★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
[काँग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया,राहुल व प्रियंका वाड्रा गाँधी की केंद्र सरकार द्वारा एसपीजी सुरक्षा हटाने के मुद्दे पर काँग्रेस है हमलावर]
{इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद बीरबल नाथ कमेटी की सिफ़ारिश पर पीएम राजीव ने 30 मार्च 1985 को अधिसूचना जारी कर बनाई थी स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप फ़ोर्स}

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[राजीव बार-बार तोड़ते रहे सुरक्षा घेरा,जिसके चलते श्रीपेरंबदूर में लिट्टे की आत्मघाती हमलावर धनु ने 21 मई 1991 को बमविस्फोट कर कर दी थी हत्या]
(वीपी सिंह व चंद्रशेखर ने पीएम रहते कड़ी रखी थी राजीव गाँधी की सुरक्षा किन्तु कांग्रेसियों के कहने पर घुस जाते थे भीड़ में)
{1994 में एसपीजी क़ानून में दूसरा संसोधन हुआ जिसमें 5 साल की जगह 10 साल तक एक्स पीएम के परिजनों को दी जाएंगी एसपीजी कवर}
[बाजपेयी सरकार ने 2003 में चौथा संशोधन किया कि पीएम पद से हटने के बाद प्रतिवर्ष समीक्षा के आधार पर तय होगा SPG सुरक्षा]
♂÷कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गांधी और उनके बच्चों राहुल और प्रियंका वाड्रा गाँधी के पास से एसपीजी कवर हट जाने के बाद कांग्रेस लगातार हंगामा कर रही है और कह रही है कि जानबूझकर मोदी सरकार ने राजनीतिक कारणों से एसपीजी सुरक्षा कवच हटाया है और इस तरह गांधी परिवार की सुरक्षा से खिलवाड़ किया जा रहा है।संसद के अंदर और संसद के बाहर, हर जगह इस पर हंगामा किया जा रहा है।
उधर एक अधिवक्ता ने पुनः एसपीजी सुरक्षा बहाल करने की मांग को लेकर कोर्ट में याचिका दायर कर कोर्ट से केंद्र सरकार को निर्देश देने का निवेदन किया था जिस पर गुरुवार को कोर्ट उक्त याचिका ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता वक़ील के ऊपर 25 हज़ार रुपये का अर्थदण्ड लगा दिया है।
सुरक्षा से खिलवाड़ संबंधी आरोप कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के समय खुद राजीव गांधी की हत्या के मामले में लगाया था और ये कहा था कि उस वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी ही बाहर से समर्थन दे रही थी, जिसने राजीव गांधी से एसपीजी का सुरक्षा घेरा वापस लिया था और जिसकी वजह से उनकी सुरक्षा कमजोर हुई और लिट्टे आतंकी अपने नापाक मंसूबे में कामयाब हो सके।
इसके बाद भी सोनिया, राहुल व प्रियंका गाँधी ने सैकड़ो बार एसपीजी की सुरक्षा घेरा को तोड़ा भी व विदेश में अपने साथ इन सिक्युरिटी एजेंसी के बिना दौरा करते आये हैं।
खास बात ये है कि एसपीजी का सुरक्षा घेरा खुद प्रधानमंत्री और उसके परिवार तक सीमित रहे, इससे जुड़ा हुआ कानून खुद राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए बनाया था।ये जानना रोचक होगा कि वीपी सिंह की सरकार ने ऐसे कानून के बावजूद पीएम पद से हटने के अगले तीन महीने तक राजीव गांधी की एसपीजी सुरक्षा बहाल रखी थी, नियमों को ताक पर रखकर। नियमों को ताक पर रखकर इसलिए क्योंकि स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी का कानून इसके खिलाफ था।इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर बीरबल नाथ कमिटी बनाई गई थी।