लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की रामपुरहाट में भड़की हिंसा में दो बच्चों समेत दस लोगों की मौत राज्य की सड़-गल चुकी कानून-व्यवस्था और चौपट हो चुके सुशासन की कहानी की महज एक बानगी भर है। सच तो यह है कि बंगाल राजनीतिक हिंसा का केंद्र बन चुका है और यहां की सरकार अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम है। यह उचित है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस भयावह हिंसा का स्वतः संज्ञान लिया है और बंगाल सरकार से अतिशीध्र रिपोर्ट तलब की है। उच्च न्यायालय ने दिल्ली स्थित केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला को भी तत्काल घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने का आदेश दिया है। उधर, राज्य के राज्यपाल ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि प्रदेश में लोग जिंदा जलाए जा रहे हैं और ऐसी दुष्टता के बीच राजभवन चुपचाप बैठकर सारंगी नहीं बजा सकता। गौर करें तो इन संवैधानिक संस्थाओं द्वारा राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल खड़ा किए जाने से एक बात स्पष्ट है कि राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। जानना आवश्यक है कि बीरभूम जिले की रामपुरहाट में कुछ लोगों ने टीएमसी नेता भादू शेख पर हमला बोल दिया जिसमें उसकी मृत्यु हो गयी। इससे उत्तेजित लोगों ने एक दर्जन से अधिक घरों में आग लगा दी जिसमें 8 लोग जिंदा जलकर मर गए। अगर समय रहते स्थानीय प्रशासन चेत गया होता तो इस तरह का भयावह नरसंहार देखने को नहीं मिलता। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इस हिंसक घटना पर अब सियासत शुरु हो गयी है। भारतीय जनता पार्टी ने इसे नरसंहार कहा है वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तंज कसा है कि यह बंगाल है यूपी नहीं है। यानी उनकी मानें तो बंगाल में उत्तर प्रदेश से बेहतर कानून-व्यवस्था है। लेकिन सच तो यह है कि बंगाल में राजनीतिक वैमनस्यता से उपजा खूनी खेल का अंतहीन सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। गौर करें तो पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हत्या वामदलों के शासन में ही शुरु हो गयी थी। लेकिन जब 2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों के साढ़े तीन दशक के शासन को उखाड़ फेंका और सत्ता तक पहुंची तब उम्मीद जगा कि पश्चिम बंगाल में शांति और भाईचारे के बीज प्रस्फुटित होंगे। चुनावी हिंसा का दौर खत्म होगा और लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी। ममता ने वादा भी किया कि वे एक नई किस्म की राजनीति की शुरुआत करेंगी। लेकिन यह भ्रम शीध्र ही टूट गया। तृणमूल सरकार ने वामदलों की तरह तुष्टीकरण के मार्ग पर चलते हुए अपने कार्यकर्ताओं को न सिर्फ हिंसक सियासत के लिए उकसाया बल्कि उनके बचाव के लिए कुतर्क गढ़ना शुरु कर दिए। नतीजा उनके कार्यकर्ताओं का हौसला बुलंद हुआ और साथ ही उन्हें पुलिस-प्रशासन का संरक्षण मिलने लगा। पिछले कुछ वर्षों में विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या इसका जीता जागता उदाहरण है। गौर करें तो पिछले कुछ वर्षों में राज्य में भाजपा के एक सैकड़ा से अधिक कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। राज्य में कानून व्यवस्था किस कदर बिगड़ चुकी है इसी से समझा जा सकता है कि गत वर्ष विधानसभा चुनाव से पहले उत्तरी दिनाजपुर की आरक्षित सीट हेमताबाद से भाजपा विधायक देबेंद्र नाथ रे की हत्या कर उनके शव को फंदे से लटका दिया गया। ममता सरकार द्वारा अपराधियों की धरपकड़ करने के बजाए इसे खुदकुशी करार दिया गया। बंगाल के मौजूदा सियासी अराजक हालात को देखते हुए अब ऐसा लगने लगा है मानों सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को चुनाव जीतने और विरोधियों से निपटने के लिए किसी भी हद तक जाने की छूट दे दी है। अन्यथा क्या मजाल की सत्ता मशीनरी सतर्क रहे और विपक्षी दलों के काफिले पर हमला हो। देश के अन्य राज्यों में भी चुनाव होते हैं लेकिन कहीं भी इस तरह की अराजकता और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने का दृश्य देखने को नहीं मिलता। लेकिन बंगाल की बात करें तो यहां चुनाव के