लेखक~ओमप्रकाश तिवारी

♂÷राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार के अडाणी संबंधी बयान के बाद महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी (मविआ) में जो हलचल शुरू हुई है, उसमें सबसे ज्यादा फिक्रमंद शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट नजर आ रहा है। या यूं कहिए कि स्वयं उद्धव ठाकरे और उनके सबसे प्रमुख सिपहसालार संजय राउत के माथे पर सबसे ज्यादा बल दिखाई देने लगे हैं। उन्हें फिक्र है कि जो कुनबा उन्होंने 2019 के आखिरी महीनों में जोड़कर मविआ का गठन किया, और ढाई साल मुख्यमंत्री बने रहे, कहीं वह बिखर न जाए। यही कारण है कि संजय राउत और उद्धव ठाकरे बार-बार यह बयान दे रहे हैं कि अडाणी पर शरद पवार की राय का असर राष्ट्र या महाराष्ट्र की विपक्षी एकता पर नहीं पड़ेगा।

पिछले साल जून में मविआ सरकार गिरने के बाद से ही इसमें शामिल तीनों दल, यानी शिवसेना (उद्धव गुट), कांग्रेस और राकांपा महाराष्ट्र की आम जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये गठबंधन अब कभी टूटेगा नहीं। ये गठबंधन ही अगले विधानसभा चुनाव में पुनः सरकार बनाएगा। ये गठबंधन ही लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक सीटें जीतेगा। हाल ही में पुणे की कसबा पेठ विधानसभा सीट के उपचुनाव में हुई कांग्रेस की जीत के बाद तो यह बात और जोर-शोर से कही जाने लगी है कि यदि तीनों दल मिलकर चुनाव लड़ें, तो महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस एवं एकनाथ शिंदे गठजोड़ को हराना कतई मुश्किल नहीं होगा। उनका ये भरोसा दिलाना उन अस्थिर मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है, जो किसी विचारधारा से जुड़े नहीं हैं और जिसकी सरकार आती देखते हैं, उसके साथ हो जाते हैं।

