लेखक~डॉ.के. विक्रम राव
♂÷स्वाधीनता के अमृत महोत्सव की समाप्ति के केवल साठ दिन शेष हैं। किन्तु जंगे—आजादी की वाहिनी रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक की भूमिका का कहीं भी सम्यक उल्लेख नहीं हुआ। इस पार्टी की मौजूदा मुखिया 76—वर्षीया सोनिया—राजीव गांधी ने भी प्रसार भारती से इस संदर्भ में कोई आग्रह नहीं किया। भले ही, ठीक उन्हीं की भांति, श्वेत त्वचा वाले यूरोपियन भारतमित्र—प्रशासक एलन आक्टेवियन ह्यूम कांग्रेस के जनक थे, 137 वर्ष पूर्व। सोनिया का ऐसा नजरिया दुखद है, जबकि मोतीलाल नेहरु की पोती का पोता राहुल गांधी भी कांग्रेस का छठा परंपरागत अध्यक्ष रह चुका है। पांचों पीढ़ियां क्रमश: लाभार्थी रहीं हैं। यह कैसा सियासी उपहास है? विडंबना, विद्रूप भी। जबकि डा. भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 2022) को आकाशवाणी—दूरदर्शन ने स्वाधीनता सेनानी के रुप में पेश किया था। बापू ने ”अंग्रेजों, भारत छोड़ो” का जब बिगुल बजाया था तो लाखों सत्याग्रही जेल गये। तब (1942) डा. अंबेडकर ब्रिटिश वायसराय की काबीना में मंत्री थे। साम्राज्यवादी अंग्रेज तब भारतीय विद्रोहियों को गोली से भून रहे थे। तुलना में एओ ह्यूम तो भारतीय स्वतंत्रता के उत्कृष्ट कोटि के समर्थक थे। संघर्षशील भी। उनके बारे में पाठ्यपुस्तकों में विस्तृत लेख होने चाहिये थे। नयी शिक्षा नीति के तहत ऐसा हो। अपेक्षित है।
यूं भी लंदन के साम्राज्यवादी राज के विरुद्ध स्कॉटलैण्ड तीन सदियों से जंग छेड़े है। अभी दो वर्ष पूर्व ही यूरोपीय संघ का सदस्य बने रहने के जनमत संग्रह में स्कॉटलैण्ड मेम्बरी का पक्षधर था। मगर ब्रिटेन का बहुमत होने के कारण वह यूरोपीय संघ के बाहर हो गया। ह्यूम के ब्रिटेन—विरोधी अभियान को स्कॉटलैंड के परिवेश में देखें। ह्यूम स्कॉटिश है जो आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) में चयनित होकर भारत 1849 में आ गये थे। ईटावा के कलेक्टर नियुक्त हुये। ह्यूम ने इटावा के लोगों की जनस्वास्थ्य सुविधाओं के मद्देनजर मुख्यालय पर एक सरकारी अस्पताल का निर्माण कराया था तथा स्थानीय लोगों की मदद से उन्होंने ने खुद के अंश से 32 स्कूलों के निर्माण कराये, जिसमें 5683 बालक—बालिका अध्ययनरत रहे। खास बात यह है कि उस वक्त बालिका शिक्षा का जोर न के बराबर था। तभी तो सिर्फ दो ही बालिकायें अध्ययन के लिये सामने आईं। ह्यूम ने इटावा को एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र बनाने का निर्णय लेते हुये अपने ही उपनाम से ह्यूमगंज की स्थापना करके बाजार खुलवाया जो आज बदलते समय में ह्यूमगंज के रूप में बड़ा व्यापारिक केन्द्र बन गया है। ह्यूम को उस अंग्रेज अफसर के रूप में माना जाता है जिसने अपने समय से पहले बहुत आगे के बारे में न केवल सोचा, बल्कि उस पर काम भी किया।
यह गोरा भारतीय अधिकारी श्रीमद्भगवद्गीता का दैनिक पाठ करता था। उनकी दृष्टि में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक महान राष्ट्रभक्त थे। अंग्रेजी सरकार ने तिलक को विद्रोही रचनाओं के कारण सात वर्ष की सजा दी थी। इटावा के कलेक्टर के दौर में ह्यूम का किस्सा मशहूर था। तभी 1857 का स्वतंत्रता संघर्ष शुरु हुआ। इस भारतप्रिय गोरे अधिकारी की हत्या पर बागी सिपाही आमादा थे। इसकी भनक लगते ही 17 जून 1857 को ह्यूम महिला के वेश में गुप्त ढंग से इटावा से निकल कर बढ़पुरा पहुंच गए और सात दिनों तक छिपे रहे। अपनी जान बचाए जाने का पाठ ह्यूम कभी नहीं भूले। ह्यूम न बचते अगर उनके साथियों ने उनको चमरौधा जूता न पहनाया होता। सिर पर पगड़ी न बांधी होती और महिला का वेश धारण कर सुरक्षित स्थान पर न पहुंचाया होता। ह्यूम ने इटावा से भाग कर आगरा के लालकिले में शरण ली। उनके भारतीय वफादार सहयोगियों ने उनकी जान बचाई।
