लेखक~अरविंद जयतिलक
♂÷कभी गोविंदवल्लभ पंत ने कहा था कि हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई रोक नहीं सकता। उनकी कही बातें आज अक्षरशः सच साबित हो रही है। भाषा के तौर पर हिंदी अपने सभी प्रतिद्वंदियों को पीछे छोड़ लोकप्रियता का आसमान छू रही है। उसकी वैश्विक स्वीकार्यता लगातार बढ़ती जा रही है। भारत के लिए यह गौरव का क्षण है कि राष्ट्रभाषा हिंदी चीन की मंदारिन भाषा को पछाड़कर अब विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा का दर्जा हासिल कर ली है। आंकड़ें बताते हैं कि दुनिया के सभी 206 देशों में हिंदी बोलने वालों की तादाद एक अरब तीस करोड़ के पार पहुंच चुकी है जो कि दुनिया में बोली जाने वाली किसी भी भाषा से अधिक है। आंकड़ों के मुताबिक हिंदी बोलने वालों की अनुमानित संख्या एक अरब दस करोड़ तीस लाख से अधिक हो चुकी है जो कि चीन की मंदारिन भाषा बोलने वालों की तादाद से कहीं अधिक है। विगत एक दशक के दरम्यान जिस तरह हिंदी का अंतर्राष्ट्रीय विकास हुआ है वह उसकी उपयोगिता और लोकप्रियता को ही रेखांकित करता है। हिंदी भाषा के उत्तरोत्तर विस्तार में जाएं तो यूजर्स की लिहाज से 1952 में हिंदी विश्व में पांचवे स्थान पर थी, जो 1980 के दशक में चीनी और अंग्रेजी भाषा के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच गयी। आज सर्वोच्चता पर है। गौर करें तो एक भाषा के तौर पर हिंदी का जितना अधिक अंतर्राष्ट्रीय विकास हुआ है, विश्व में शायद ही किसी अन्य भाषा का उतना हुआ हो। वे सभी संस्थाएं, सरकारी मशीनरी और छोटे-बड़े समूह बधाई के पात्र हैं जिन्होंने हिंदी को इस ऊंचाई पर पहुंचाया है। आज हिंदी भाषी दुनिया के हर कोने में फैले हुए हैं वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने व्यवसाय के विस्तार के लिए अपने कर्मचारियों को हिंदी सीखने का बढ़ावा दे रही हैं। सच तो यह है कि आज हिंदी विश्व संवाद का एक सशक्त भाषा के तौर पर उभर चुकी है जिसका विश्व समुदाय तहेदिल से स्वागत कर रहा है। गौर करें तो जिस तरह कभी भारतीय भाषा संस्कृत की गंभीरता और उपादेयता को लेकर विश्व समुदाय आत्ममुग्ध था, ठीक आज उसी प्रकार हिंदी को भी सम्मान मिलता दिख रहा है। जर्मनी के लोग हिंदी को एशियाई आबादी के एक बड़े तबके से संपर्क साधने का सबसे दमदार हथियार मानने लगे हैं। जर्मनी के हाईडेलबर्ग, लोअर सेक्सोनी के लाइपजिंग, बर्लिन के हम्बोलडिट और बाॅन विश्वविद्यालय के अलावा दुनिया के कई शिक्षण संस्थाओं में अब हिंदी भाषा पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं। आज दुनिया के 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में तो हिंदी की धूम मची है। यहां 30 से अधिक विश्वविद्यालयों में भाषायी पाठ्यक्रम में हिंदी को महत्वपूर्ण दर्जा हासिल है। यही नहीं पिछले दिनों ‘लैंग्वेज यूज इन यूनाइटेड स्टेट्स’ की हालिया रिपोर्ट से भी उद्घाटित हो चुका है कि अमेरिका में बोली जाने वाली टाॅप दस भाषाओं में हिंदी भी है और इसे बोलने वालों की संख्या 7 लाख से उपर है। अमेरिका के अलावा यूरोपिय देशों में भी हिंदी का तेजी से विकास हो रहा है। इंग्लैण्ड के लंदन, कैम्ब्रिज और यार्क विश्वविद्यालयों में हिंदी को चाहने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। पहले से कहीं ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। छात्र समुदाय इस भाषा में रोजगार की व्यापक संभावनाएं भी तलाशने लगा है। एक दशक से रुस के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य पर शोध हो रहे हैं। यहां हिंदी का बोलबाला बढ़ा है। अनेक रुसी विद्वानों ने हिंदी साहित्य का अनुवाद किया है। इनमें से एक तुलसीकृत रामचरित मानस भी है जिसका अनुवाद प्रसिद्ध विद्वान वारान्निकोव द्वारा किया गया है। यह तथ्य है कि रुस में हिंदी गं्रथों का जितना अनुवाद हुआ है उतना विश्व में किसी भी भाषा का नहीं हुआ है। एशियाई देश जापान में भी हिंदी भाषा का बहुत अधिक सम्मान है। मजेदार बात यह कि अब जापान की यात्रा पर जाने वाले भारतीय राजनेता जापान में हिंदी भाषा में अपने विचार व्यक्त करते हैं। गत वर्ष जापान यात्रा पर गए भारतीय प्रधानमंत्री ने भी अपने विचार हिंदी में व्यक्त किए और उससे न सिर्फ जापान बल्कि विश्व बिरादरी भी प्रभावित दिखी। जापान की दो नेशनल यूनिवर्सिटी ओसाका और टोकियो में स्नातक और परास्नातक स्तर पर हिंदी की