लेखक~अरविंद जयतिलक
♂÷भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन की अनेक ऐसी बातें हैं जो देश के युवाओं को प्रेरणा देती हैं। 23 वर्ष की उम्र से ही भगत सिंह ने अपने लेखन के जरिए एक ऐसा आंदोलित, विचार खड़ा कर दिया जिससे दशकों तक भारत की युवा पीढ़ी प्रेरणा लेती रहेगी।भगत सिंह ने अपने गरिमामय शहादत और आंदोलित विचारों से देश दुनिया को संदेश दिया की क्रांतिकारी आंदोलन के पीछे उनका मकसद अंध राष्ट्रवादीता नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना थी।हालांकि यह त्रासदी है कि आजादी के चार दशक बाद तक भगत सिंह के विचार और उनसे जुड़े दस्तावेज देश के आम जन तक नहीं पहुंच पाए और देश की युवा पीढ़ी उनके आंदोलित व राष्ट्रवादी विचारों से अनभिज्ञ रहे।भगत सिंह के विचारों और क्रांतिकारकता को समझने के लिए जेल के दिनों में उनके लिखे खत् और लेखों को पढ़ना आवश्यक है। इन खतों और लेखों के माध्यम से समझा जा सकता है कि भगत सिंह रक्तपात के कत्तई पक्षधर नहीं थे। वे और उनके साथियों ने अंग्रेज पुलिस सुपरिंटेंडेंट को निशाना बनाया, जब 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शन में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों पर ब्रिटिश हुकूमत ने लाठियां बरसाईं। जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हुए और मृत्यु को प्राप्त हो गए।भगत सिंह समाजवाद और मानववाद के पोषक थे और इसी कारण उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की भारतीयों के प्रति शोषण की नीति का जमकर विरोध किया। भारतीयों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध लाजमी था ठीक उसी तरह जिस तरह एक महान देशभक्त का होता है। भगत सिंह कतई नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश संसद से मजदूर विरोधी नीतियां पारित हो। उनकी सोच थी कि अंग्रेजों को पता चलना चाहिए कि हिंदुस्तानी जाग चुके हैं और वह अधिक दिनों तक गुलामी के चंगुल में नहीं रह सकते। उन्होंने अपने विचारों से अंग्रेजों को यह बात समझानी चाही लेकिन वे समझने को तैयार नहीं हुए, तब उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को अपनी बात उन तक पहुंचाने के लिए अपने साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त से मिलकर ब्रिटिश सरकार के केंद्रीय असेंबली में बम फेंका। उन्होंने यह बम खाली स्थान पर फेंका था कि किसी को नुकसान ना पहुंचे, बम फेंकने के बाद उन्होंने “इंकलाब-जिंदाबाद” के नारे लगाए और पर्चे फेंके। यहां यह समझना होगा कि उनका मकसद खून खराबा करना नहीं था,उन्होंने कहा कि यदि बहरों को सुनाना है तो आवाज को बहुत जोरदार होना चाहिए ,जब हमने बम गिराया तो हमारा ध्येय किसी को मारना नहीं था,हमने अंग्रेजी हुकूमत पर बम गिराया था अंग्रेजों को भारत छोड़ना चाहिए और उसे आजाद करना चाहिए।
यहां उल्लेखनीय है कि बम गिराने के बाद वे चाहते तो भाग सकते थे लेकिन उन्होंने भागना स्वीकार नही किया बल्कि बहादुरी सेअपनी गिरफ्तारी दी।सच कहें तो भगत सिंह ने यह साहस दिखाकर अंग्रेजों को समझा दिया कि एक हिंदुस्तानी क्या-क्या कर सकता है।उनका यह साहस दर्शाता है कि वह शांति के पैरोकार थे और हिंसा में उनका विश्वास तनिक भी नहीं था। उन्होंने अपनी क्रांतिकारिता को रेखांकित करते हुए कहा भी है कि “जरूरी नहीं था की क्रांति में अभिशप्त संघर्ष शामिल हो, यह बम और पिस्तौल का पंथ नहीं था। भगत सिंह का अहिंसा में कितना अधिक विश्वास था वह इसी से समझा जा सकता है कि एक स्थान पर उन्होंने कहा”अहिंसा को आत्मबल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है, जिसमें अन्ततः प्रतिद्वंद्वी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है, लेकिन तब क्या हो जब यह प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाए?तभी हमें आत्मबल को शारिरिक बल से जोड़ने की जरूरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर निर्भर न रहें।क्या ऐसे विचार वाले एक महान क्रांतिकारी को हिंसावादी कहना उचित होगा?
ध्यान देना होगा कि सन 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ तो भगत सिंह का खून खौल उठा लेकिन उन्होंने हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के बजाए महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन का समर्थन किया।जेल में भगत सिंह ने बहुत यातनाएं सही।न तो उन्हें अच्छा खाना दिया जाता था और ना ही पहनने को साफ-सुथरे कपड़े दिए जाते थे।उन्हें बुरी तरह पीटा जाता था और गालियां दी जाती थी, लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने जेल में रहते हुए ही अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया।भगत सिंह की जनमानस में व्याप्त लोकप्रियता से अंग्रेज इस कदर डरे हुए थे कि 24 मार्च 1931 को उन्हें फाँसी पर लटकाने के बाद उनके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिए,उन्हें भय था कि उनके परिजनों को उनका मृत शरीर सौंपा गया तो देश में क्रांति की ज्वाला भड़क उठेंगी जिसे संभालना मुश्किल होगा।भगत सिंह ने क्रांति के बारे में स्पष्ट कहा है कि”किसी को क्रांति शब्द की व्याख्या शाब्दिक अर्थ में नहीं करनी चाहिए जो लोग इस शब्द का उपयोग या दुरुपयोग करते हैं उनके फायदे के हिसाब से इसे अलग-अलग अर्थ और अभिप्राय दिए जाते हैं”। विडंबना यह है कि भगत सिंBह को कुछ इसी तरह के फ़्रेम में फिट कर उनके क्रांतिकारी विचारों की व्याख्या की गई जो एक किस्म से उनके साथ छल है।सच तो यह है कि भगत सिंह आजादी के नायक हैं और देश उनका ऋणी है।

÷लेखक प्रसिद्ध सामाजिक ,राजनीतिक टिप्पणीकार÷






