ह्यूम का भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के प्रति सहानुभूति तथा समर्थन का एक ऐतिहासिक कारण रहा। ब्रिटिश सेना ने 1 मई 1707 में स्कॉटलैण्ड को भारत की भांति इंग्लैण्ड का एक उपनिवेश बना दिया था। स्कूली बच्चों को याद होगा कि एक स्कॉट बादशाह था, राबर्ट ब्रूस। वह छह बार युद्ध में पराजित हो कर राजधानी एडिनबर्ग की निकट पहाड़ियों की गुफा में वह छिप गया था। वहां उसने देखा एक मकड़ी अपना जाल बनाती छह बार विफल हुयी। अंतत: सातवीं बार वह कामयाब हो गयी। यह बड़ा उत्साहवर्धक था, राजा ब्रूस के लिये। वह रणभूमि में फिर गया और विजयी हुआ। तभी से इंग्लैण्ड के पराधीनता के विरुद्ध सदियों तक का संघर्ष स्कॉटलैण्ड ने शुरु किया। ह्यूम की भांति स्कॉटलैण्ड से गुलाम भारत में आये सभी अफसर हिन्दुस्तान की जंगे आजादी के हिमायती रहे। सक्रिय रहे।
मसलन जो शासक स्कॉटलैण्ड प्रान्त से भारत आये उनका दिल इन शोषित और पीड़ित गुलामों के लिये धड़कता रहा। जैसे बम्बई और मद्रास प्रान्तों में शिक्षा की शुरूआत उन गवर्नरों से की जो स्कॉट थे। लेकिन मद्रास प्रान्त के गर्वनर टामस मनरो का उदाहरण तो आज भी दक्षिण भारत में सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कालेज की स्थापना कर स्नाकोत्तर शिक्षा की बुनियाद रखी। राजा टोडरमल ने जो काम मुगलराज में उत्तरी भू-भाग में किया टामस मनरो ने वैसी ही रैय्यतवारी प्रणाली दक्षिण में की जिससे काश्तकारों को शोषण से बचाया गया। एक बार वे बल्लारी जनपद (तब आंध्र, मगर आज कर्नाटक) में स्थित मंत्रालय के स्वामी राघवेंद्रस्वामी मठ में गये। वे मठ की सम्पत्ति को कब्जियाने के आदेश के पालन हेतु गये। मगर द्वैत मत के अध्ययन द्वारा अनुप्राणित होकर अपनी सारी सम्पत्ति मठ को दे दी। आज भी कड़पा (आंध्र प्रदेश) के मन्दिर में टामस मनरो की प्रतिमा की आराधना होती है। वे कड़पा के कलेक्टर थे। चैन्नई के मध्य-भाग में उनकी घुड़सवार मूर्ति लगी है। किसी ने तोड़ी भी नहीं क्योंकि स्कॉटलैण्ड का यह व्यक्ति भारतीयों का हितैषी रहा। तेलुगु और तमिलभाषी ढाई सदियों बाद भी मनरो को मनरालप्पा के नाम से याद करते हैं।
स्कॉटलैण्ड के भारत को योगदान के स्वरूप में तीन महापुरूष स्मरणीय रहे है। कालिन कैम्पबेल देहरादून आये थे और भारत का प्रथम भौगोलिक मानचित्र बनाया। उनके बाद सर्वेयर-जनरल कार्यालय बना। इसी भूगोल शास्त्री की भांति एक वनस्पतिशास्त्री भी स्कॉटलैण्ड से आये। नाम था एलेक्सैण्डर किड्ड, जिन्होंने कलकत्ता का विश्वविख्यात बोटेनिकल गार्डेन बनाया। यहां देश का प्राचीनतम वटवृक्ष हर दर्शक के आकर्षण के केन्द्र है। डेविड ह्यूम स्कॉटलैण्ड के दार्शनिक थे जिनकी साम्राज्यवाद-विरोधी रचनाओं से भारतीय राष्ट्रवादी को अपार प्रेरणा मिली थी। लेकिन सर्वाधिक भारतभक्त रहे राष्ट्रीय कांग्रेस के चौथे अध्यक्ष तथा प्रथम गैर-हिन्दुस्तानी अध्यक्ष जार्ज यूल (1888) थे, जिन्होंने इलाहाबाद सम्मेलन का सभापतित्व किया। वे कोलकता नगर के शेरिफ (महापौर) रहे।
यदि स्कॉटलैण्ड से भारत आये इन राजनयिकों की चलती तो भारत को स्वतंत्रता चवालीस वर्ष पूर्व (1924) में ही मिल जाती। स्कॉट सोशलिस्ट नेता और भारतमित्र रेम्से मैकडोनल्ड तब ब्रिटेन में साझा सरकार के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया था ताकि भारतीय उपनिवेश का मसला हल हो। पर मुस्लिम लीग के अड़ियलपन से यह संभव न हो पाया। संसद में कन्जेर्वेटिव पार्टी के दबाव से लेबर पार्टी असहाय थी। मैकडोनल्ड राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता करने हेतु भारत आनेवाले भी थे।
इन्हीं कारणों से भारतीय स्वाधीनता प्रेमी ह्यूम के आभारी रहेंगे। न केवल कांग्रेस की स्थापना हेतु, पर भारत—समर्थक होने के कारण। आजादी के इस अमृत महोत्सव पर ह्यूम को सलाम।

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷




