लेखक~अरविंद जयतिलक
♂÷संयुक्त राष्ट्र की अंतर सरकारी समिति की ‘जलवायु परिवर्तन 2021-द फिजिकल साइंस बेसिस (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि तेजी से बिगड़ती जलवायु के कारण 2030 के दशक में पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक यह स्थिति मानवता के लिए बेहद खतरनाक होगा। गौरतलब है कि तीन हजार से ज्यादा पन्नों वाली यह रिपोर्ट 234 वैज्ञानिकों ने तैयार की है जिनके मुताबिक तापमान वृद्धि के लिए विशेष रुप से कार्बन और मिथेन गैस जिम्मेदार हैं। अभी गत वर्ष ही ब्रिटेन में मौसम विभाग के कार्यालय और एक्जेटर विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि वायुमंडल में कार्बन डाईआॅक्साइड की सघनता में 1958 से करीब 30 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है। आईपीसीसी की रिपोर्ट से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि वायुमंडल गर्म करने वाली इन गैसों का उत्सर्जन पर रोक नहीं लगा तो इस सदी के मध्य तक समुद्र का जलस्तर 12 इंच तक बढ़ जाएगा। इससे निचले तटीय क्षेत्रों में समुद्री बाढ़ की संभावना प्रबल होगी और तटीय शहरों को नुकसान पहुंचेगा। दूसरी ओर तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघलेंगे तथा बारिश और सूखा जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। चूंकि हिंद महासागर तेजी से गर्म हो रहा है ऐसे में इसका भारत पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। वैज्ञानिकों की मानें तो तापमान बढ़ने से भारत में गर्म हवाएं चलने, चक्रवात आने और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होगी। 100 साल में एक बार होने वाली मौसमी घटनाएं लगभग हर वर्ष होने लगेगी। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक हिंद महासागर का जलस्तर 1874 से 2004 के बीच प्रतिवर्ष 1.06 से लेकर 1.75 मिलीमीटर की दर से बढ़ा है। जबकि बीते ढ़ाई दशक में यानी 1993 से 2017 में इसके बढ़ने की दर 3.3 मिलीमीटर प्रतिवर्ष रही। रिपोर्ट के मुताबिक अगर तापमान में वृद्धि जारी रही तो इस सदी के अंत तक उत्तरी हिंद महासागर में समुद्र तल का स्तर करीब 300 मिलीमीटर बढ़ जाएगा। चिंता की बात यह है कि भारत पर जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। अभी गत वर्ष ही पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ कि इस सदी के अंत तक भारत के औसत तापमान में 4.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी। रिपोर्ट में कहा गया वर्ष 1901 से लेकर 2010 के दौरान भारत के औसत तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में 1986 से 2015 की 30 साल की अवधि के दौरान वर्ष के सबसे गर्म दिन और ठंडी रात के तापमान में क्रमशः 0.63 डिग्री सेल्सियस और 0.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। अगर तापमान पर नियंत्रण नहीं लगा तो इस सदी के अंत तक गर्म दिन व ठंडी रात का तापमान का अंतर बढ़कर 4.7 डिग्री सेल्सियस और 5.5 डिग्री सेल्सियस हो जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक तापमान बढ़ने से गर्मी में भारत में चलने वाली लू की आवृत्ति 21 वीं सदी के अंत तक तीन से चार गुना ज्यादा हो जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के लिए मुख्यतः ग्लोबल वार्मिंग ही जिम्मेदार है और इससे निपटने की त्वरित कोशिश नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में धरती का खौलते कुंड में परिवर्तित होना तय है। अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक औसत तापमान पिछले सवा सौ सालों में अपने उच्चतम स्तर पर है। औद्योगिकरण की शुरुआत से लेकर अब तक तापमान में 1.25 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक 45 वर्षों से हर दशक में तापमान में 0.18 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है। आईपीसीसी के आंकलन के मुताबिक 21 सवीं सदी में पृथ्वी के सतह के औसत तापमान में 1.1 से 2.9 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होने की आशंका है। वायु में मौजूद आॅक्सीजन और कार्बन डाईआॅक्साइड के अनुपात पर एक शोध में पाया गया है कि बढ़ते तापमान के कारण वातावरण से आॅक्सीजन की मात्रा तेजी से घट रही है। एक आंकडें के मुताबिक अब तक वायुमण्डल में 36 लाख टन कार्बन डाइआॅक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और