~-अरविंद जयतिलक
♂÷इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा गोहत्या के मामले में एक शख्स की जमानत याचिका को खारिज करते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने पर बल दिया जाना रेखांकित करता है कि गाय का संरक्षण और संवर्धन कितना जरुरी है। जस्टिस शेखर कुमार यादव ने दो टूक कहा कि जीवन का अधिकार मारने के अधिकार से उपर है। गोमांस खाने के अधिकार को कभी मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। जिसकी मां की तरह पूजा होती है उसे मारने का अधिकार किसी को भी नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि गोरक्षा को किसी धर्म से जोड़ने की जरुरत नहीं बल्कि गोरक्षा को मौलिक अधिकार बनाना चाहिए। ऐसा इसलिए कि जब संस्कृति और विश्वास को ठेस पहुंचती है तब देश कमजोर होता है। न्यायालय ने कहा कि हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जब हम अपनी संस्कृति को भूले हैं तो विदेशियों ने हम पर आक्रमण कर हमें गुलाम बनाया है। न्यायालय ने सुझाव-संदेश के जरिए ध्यान दिलाया कि हम नहीं चेते तो हमें अफगानिस्तान पर निरंकुश तालिबानियों के आक्रमण व कब्जे को नहीं भूलना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि गाय भारत की संस्कृति है और गोरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक धर्म की नहीं बल्कि सभी की है। न्यायालय ने कानूनी पहलू को उद्घाटित करते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में गाय की नस्ल को संरक्षित किए जाने और दुधारु और भूखे जानवरों सहित गोहत्या पर रोक लगाने की बात कही गयी है लिहाजा उसका पालन होना होना जरुरी है। न्यायालय ने गाय के आर्थिक महत्व का विश्लेषण करते हुए तर्क दिया कि एक गाय अपने जीवन में 410-440 लोगों का भोजन जुटाती है जबकि गोमांस से सिर्फ 80 लोगों का पेट भरता है। गाय तब भी उपयोगी होती है जब वह बुढ़ी और बीमार होती है। उसका गोबर व मूत्र कृषि व दवाओं के निर्माण में बहुत उपयोगी होता है। न्यायालय ने गाय के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं को उद्घाटित करते कहा कि गाय भारत की संस्कृति की एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। महाकवि रसखान ने कहा था कि जन्म मिले तो नंद के गायों के बीच मिले। पांच मुस्लिम शासकों ने गोहत्या प्रतिबंधित की थी। बाबार, हुमायूं अकबर ने अपने धार्मिक त्यौहारों पर गायों की बलि पर रोक लगायी थी। मैसूर के नवाब हैदर अली ने गोहत्या को दंडनीय अपराध बनाया था। न्यायालय की गंभीर टिप्पणी पर अब सरकार को चाहिए कि सदन में विधेयक लाए ताकि गाय को भी मूल अधिकार मिले। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब न्यायालय द्वारा गायों के संरक्षण और संवर्धन की ओर ध्यान दिलाया गया। याद होगा कुछ वर्ष पहले हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को ताकीद किया था कि वह तीन महीने में गोहत्या पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए। न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा था कि गाय, बैल, बछड़ों के मांस का आयात व निर्यात करने की कानून अनुमति नहीं दे सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि ‘भारतीय संविधान सभी धर्मों का एक समान आदर करने की गारंटी देता है। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का मूल आधार है। किसी भी व्यक्ति को संविधान इस बात की अनुमति नहीं देता कि किसी के धर्म से जुड़ी भावनाओं को आघात पहुंचाए। अगर केंद्र सरकार व राज्य सरकारें इलाहाबाद उच्च न्यायालय और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को अमलीजामा पहनाती है तो निःसंदेह गायों का संरक्षण और संवर्धन होगा। इससे गाय की हत्याएं रुकेगी और देश में सांप्रदायिक माहौल भी नहीं बिगड़ेगा। अच्छी बात यह है कि केंद्र का रुख सकारात्मक है और वह गौ संरक्षण हेतु किसानों को उत्साहित कर रही है। विचार करें तो गाय धार्मिक ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वत्वपूर्ण है। भारत में भूमिहीन, लघु व सीमांत किसान बड़े पैमाने पर गाय का पालन करते हैं जिससे उन्हें अच्छी आय होती है। भारतीय देशी गायों में अधिक तापमान बर्दाश्त करने की अद्भुत क्षमता है। अधिक प्रतिरोधक क्षमता एवं पौश्टिक