समय और उसके बाद हिंसा का माहौल स्वतः निर्मित हो जाता है जिसके लिए पूर्णतः यहां की सरकार जिम्मेदार है। बंगाल के नागरिकों की मानें तो विधि-शासन में तृणमूल कांग्रेस का हस्तक्षेप ही राजनीतिक और चुनावी हिंसा के लिए जिम्मेदार है। लोगों का कहना है कि तृणमूल कार्यकर्ताओं के मन में कानून को लेकर तनिक भी भय नहीं है। उन्हें भरोसा है कि राज्य प्रशासन उनके साथ है। इस स्थिति ने तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के फर्क को मिटा दिया है। जिस वामपंथ का यह सिद्धांत रहा कि सत्ता बंदूक की नली से गुजरती है, उसी सिद्धांत को टीएमसी ने भी अपना लिया है। गौर करें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं ने विपक्षी दलों विशेषरुप से भारतीय जनता पार्टी के कार्यकताओं को जमकर निशाना बनाया। इसमें कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की यह स्थिति ठीक नहीं है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की बात करें तो यह 1960-70 के दशक में ही प्रारंभ हो गया। यह दौर नक्सल आंदोलन का था। वामपंथी दलों ने चुनाव जीतने के लिए विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या की राजनीति अपनायी और स्थायी तौर पर इसे जीत का मंत्र बना लिया। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में 1977 से 2020 तक 30 हजार से अधिक राजनीतिक हत्याएं हो चुकी हैं। याद होगा कि सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन के दौरान सत्ता नियोजित हत्या ने देश को किस तरह विचलित किया। वामदलों ने यहां तीन दशक तक शासन किया। लेकिन विकास का ढांचा तैयार करने के बजाए अपने शासन के उग्र तेवर और अराजक कार्यकर्ताओं के दम पर राज्य की अर्थव्यवस्था को मटियामेट कर दिया। समाज में आर्थिक बराबरी की स्थापना के नाम पर तानाशाही हुकूमत की नींव डाली और अनर्थकारी हिंसायुक्त आर्थिक नीतियों के जरिए राज्य के कारोबार और निवेश को चौपट कर दिया। उन्होंने किस तरह हिंसा का सहारा लेकर विपरित राजनीतिक विचारधारा के लोगों का वजूद मिटाया यह किसी से छिपा नहीं है। इस विचारधारा की कोख से पैदा हुए राजनीतिक अराजकवादियों ने साम्यवाद के भोथरे नारों को उछालकर कल-कारखानों को बंद कराया और आम आदमी के हक और अधिकार के साथ छल किया। सत्ता में बने रहने के लिए हिंसा का सहारा लेकर प्रतिष्ठित ट्रेड यूनियनों पर मजदूर वर्ग के नेतृत्व की पकड़ ढ़ीली की और स्वयं अपनी कब्जेदारी जमा ली। गांव-गांव में वामपंथी अधिनायकवादी संगठनों को खड़ा किया और पंचायतों को अराजक और लंपट किस्म के कामरेडों के हाथों में सौंप दिया। गौरतलब है कि सत्ता के लिए ममता बनर्जी और वामपंथी दलों के बीच छत्तीस का आंकड़ा तब तक बना रहा जब तक कि ममता ने वामपंथी दलों के शाासन-सत्ता को उखाड़ नहीं फेंका। लेकिन आज की तारीख में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी भी वामपंथी दलों के चरित्र को अपना ली है। लेकिन उसका दुश्मन नंबर एक वामपंथी नहीं बल्कि भाजपा है। उसका कारण यह है कि बंगाल में वामदलों का शीराजा बिखर चुका है। उनका स्थान भाजपा ने ले ली है। बंगाल की भूमि पर भाजपा के उभार ने ममता को डरा दिया है। इस खौफ में वह न सिर्फ भाजपा के खिलाफ आग उगल रही हैं बल्कि राज्य के संवैधानिक पद पर आसानी राज्यपाल पर भी निशाना साध रही हैं। याद होगा गत वर्ष पहले उन्होंने राज्य के उत्तरी चौबीस परगना में फेसबुक से फैले तनाव के लिए जिम्मेदार गुनाहगारों पर कार्रवाई करने से बचने की कोशिश में राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी को ही निशाने पर ले लिया। तब वे कहती सुनी गयी थी कि टेलीफोन पर बातचीत के दौरान राज्यपाल उनसे ऐसे बर्ताव कर रहे थे मानों वे भाजपा के ब्लॉक प्रमुख हों। उनके एक अन्य नेता डेरेक ओ ब्रायन ने तो यहां तक कह डाला कि पश्चिम बंगाल में राजभवन आरएसएस की शाखा में तब्दील हो चुका है। सच कहें तो इस तरह का असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बयान रेखांकित करता है कि राज्य में एक निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार नहीं बल्कि मनमानी करने वाली गैर-जिम्मेदार सरकार है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