इसकी रिपोर्ट के आधार पर 30 मार्च 1985 को कैबिनेट सचिवालय की एक अधिसूचना के तहत एसपीजी का गठन हुआ था। एसपीजी को राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए ही संवैधानिक जामा पहनाया गया और संसद में बिल पास होने के बाद 1988 में एसपीजी कानून लागू किया गया।उस वक्त ये व्यवस्था की गई कि सिर्फ प्रधानमंत्री और उनके परिवार को ही एसपीजी की सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी, न कि किसी और को,उस वक्त भी ये बहस चली थी कि एसपीजी के दायरे में पूर्व प्रधानमंत्रियों को ला दिया जाए, क्योंकि उस वक्त मोरारजी देसाई और गुलजारीलाल नंदा भी जिंदा थे लेकिन इन आपत्तियों को खारिज कर एसपीजी को प्रधानमंत्री और उनके परिवार की सुरक्षा के लिए एक्सक्लूसिव फोर्स बनाने का फैसला खुद राजीव गांधी ने लिया।उस वक्त शायद ही उन्हें या उनके समर्थकों को अंदाजा रहा होगा कि किस तरह एसपीजी सुरक्षा पूर्व प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें मिले, इसके लिए उनके समर्थकों को हंगामा करना पड़ेगा।
SPG सुरक्षा हटाए जाने को लेकर कांग्रेस लगातार विरोध कर रही है जबकि सरकार अपने फैसले पर अडिग है।
वीपी सिंह नियमों के पाबंद आदमी थे, लेकिन राजीव गांधी से ऐसी खुन्नस नहीं थी कि उनकी सुरक्षा कमजोर कर दी जाए। फरवरी 1990 में आईबी, रॉ और गृह मंत्रालय के उच्च अधिकारियों की बैठक के बाद ये फैसला किया गया कि प्रधानमंत्री के पद से हटने के बावजूद राजीव गांधी के लिए एक बड़ा सुरक्षा घेरा मुहैया कराए जाए, यहां तक कि वीपी सिंह ने ये सुविधा भी दी कि एसपीजी में जो अधिकारी लंबे समय से काम कर चुके हैं, उन्हें एसपीजी से मुक्त करके राजीव गांधी की सुरक्षा में डाल दिया जाए,ऐसा हुआ भी और राजीव गांधी के छह पसंदीदा अधिकारियों को एसपीजी से मुक्त करके राजीव गांधी की सुरक्षा में लगा दिया गया, जो उस वक्त लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। यही नहीं, उनके इस्तेमाल के लिए खास तौर पर चार बुलेटप्रूफ कारें भी मुहैया कराई गईं और साथ में करीब ढाई सौ पुलिस जवान रखे गए।
राजीव गांधी ने इन सुरक्षा इंतजामों से कभी नाखुशी नहीं बरती, बल्कि अक्सर वो इन सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी करते दिखे।जस्टिस जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट आने के बाद वीपी सिंह ने जो जवाब दिया था, उसमें साफ तौर पर लिखा गया था कि ऐसा दर्जनों बार हुआ, जब उनकी सरकार में गृह मंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद को राजीव गांधी से ये कहना पड़ा कि वो निजी कारों में बैठकर अचानक गायब न हो जाएं और सुरक्षा नियमों की अनदेखी न करें।
वीपी सिंह के बचाव में बीजी देशमुख भी आए, जो खुद राजीव गांधी की सरकार में कैबिनेट सचिव रह चुके थे और फिर प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव के तौर पर राजीव गांधी से लेकर वीपी सिंह और चंद्रशेखर के कार्यकाल में भी काम करते रहे। देशमुख ने अपनी किताब ‘ए कैबिनेट सेक्रेटरी लुक्स बैक’ में इस बात का जिक्र किया है कि गांधी परिवार के एक दरबारी की तरफ से लगाया गया ये आरोप कि राजीव गांधी को खत्म कर देने के लिए ही उनका एसपीजी सुरक्षा घेरा हटाया गया था, ये सत्य से पूरी तरह परे है। देशमुख ने ये सवाल भी खड़ा किया कि अगर एसपीजी सुरक्षा घेरा को लेकर इतनी ही बेचैनी थी तो राजीव के दरबारियों ने चंद्रशेखर की सरकार के रहते वक्त ये मांग क्यों नहीं की, जबकि चंद्रशेखर राजीव गांधी की कांग्रेस के सहारे ही अपनी अल्पमत वाली सरकार चला रहे थे।दरअसल, देशमुख का इशारा पी चिदंबरम और मणिशंकर अय्यर की तरफ है, जो वीपी सिंह पर सनसनीखेज आरोप लगाते आ रहे थे।खुद वीपी सिंह का कहना था कि एक वक्त उन्होंने राजीव गांधी का एसपीजी सुरक्षा घेरा बरकरार रखने का भी सोच लिया था, लेकिन खुद देशमुख के सुझाव पर उन्होंने इस विचार को त्याग दिया, क्योंकि ये मौजूदा कानून के खिलाफ होता।