शरद पवार का बयान शिवसेना (उद्धव गुट) के लिए सबसे ज्यादा चिंता का कारण इसलिए है, क्योंकि नवंबर 2019 में शरद पवार के दम पर ही उसने भाजपा से अलग होकर महाविकास आघाड़ी के गठन का निर्णय किया था। शरद पवार को ही मविआ का शिल्पकार माना जाता है। उन्होंने ही तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बात करके उन्हें भी शिवसेना के साथ गठबंधन करने को राजी किया था। पवार का ही विचार था कि मविआ सरकार में पूरे पांच वर्ष उद्धव ठाकरे ही मुख्यमंत्री रहें, तो ही सरकार स्थिर रह पाएगी। यहां तक कि शिवसेना के अंदर भी मुख्यमंत्री पद के लिए उद्धव ठाकरे ही आगे आएं, तो ही यह सरकार चल पाएगी, यह विचार भी पवार का ही था। मविआ सरकार बनने के बाद भी शरद पवार समय-समय पर उद्धव ठाकरे को सरकार चलाने के लिए मार्गदर्शन और जरूरी सलाह देते रहे थे। सरकार पर संकट आने के बाद भी उन्होंने उद्धव को पद से त्यागपत्र न देने की सलाह दी थी। लेकिन उद्धव ने उनकी यह सलाह नहीं मानी। आज सर्वोच्च न्यायालय में उनका यही निर्णय उनके गले की हड्डी बन गया है। यानी मविआ के गठन के बाद एक तरह से शरद पवार ही उद्धव ठाकरे राजनीतिक अभिभावक की भूमिका में आ गए हैं। उद्धव परिवार को उनमें अपना तारणहार दिखने लगा है। आज वही शरद पवार जब एक ऐसे मुद्दे पर मविआ के अन्य दो दलों शिवसेना (उद्धव गुट) एवं कांग्रेस से अलग राय रखते हैं, तो उद्धव ठाकरे का चिंतित होना स्वाभाविक है।
क्योंकि मविआ में साथ रहते हुए भी कांग्रेस से उनके वैचारिक मतभेद तो शुरू से कायम रहे हैं। बात हिंदुत्व की हो, या विनायक दामोदर सावरकर की, अथवा कश्मीर में अनुच्छेद 370 की ; कांग्रेस हमेशा ऐसे ही बयान देती रही है, जिनपर उद्धव ठाकरे एवं उनके सहयोगियों को सफाई देनी पड़ी है। कुछ ही दिनों पहले राहुल गांधी ने यह कहकर एक बार फिर सावरकर के अपमान की कोशिश की कि “मैं सावरकर नहीं हूं। मैं गांधी हूं। गांधी माफी नहीं मांगा करते”। कांग्रेस की ओर से आनेवाले ऐसे बयान सीधे शिवसेना की उस विचारधारा पर चोट करते हैं, जिसके पोषक शिवसेना संस्थापक बालासाहब ठाकरे रहे हैं। इससे भाजपा और एकनाथ शिंदे गुट को उद्धव ठाकरे पर आक्रामक होने का मौका मिल जाता है, और ठाकरे समर्थक असहज महसूस करते हैं। मविआ सरकार के दौरान उद्धव ठाकरे के सिपहसालार संजय राउत भी कांग्रेस का अपमान करने में कभी पीछे नहीं रहे। कभी उसे चरमराती खटिया बताकर, तो कभी बूढ़ी जर्जर पार्टी बताकर। आज तो शिवसेना (उद्धव गुट) इसी बूढ़ी जर्जर पार्टी के प्रतिबद्ध वोट बैंक मुस्लिमों पर भी निगाह लगाए बैठी है। मालेगांव हो या नवनामांतरित छत्रपति संभाजी महाराज नगर (पूर्व का औरंगाबाद), उद्धव ज्यादातर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही अपनी रैलियां कर रहे हैं। मुस्लिम वर्ग भी उसे ही वोट देना चाहता है, जो भाजपा और शिवसेना (शिंदे) गठबंधन को हराने में सक्षम हो। कांग्रेस उसे इस लायक दिखती नहीं। इसलिए उद्धव ठाकरे के प्रति उसका आकर्षण बढ़ रहा है। कांग्रेस इस नुकसान का आकलन कर रही है। वह कब अपने केंद्रीय नेतृत्व का बहाना लेकर मविआ से छिटक जाए, कहा नहीं जा सकता।
अब बचे नए-नए बने अभिभावक शरद पवार। ये वही शरद पवार हैं, जिन्होंने 2014 में शिवसेना के भाजपा से अलग होने के बाद अचानक अपनी ओर से प्रेस कांफ्रेंस करके भाजपा सरकार को बाहर से एकतरफा समर्थन देने की घोषणा कर दी थी। जिसके कारण शिवसेना के तेवर ढीले पड़ गए थे, और ये तेवर उसे पूरे पांच साल ढीले ही रखने पड़े थे। उन दिनों राजनीतिक हलकों में चर्चा थी कि पवार से यह निर्णय कराने में उन्हीं गौतम अडाणी की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जिनपर समूचे विपक्ष से अलग राय रखकर आज भी शरद पवार सुर्खियां बटोर रहे हैं। ये वही शरद पवार हैं, जिनके भतीजे अजीत पवार कभी प्रधानमंत्री मोदी के करिश्माई नेतृत्व की तारीफ करते दिखाई देते हैं, तो कभी कांग्रेस और उद्धव गुट से अलग ईवीएम की तारीफ करते। वह तो भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस के साथ उपमुख्यमंत्री की शपथ भी ले चुके हैं। ऐसी हालत में उद्धव ठाकरे का यह सोचना स्वाभाविक है कि कहीं राजनीति के मेले में उनके अभिभावक शरद पवार उनका हाथ झटककर आगे बढ़ गए, तो उनका क्या होगा ?

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÷लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र के राज्यप्रमुख सम्वाददाता हैं÷
(लेख साभार दैनिक जागरण)

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