लेखक: डॉ राजाराम यादव

पहली बार बंगाल में एवं असम में पुनः राष्ट्रवादी सशक्त सरकार बनने के नैपथ्य में लगभग 70–80 वर्षों की RSS कार्यकर्ताओं की संघर्षभरी यात्रा की अशेष कहानियां है।

आज अचानक ये तस्वीरें हाथ लगीं तो लगा मानो समय कई दशक पीछे लौट गया हो।
चेहरे वही हैं, पर उनके पीछे छिपी तपस्या, संघर्ष और समर्पण की कहानियाँ आज भी मन को आंदोलित कर देती हैं।

ऊपर की तस्वीर (1983–1990 का समय):
बाएँ से — प्रो. डॉ. राजाराम यादव, तत्कालीन RSS जिला बौद्धिक प्रमुख, शिवसागर (असम) एवं ONGC में भू-वैज्ञानिक (GeoScientist)।
मध्य में — श्रद्धेय श्यामल दा, तत्कालीन डिब्रूगढ़ RSS विभाग कार्यवाह तथा बाद में असम एवं बंगाल क्षेत्र के क्षेत्र कार्यवाह। उनका अपहरण आतंकियों द्वारा पश्चिम बंगाल–त्रिपुरा सीमा क्षेत्र से किया गया था तथा बाद में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई। उनका पूरा परिवार राष्ट्र एवं संघ कार्य के प्रति पूर्णतः समर्पित था।
साथ में अन्य समर्पित कार्यकर्ता।

नीचे की तस्वीर (अगस्त 1983, शिवसागर, असम):
RSS के सरकार्यवाह पूज्य रज्जू भैया (प्रो. राजेंद्र सिंह जी) के प्रवास के दौरान की अविस्मरणीय स्मृति।
बाएँ — जिला कार्यवाह श्री पृथ्वीराज लाहोरी जी (स्वर्गीय)।
बीच में — श्रद्धेय जुगुल किशोर वाहिटी जी (व्यवस्था प्रमुख, स्वर्गीय) एवं श्रद्धेय श्यामल कांति सेनगुप्ता जी (विभाग कार्यवाह, बाद में असम-बंगाल क्षेत्र के क्षेत्र कार्यवाह)।
दाएँ — योगेश गुप्ता जी (शिवसागर जिला बौद्धिक प्रमुख)।

उस समय ONGC शिवसागर में नौकरी करते हुए संघ कार्य करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। ULFA का आतंक चरम पर था। हमारे समर्पित कार्यकर्ता ललित गोगोई जी की नाज़ीरा में निर्मम हत्या कर दी गई।
इसके बावजूद हम स्कूटर से गाँव-गाँव घूमते रहे, शाखाएँ लगाते रहे और समाज को जोड़ने का कार्य निरंतर चलता रहा।

सन 1985 में नागालैंड में नई शाखा प्रारम्भ करने का सौभाग्य मिला।
इसी दौरान पूज्य के. एस. सुदर्शन जी के मार्गदर्शन में डॉ. हेडगेवार जी की लघु जीवनी का हिंदी प्रारूप तैयार किया गया, जिसका बाद में 32 जनजातीय भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन हुआ।

चार–पाँच दशकों तक विपरीत परिस्थितियों में, बिना रुके और बिना थके, जन-जन को जोड़ने का यह कार्य निरंतर चलता रहा।
मेरे अनेक छात्र, जो कभी स्वयंसेवक रहे और आज IPS अधिकारी हैं, वे भी अपने-अपने स्तर पर राष्ट्रनिर्माण में योगदान दे रहे हैं।

आज जब असम में पुनः और पश्चिम बंगाल में पहली बार राष्ट्रवादी सशक्त सरकार बनी हैं, तब वे संघर्ष, वे तपस्याएँ और वे बलिदान स्मृतियों में पुनः जीवित हो उठते हैं।
वर्तमान का यह परिवर्तन पूर्व के संघर्ष, समर्पण और असंख्य कार्यकर्ताओं के त्याग का ही परिणाम है।
माननीय गृह मंत्री अमित शाह जी की साहसिक चुनावी रणनीति ने वर्षों के संघर्ष और तपस्या से उपजे जनविश्वास को राजनीतिक परिणामों में परिवर्तित करने का अद्वितीय ऐतिहासिक महान कार्य किया है।

(लेखक वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं)

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