा प्रश्नकाल की संसदीय उपयोगिता का सरल और तथ्यपरक विवेचन किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रश्नकाल सरकार को संसद और जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने का सबसे प्रभावी संसदीय तंत्र है। ‘संसद में बहस’ अध्याय संसदीय विमर्श की प्रमुख प्रक्रियाओं का व्यवस्थित परिचय देता है। पुस्तक में राष्ट्रपति के अभिभाषण, धन्यवाद प्रस्ताव, बजट बहस, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, नियम 377 तथा शून्यकाल की प्रकृति और महत्व का स्पष्ट विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि ये केवल संसदीय औपचारिकताएं नहीं बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाने और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के लोकतांत्रिक माध्यम हैं।
संसदीय समितियों की महत्ता भी पुस्तक में व्यापक विवेचन करते हुए कहा गया है कि संसद की वित्तीय समितियां, विभाग संबंधी स्थायी समितियां तथा अन्य स्थायी एवं तदर्थ समितियां हैं। लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, लोक उपक्रम समिति और विभाग संबंधी स्थायी समितियों की संरचना, अधिकारों तथा कार्यप्रणाली का संक्षिप्त किंतु सारगर्भित परिचय दिया गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि समिति के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य और दस्तावेज उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक नहीं किए जा सकते तथा उसकी कार्यवाही न्यायिक जांच के दायरे से बाहर रहती है। इससे संसदीय समितियों की संस्थागत गरिमा और उपयोगिता स्पष्ट होती है। संसद के विशेषाधिकारों पर भी पुस्तक में संतुलित और तथ्यपरक चर्चा करते हुए कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 105 के अंतर्गत संसद और उसके सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकारों का उद्देश्य सदन की स्वतंत्रता, गरिमा और निर्बाध कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना है। सदन अथवा उसकी समितियों में दिए गए भाषण और मतदान के लिए सदस्यों को न्यायालय में उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। विशेषाधिकार हनन, सदन की अवमानना तथा गोपनीय बैठकों एवं समितियों की रिपोर्टों के प्रकाशन संबंधी प्रावधानों का भी स्पष्ट विवेचन है। राष्ट्रपति की शक्तियां, प्रधानमंत्री की नियुक्ति,संसद की विधायी शक्तियां, सदस्यों की अयोग्यता जैसे मामलों आदि को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी पुस्तक में दी गई है।
लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियों और दायित्वों पर आधारित अध्याय पुस्तक की विशिष्ट उपलब्धियों में है। लेखक का दीर्घ संसदीय अनुभव इसे विशेष विश्वसनीयता प्रदान करता है। पुस्तक में कहा गया है कि अध्यक्ष सदन का सर्वोच्च पीठासीन अधिकारी होता है, जो कार्यवाही का संचालन, व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने, नियमों की व्याख्या करने तथा आवश्यकतानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार रखता है। संसदीय समितियों के गठन तथा किसी विधेयक को धन विधेयक घोषित करने में अध्यक्ष की निर्णायक भूमिका का भी संतुलित विश्लेषण किया गया है। ‘राजनीतिक दल और लोकतांत्रिक राजनीति’ अध्याय भारतीय दलगत राजनीति के विकासक्रम का तथ्याधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पुस्तक में दी गई सांख्यिकीय जानकारी के अनुसार प्रथम लोकसभा में 14 राष्ट्रीय दलों सहित 31 राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व था और 18वीं लोकसभा में राष्ट्रीय दलों की संख्या सात रह गई। पुस्तक में कहा गया है कि 1977 में विपक्ष के नेता के पद को मान्यता और कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। लेखक के अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का नेता केवल सरकार का आलोचक नहीं, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला महत्वपूर्ण संसदीय स्तंभ है।पुस्तक हिंदी में है लेकिन संसदीय कार्य प्रणाली में जेपीसी, मनी बिल, गिलोटिन आदि अंग्रेजी के कई शब्द ज्यादा प्रचलन में हैं। ऐसे में धन विधेयक, वित्त विधेयक, विनियोग विधेयक, लेखानुदान, अनुपूरक अनुदान, कटौती प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव जैसे कुछ शब्दों को अंग्रेजी में भी नाम दिया होता तो पाठकों के लिए आसान रहता। इसी तरह से प्रमुख संसदीय समितियों के काम आद को लेकर विवरण थोड़ा और विस्तार से दिया जाता तो यह और भी उपयोगी होता और पुस्तक को पाठक हमेशा एक समग्र तथा महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल करते।
लोकसभा में किसी विषय पर चर्चा कराने के कई नियम और प्रक्रियाएं हैं। विषय की प्रकृति और तात्कालिकता के अनुसार अलग-अलग नियम लागू होते हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा नियम 193 की होती है। सरकार सदस्यों की मांग पर अक्सर देश में ज्वलंत मुद्दों पर इस नियम के तहत चर्चा कराती है क्योंकि इसमें मंत्री से जवाब की अपेक्षा रहती है लेकिन नियम 184 के तहत चर्चा के अंत में सरकार उत्तर देने को बाध्य होती है, फिर प्रस्ताव पर मतदान होता है इसलिए सरकार इस नियम के तहत चर्चा कराने से अक्सर बचने का प्रयास करती है जबकि विपक्ष अक्सर ऐसे मुद्दों पर इसी नियम के तहत चर्चा की मांग करता है।अल्पकालिक चर्चा के तहत महत्वपूर्ण सार्वजनिक विषयों पर चर्चा होती है लेकिन इस पर मतदान नहीं होता। स्थगन प्रस्ताव में नियम 56 के तहत अत्यंत गंभीर और तात्कालिक राष्ट्रीय महत्व के विषय पर सदन का सामान्य कामकाज स्थगित कर चर्चा कराई जाती है। इसे स्वीकार करना अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर करता है।

इसी तरह से नियम 377 सदस्य अपने क्षेत्र या जनहित के मुद्दे संक्षेप में सदन के समक्ष रखते हैं। लोकसभा में प्रश्नकाल के तुरंत बाद यानी 12 बजे से हर दिन शून्यकाल होता है जिसके तहत सदस्य तात्कालिक जनहित के मुद्दे उठाते हैं। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के विषय पर मंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए किया जाता है। इस पर मंत्री वक्तव्य देते हैं और अपने उठाए मुद्दे पर सदस्य सरकार से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं।
इन सब विवरणों के साथ ‘भारतीय संसद’ पुस्तक विषय की व्यापकता, तथ्यपरकता, संवैधानिक विश्लेषण और व्यावहारिक दृष्टि के कारण हिंदी में संसदीय अध्ययन की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति बनकर उभरती है। यह केवल संसदीय नियमों का संकलन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत संरचना, संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने का विश्वसनीय मार्गदर्शक है। विद्यार्थियों, शोधार्थियों, संसदीय पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए यह समान रूप से उपयोगी और संग्रहणीय संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होती है।