जहां तक चंद्रशेखर का सवाल है, उनके प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद ही राजीव गांधी ने उनकी सरकार गिराने की योजना भी बनानी शुरू कर दी, खासतौर पर जब उन्हें इस बात के संकेत मिलने लगे कि अल्पमत वाली सरकार के बावजूद चंद्रशेखर की लोकप्रियता लोगों के बीच बढ़ती जा रही है। हरियाणा पुलिस के दो कांस्टेबलों के 10 जनपथ के बाहर रहकर जासूसी करने का आरोप जब राजीव गांधी ने लगाया, चंद्रशेखर ने तत्काल अपना इस्तीफा देने का फैसला कर लिया, जिसका अंदाजा खुद राजीव को भी नहीं था।
यहां तक कि चंद्रशेखर की अल्पावधि सरकार के दौरान भी राजीव गांधी को उनकी सुरक्षा को लेकर कई बार चेतावनी दी गई थी कि वो नियमों को ताक पर न रखें। देशमुख के बाद चंद्रशेखर के प्रधान सचिव बने एसके मिश्रा ने अपनी आत्मकथा ‘फ्लाइंग इन हाई विंड्स’ में इस बात का जिक्र किया है कि कई दफा खुद उन्होंने राजीव गांधी को सतर्क रहने की सलाह दी थी और अपनी रैलियों और सभाओं के दौरान सुरक्षा घेरा न तोड़ने की सलाह दी थी।मिश्रा ने तो यहां तक लिखा है कि खुद प्रधानमंत्री चंद्रशेखर इस बारे में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को निजी तौर पर बताना चाह रहे थे, लेकिन राजीव गांधी जब उनसे मिलने या फोन पर बात करने को तैयार नहीं हुए, तो खुद गांधी परिवार के करीब रहे अधिकारियों को बार-बार उनके पास भेजा। खुद मिश्रा की गिनती गांधी परिवार के करीबी लोगों में होती थी।
सवाल उठता है कि आखिर राजीव गांधी सुरक्षा घेरा बार-बार क्यों तोड़ रहे थे, जिसे लेकर वीपी सिंह की सरकार के बाद चंद्रशेखर की सरकार ने भी बार-बार चेताया था इसका संकेत भी मिश्रा की किताब में ही मिलता है।मिश्रा ने लिखा है कि दरअसल राजीव गांधी को उनके दरबारियों ने चढ़ा रखा था कि 1989 के चुनावों में जनता के बीच जाने से परहेज करने के कारण जो नुकसान हुआ, वैसा 1991 में नहीं करना है और लोगों के बीच जाने से उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता दोनों बढ़ती चली जाएगी, यही वजह थी कि राजीव गांधी जानबूझकर सुरक्षा घेरा तोड़कर लोगों के बीच घुस जाते थे।
इस बात का जिक्र खुद निकोलस न्यूजेंट ने भी किया है, जिन्होंने राजीव गांधी की पहली जीवनी लिखी थी ‘राजीव गांधी सन ऑफ ए डायनेस्टी’ के तौर पर।
न्यूजेंट बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग करने के साथ ही उस दून स्कूल में भी शिक्षक रह चुके थे, जहां खुद राजीव गांधी ने पढ़ाई की थी। न्यूजेंट ने लिखा है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं की शिकायत के आधार पर राजीव गांधी की सुरक्षा में वीपी सिंह की सरकार ने बढ़ोतरी भी की थी।उस जमाने में विपक्ष के नेता के तौर पर राजीव गांधी की सुरक्षा पर सालाना एक करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे थे जो कि कहा जाता था कि उस दौर में अमेरिका के राष्ट्रपति के ऊपर भी इतना सुरक्षाखर्च नही होता था। न्यूजेंट के मुताबिक, खुद राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि एसपीजी के मुकाबले सुरक्षाकर्मियों की कम फौज उन्हें परेशान नहीं करती, बल्कि मर्सिडीज और रेंज रोवर कारों को सरकार को वापस लौटाना उन्हें जरूर अखरा है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी खुद कई बार सुरक्षा घेरा तोड़कर आम लोगों से मिलते थे।