तत्वों की कम जरुरत और रख-रखाव में आसान होने के कारण दुनिया के प्रमुख राष्ट्र इसका आयात कर रहे हैं। इन देशों में अमेरिका, आस्टेªलिया तथा बाजील शामिल हैं। ये देश इन गायों का उपयोग अनुसंधान तथा उन्नत नस्ल विकसित करने के लिए कर रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए भी आवश्यक है कि वह गायों का संवर्धन व संरक्षण करे। याद होगा गत वर्ष पहले जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान में गिर की गायों के यूरिन में सोना की उपलब्धता का दावा किया गया था। तब विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने कहा था कि 400 गिर गायों के यूरिन की जांच में प्रति लीटर यूरिन में 3 से 10 मिलीग्राम सोने की मात्रा पायी गयी है। गायों के यूरिन में यह कीमती धातु आयन यानी गोल्ड साॅल्ट के रुप में पायी गयी है जो घुलनशील होती है। दावा यह भी था कि सोना के अलावा इन गायों के यूरिन में पांच हजार से अधिक ऐसे कंपाउंड भी मिले हैं जिनमें से 388 में कई बीमारियां दूर करने के चिकित्सकीय गुण हैं। अनुसंधानकर्ताओं ने यह भी उद्घाटित किया था कि इसी क्रम में उन्होंने ऊंटों, भैसों, भेड़ों और बकरियों के यूरिन के सैंपलों की भी जांच की लेकिन उनमें ऐसा कोई तत्व नहीं पाया गया। यह रेखांकित करता है कि अन्य पशुओं की अपेक्षा गाय कहीं ज्यादा उपयोगी है। एक आंकड़े के मुताबिक अगर गौवंश हत्या पर रोक नहीं लगा तो जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्धि के कारण 2025 तक देश में 32 लाख टन दूध का उत्पादन कम हो जाएगा। यह दूध अभी के मूल्य से लगभग 5000 करोड़ रुपए से अधिक का होगा। गौरतलब है कि देश में कुल 20 करोड़ के आसपास गोपशु हैं जो विश्व के कुल गोपशु का 14 फीसदी हैं। आंकड़ों पर विश्वास करें तो वर्ष 2007 की गणना के अनुसार देश में लगभग 9 करोड़ देशी नस्ल की गायें थी। इससे पूर्व 1997 की तुलना में 2003 में देशी गायों की संख्या घट गयी। 19वीं पशुगणना के आंकड़ों पर ध्यान दें तो वर्ष 2012 में पशुओं की संख्या साल 2007 के मुकाबले 3.3 फीसदी घटी। अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार मवेशियों विशेषकर गायों की सुरक्षा व संरक्षण को लेकर संवेदनशील है। गत वर्ष पहले वह देशी गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन की शुरुआत की। इस योजना के तहत बड़े शहरों के आसपास लगभग एक हजार गायों को एक साथ रखे जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की गयी जिसमे 60 फीसद देशी दुधारु गायों और 40 फीसदी बिना दुध देने वाली गायें होंगी। इन गायों को पालन-पोषण वैज्ञानिक ढंग से किया जाएगा तथा समय-समय पर इनके स्वास्थ्य की जांच की जाएगी। गोकुल ग्राम प्रबंधन की गोपालन को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यहां जो दुध का उत्पादन होगा उसका सही तरीके से जांच की जाएगी और वैज्ञानिक तरीके से भंडारण किया जाएगा। साथ ही गाय के गोबर से जैविक उत्पाद तैयार किया जाएगा। गोकुल ग्रामों में बायो गैस स्थापित किए जाने की भी योजना है जिससे कि बिजली की सुविधा मिल सके। इसके अलावा केंद्र सरकार ने जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर समेकित रुप से देशी नस्ल के पशुओं के विकास के लिए कामधेनु प्रजनन केंद्र की स्थापना की योजना बनायी है जो सराहनीय कदम है। निश्चित रुप से इस योजना से गायों का संरक्षण होगा और उनकी तादाद बढ़ेगी। राज्य सरकारें भी इस दिशा में पर्याप्त कदम उठा रही हैं। देशी गायों को बढ़ावा देने के लिए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, गोवा और ओडिशा में पहले से ही गोकशी पर रोक है। दूसरी ओर तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम में गोकशी पर रोक नहीं है लेकिन इसके लिए राज्य सरकार से अनुमति जरुर लेनी होती है। उत्तर-पूर्व राज्यों में गोकशी पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है। लेकिन इन राज्यों में भी गोकशी पर प्रतिबंध लगना चाहिए। पर यह तभी संभव होगा जब केंद्र सरकार न्यायालय की भावना का सम्मान करते हुए सदन में विधेयक लाकर गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा प्रदान कर मूल अधिकार से लैस करेगी।
÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