पढ़ाई की व्यवस्था है। प्रोफेसर दोई ने टोकियो विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की स्थापना की है। रुस की तरह जापान में भी हिंदी साहित्य का अनुवाद हुआ है। प्रोफेसर तोबियोतनाका ने भीष्म साहनी के उपन्यास तमस का जापानी में अनुवाद किया है। प्रोफेसर कोगा ने ‘जापानी-हिंदी कोष’ की रचना की है। उन्होंने गांधी जी की आत्मकथा का भी जापानी में अनुवाद किया है। प्रोफेसर मोजोकामी हर वर्ष हिंदी का एक नाटक तैयार करते हैं और उसका मंचन भारत में करते हैं। महात्मा गांधी और टैगोर के अनन्य भक्तों में से एक साइजी माकिनो जब भारत आए तो हिंदी के रंग में रंग गए। उन्होंने गांधी जी के सेवाग्राम में रहकर हिंदी सीखी। गौर करने वाली बात यह कि जापान और भारत का लोक साहित्य समान है। मणिपुर और राजस्थान की लोककथाएं जापान की लोककथाओं जैसी है। गुयाना और माॅरिशस में भी भारतीय मूल के लोगों की संख्या सर्वाधिक है। यहां प्राथमिक स्तर से लेकर स्नातक स्तर पर हिंदी के पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था है। मारीशस में अंग्रेजी राजभाषा है। फ्रेंच बोलने वालों की तादात अच्छी है। लेकिन हिंदी की लोकप्रियता में कमी नहीं है। यहां बहुत पहले ही हिंदी सचिवालय की स्थापना हो चुकी है और ढेरों हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। इसी तरह फिजी, नेपाल, भूटान, मालदीव और श्रीलंका में भी हिंदी का जलवा कायम है। विगत वर्षों में खाड़ी देशों में हिंदी का तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ है। वहां के सोशल मीडिया में हिंदी का दखल बढ़ा है और कई पत्र-पत्रिकाओं को आॅनलाइन पढ़ा जा रहा है। संयुक्त अरब अमीरात में हिंदी एफएम चैनल लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। नए-पुराने हिंदी गीतों को चाव से सुना जा रहा है। जर्मन के लोग भी हिंदी को एशियाई आबादी के एक बड़े तबके से संपर्क साधने का सबसे बड़ा हथियार मानते हैं। एक आंकडें के मुताबिक दुनिया भर के 150 विश्वविद्यालयों और कई छोटे-बड़े शिक्षण संस्थाओं में रिसर्च स्तर तक अध्ययन-अध्यापन की पूरी व्यवस्था की गयी है। यूरोप से ही तकरीबन दो दर्जन पत्र-पत्रिकाएं हिंदी में प्रकाशित हो रही हैं। सुखद यह है कि पाठकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक आज विश्व में आधा अरब लोग हिंदी बोलते है और तकरीबन एक अरब लोग हिंदी बखूबी समझते हैं। वेब, विज्ञापन, संगीत, सिनेमा और बाजार ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जहां हिंदी अपना पांव पसारती न दिख रही हो। दुनिया के अधिकांश देशों में हिंदी फिल्मों ने धूम मचा रखी है। बाॅलीवुड स्टार अपनी फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए अकसर इन देशों में शो आयोजित करते रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों से दुबई में लगातार हिंदी कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है जो अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है। हिंदी भाषा की यह असाधारण उपलब्धि कही जाएगी कि जिन देशों में भाषा को विचारों की पोषाक और राष्ट्र का जीवन समझा जाता है वहां भी हिंदी तेजी से अपना पांव पसार रही है। गौरतलब है कि हंगरी, बुल्गारिया, रोमानिया स्विटजरलैंड, स्वीडन, फ्रांस, नार्वे, जापान, इटली, मिस्र, कजाकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, कतर और अफगानिस्तान, रुस और जर्मनी अपनी भाषा को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। वे इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। वैश्वीकरण के माहौल में अब हिंदी विदेशी कंपनियों के लिए भी लाभ का एक आकर्षक भाषा व जरिया बनने लगी है। वे अपने उत्पादों को बड़ी आबादी तक पहुंचाने के लिए हिंदी को माध्यम बना रहे हैं। कह सकते हैं कि आज पूरा काॅरपोरेट कल्चर ही हिंदीमय होता जा रहा है। हिंदी के बढ़ते दायरे से उत्साहित होकर सरकार की संस्थाएं भी जो कभी हिंदी के प्रचार-प्रसार में खानापूर्ति करती थी वह आज तल्लीनता से हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मना रही हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर अब शोक जताने, छाती पीटने और बेवजह आंसू टपकाने की जरुरत नहीं है। इसलिए कि वैश्विक फलक पर हिंदी का दबदबा लगातार बढ़ रहा है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