न्यूजेंट का तो यहां तक कहना रहा कि सुरक्षा में कटौती किए जाने का कांग्रेसी आरोप तब सतह पर आया जब फरवरी 1990 में हुए विधानसभा चुनावों में राजीव गांधी के धुआंधार प्रचार के बावजूद पार्टी को आठ राज्यों में से सिर्फ महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश में ही सरकार बनाने में कामयाबी मिली, बाकी जगहों पर हार हुई.।इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को अक्टूबर 1990 में बिहार में रोके जाने के बाद जब बीजेपी ने वीपी सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, उसके बाद ही राजीव गांधी को लगने लगा था कि चुनाव जल्द होंगे और इसके लिए उन्होंने अपनी तैयारी शुरू कर दी।
तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमण के प्रस्ताव को भी उन्होंने इस लिए ठुकरा दिया कि 193 सांसद होने के बावजूद बहुमत के लिए जरूरी बाकी सांसद तोड़ना उनके लिए संभव नहीं था,ऐसे में मां इंदिरा गाँधी की तर्ज पर ही राजीव गांधी ने समाजवादी जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर की अल्पमत वाली सरकार बनवा दी, ताकि तब तक खुद को चुनावों के लिए तैयार कर लिया जाए।इसी सिलसिले में उन्होंने देशव्यापी यात्राओं का सिलसिला शुरू किया।खुद 54 सांसदों वाली अल्पमत सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को भी पता था कि राजीव गांधी के मन में क्या था, ऐसे में जैसे ही हरियाणा पुलिस के कांस्टेबलों का मुद्दा गरमाया, उन्होंने अपनी सरकार का इस्तीफा दे दिया और चुनावों की ओर बढ़ गए।
चुनावों के इस दौर में ही राजीव गांधी लगातार सुरक्षा घेरा तोड़कर भीड़ के बीच जाते रहे।न्यूजेंट ने अपनी किताब में गुजरात की एक घटना का जिक्र किया है, जहां राजीव गांधी ने सुरक्षा व्यवस्था में लगे अधिकारियों को इस बात के लिए लताड़ लगाई कि आखिर वो लोगों को उनके पास क्यों नहीं आने दे रहे हैं और मना करने के बावजूद वो खुद लोगों की भीड़ में घुस गए।
21 मई 1991 की उस भयावह रात को भी यही हुआ था।राजीव गांधी हत्याकांड की जांच करने के लिए बनी एसआईटी के अध्यक्ष डीआर कार्तिकेयन ने अपनी किताब ‘द राजीव गांधी एसैसिनेशन’ में लिखा है कि श्रीपेरंबदूर की उस रैली को संबोधित करने के लिए 21 मई की शाम जब राजीव ने विशाखापत्तनम से उड़ान भरी, तो वो इतनी हड़बड़ी में थे कि अपने निजी सुरक्षा अधिकारी ओपी सागर के विमान में सवार होने की प्रतीक्षा भी नहीं की और सागर को वहीं रह जाना पड़ा,यहां तक कि रैली वाली जगह पर स्थानीय कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सुरक्षा घेरा बनाने में और इसके लिए जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने में भी तमिलनाडु पुलिस की कोई सहायता नहीं की।जिस धनु ने आत्मघाती हमलावर के तौर पर राजीव गांधी की हत्या की, उसे रोकने के लिए तमिलनाडु पुलिस की एक महिला कांस्टेबल अनसुइया ने जब हाथ आगे बढ़ाया, तो राजीव गांधी ने नाराज होते हुए उसे इशारे से ऐसा करने से मना कर दिया,धनु आगे बढ़कर माला पहनाने और पांव छूने के बहाने नीचे झुककर उस आरडीएक्स भरी बेल्टनुमा आईईडी का इस्तेमाल कर विस्फोट करने में कामयाब हो गई, जिसमें न सिर्फ राजीव गांधी और धनु के चिथड़े उड गए बल्कि तेरह और लोगों की तत्काल मौत हो गई, जिसमें जिसमें जिला पुलिस अधीक्षक मोहम्मद इकबाल सहित नौ पुलिसकर्मी थे।