वायुमण्डल से 24 लाख टन आॅक्सीजन समाप्त हो चुका है। अगर यही स्थिति बनी रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होना तय है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उस पर काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। अगर पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो आर्कटिक के साथ-साथ अण्टाकर्टिका के विशाल हिमखण्ड पिघल जाएंगे। बढ़ते तापमान के कारण उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव की बर्फ चिंताजनक रुप से पिघल रही है। दुनिया भर के करीब 30 पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई अब आधे मीटर से कम रह गयी है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर 2 से 5 किलोमीटर सिकुड़ गए हैं। 76 फीसद ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं। कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने आशंका जतायी है कि भूमंडलीय तापन से जीवों का भौगोलिक वितरण भी प्रभावित हो सकता है। कई जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो जाएंगी। जातियों के वितरण में इन परिवर्तनों का जाति विविधता तथा पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं इत्यादि पर गहरा असर पड़ेगा। ध्यान रखना होगा कि पृथ्वी पर करीब 12 करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीवों के समाप्त होने का कारण भूमंडलीय तापन ही था। आंकड़ें बताते हैं कि वर्ष 2000 से 2018 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन की दर प्रतिवर्ष 3 फीसद रही जबकि भारत के कार्बन उत्सर्जन में यह वृद्धि 5 फीसद रही। गौर करें तो कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक रुप से कोयला जिम्मेदार है। हालांकि ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट पर गौर करें तो अमेरिका और चीन ने कोयले पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। इसके स्थान पर वह तेल और गैस का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन भारत की बात करें तो उसकी कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोयले पर निर्भर है। अच्छी बात यह है कि भारत ने गत वर्ष पहले पेरिस जलवायु समझौते को अंगीकार करने के बाद क्योटो प्रोटाकाल के दूसरे लक्ष्य को अंगीकार करने की मंजूरी दे दी है। इसके तहत देशों को 1990 की तुलना में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 18 फीसद तक घटाना होगा। यहां जानना आवश्यक है कि उद्योगों से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए 11 दिसंबर, 1997 को जापान के क्योटो शहर में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 192 देशों के बीच यह संधि हुई। यह संधि 16 फरवरी, 2005 को प्रभावी हुई। गौरतलब है कि विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को लक्ष्य पूरा करने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद उपलब्ध कराना भी इसका हिस्सा है। संधि का पहला लक्ष्य 2008-12 के लिए तय हुआ जिसके तहत औद्योगिक अर्थव्यवस्था वाले 52 देशों ने चार ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाई आॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड और सल्फर हेक्साफ्लोराइड) का उत्सर्जन 1990 की तुलना में 5 फीसद तक घटाने का लक्ष्य रखा। वर्ष 2020 से कार्बन उत्सर्जन को घटाने संबंधित प्रयास शुरु करने के लिए दिसंबर, 2015 को यह संधि हुई। इस संधि पर 192 देशों ने हस्ताक्षर किए। भारत ने 2 अक्टुबर, 2016 को इसे अंगीकार करके अन्य देशों को भी अंगीकार करने की राह दिखायी और आज भी वह अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। अभी गत वर्ष ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत द्वारा कार्बन उत्सर्जन में 35 प्रतिशत कमी लाने का लक्ष्य हासिल करने का संकल्प जताया। उन्होंने इस प्रतिबद्धता के साथ दुनिया का आह्नान किया कि वे भी इस दिशा में आगे बढें। उल्लेखनीय है कि भारत प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल को चार गुना बढ़ाकर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अगर सभी देश इस दिशा में एक मंच पर आएं तो पृथ्वी के खतनाक होते तापमान पर नियंत्रण लगाना आसान होगा।

+लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं+






