राजीव गांधी की इस हत्या के बाद सुरक्षा के सारे समीकरण बदल गए. पीवी नरसिंह राव की अगुआई में केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई।राव सरकार में गृह मंत्री रहे एसबी चह्वाण ने संसद में एसपीजी कानून में संशोधन वाला बिल पेश कर उसे पास कराया। बिल में राजीव गांधी के परिवार के सदस्यों को ही सुरक्षा देने की बात थी, लेकिन 11 सितंबर 1991 को संसद में हुई बहस के बाद अन्य दलों के सुझाव पर सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार के सदस्यों को पद छोड़ने के पांच साल तक एसपीजी सुरक्षा मुहैया कराने की बात की गई।25 सितंबर 1991 से ये संशोधित कानून लागू हो गया।
1994 में एसपीजी कानून में दूसरा संशोधन किया गया. इसके तहत पांच साल की जगह दस साल तक एसपीजी कवर पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार वालों को देने का नियम बनाया गया, ये भी सोनिया गांधी और उनके बच्चों को ध्यान में रखकर ही किया गया अगर ये संशोधन नहीं किया जाता, तो उनकी एसपीजी सुरक्षा छिन जाती।
जिस बीजेपी पर आज कांग्रेस गांधी परिवार की सुरक्षा की उपेक्षा करने का आरोप लगा रही है, उसी बीजेपी की अगुआई वाली एनडीए की सरकार के वक्त 1999 में एसपीजी कानून में तीसरा संशोधन किया गया। इसकी भी जरूरत सोनिया, राहुल और प्रियंका की वजह से ही पड़ी। नियमों के हिसाब से 2 दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री का पद छोड़ने वाले राजीव गांधी के परिवार को दस साल पूरा होने पर एसपीजी की सुरक्षा नहीं मिल सकती थी और ये अवधि एक दिसंबर 1999 को पूरी हो रही थी। ऐसे में वाजपेयी सरकार ने पहले अध्यादेश का रास्ता अख्तियार किया और फिर 8 दिसंबर 1999 को संसद में बिल पास करवा लिया,तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने ये बिल पेश किया था, जिसके तहत ये व्यवस्था की गई कि दस वर्ष की अवधि पूरी होने के बावजूद अगर आतंकी खतरा हो, तो सालाना समीक्षा करके पूर्व प्रधानमंत्री या उनके परिवार को एसपीजी सुरक्षा मुहैया कराई जा सकती है।
एसपीजी कानून में चौथा संशोधन भी वाजपेयी की सरकार रहते हुए ही 2003 में किया गया इसमें सिर्फ बदलाव ये किया गया कि प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने के एक साल के बाद संबंधित व्यक्ति या उसके परिवार को सालाना समीक्षा के आधार पर एसपीजी सुरक्षा अनंत काल के लिए दी जा सकती है, न कि बिना किसी वजह के सीधे दस साल का कवर एक झटके में दिया जा सकता है, जैसा 1999 का कानून कह रहा था।इसी कानून के तहत सालाना समीक्षा के आधार पर एक-एक करके पिछले कुछ वर्षों में मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरुशरण कौर के बाद अब सोनिया, राहुल और प्रियंका की एसपीजी सुरक्षा हटाई गई है, लेकिन वैकल्पिक इंतजाम करने के बाद,ऐसे में एसपीजी का घेरा अब सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी तक सीमित रह गया है।वैसे भी एसपीजी की स्थापना करने वाले राजीव गांधी की सोच भी यही थी कि ये विशेष दस्ता सिर्फ पीएम और जरूरत पड़ने पर उनके परिवार के लोगों को सुरक्षा दे।

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