लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷संस्कृत की एक प्रसिद्ध कहावत है कि शठे शाठयम समाचरेत्। यानि दुष्ट के साथ दुष्टतापूर्ण व्यवहार। यूरेशिया में स्थित तुर्की ऐसा ही देश है जिसके साथ भारत के लिए अब शठे शाठयम समाचरेत् का व्यवहार आवश्यक हो गया है। जिस तरह वह बार-बार कश्मीर मसले को तूल दे रहा है, उससे साफ जाहिर है कि वह भारत के दुश्मन पाकिस्तान के साथ है। एक बार फिर उसने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की बैठक में कश्मीर मसले को तूल देकर भारत को असहज करने की कोशिश की है। जबकि शंधाई सहयोग संगठन (एससीआ) की समरकंद में हुई बैठक में उसके राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोंगन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर दोनों देशों के रिश्ते में मिठास घोलने की वकालत की थी। लेकिन कहते हैं न कि सांप को साधु के पास बिठा देने मात्र से वह डंसना नहीं छोड़ देता। वह जहर ही उगलेगा जैसे तुर्की उगल रहा है। लेकिन कहते हैं न कि कुटनीति पलटकर वार भी करती है। भारतीय विदेशमंत्री एस जयशंकर ने वार कर भी दिया है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में कश्मीर मसले पर तुर्की की कमजोर नस यानि साइप्रस का मुद्दा उठाकर उसके जहरीले फन पर तेजाब रख दी है। उन्होंने तुर्की के विदेशमंत्री मेवलुत कावुसोग्लू से मुलाकात के दौरान साइप्रस की स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्वायत्तता की बात उठाकर जता दिया कि कश्मीर पर हाथ सेंकना बंद कीजिए अन्यथा साइप्रस मुद्दे की आग झुलसा देगी। उन्होंने ट्वीट कर यह भी कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के हिसाब से साइप्रस मुद्दे का शांतिपूर्ण हल निकाले। मतलब साफ है कि वैश्विक मंचों पर अब भारत के लिए साइप्रस का मुद्दा शीर्ष प्राथमिकता में होगा। भारत के प्रहार से तुर्की की घिग्घी बंध गयी है। कारण, कश्मीर मसले को उठाने के एवज में अब उसे साइप्रस मुद्दे पर भारत समेत दुनिया के अन्य देशों की लानत-मलानत झेलनी पड़ सकती है। गौर करें तो अभी तक तुर्की इस मसले पर जवाब देने से बचता रहा है। वह नहीं चाहता है कि इस मसले को अंतर्राष्ट्रीय मंचों के जरिए तूल दिया जाए। लेकिन भारत ने इस मसले को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से उठाकर कुटनीतिक तौर पर तुर्की को लहूलुहान कर दिया है। समझना होगा कि तुर्की के लिए साइप्रस इसलिए दुखती रग है कि उसने साइप्रस के 36 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर जबरन कब्जा कर रखा है। 15 जुलाई, 1974 को तुर्की की सेना ने साइप्रियट नेशनल गार्ड की अगुवाई में साइप्रस के अंदरुनी हालातों का फायदा उठाते हुए अंतर्राष्ट्रीय कानून को ठेंगा पर रख उत्तरी हिस्से पर आक्रमण कर उसके महत्वपूर्ण शहर वरोशा पर कब्जा कर लिया। तब सुरक्षा परिषद के सभी देशों ने तुर्की के इस कदम की निंदा की। 2 अगस्त, 1975 को तुर्की और साइप्रस के बीच वियना में समझौता हुआ। समझौते के मुताबिक तय हुआ कि तुर्की अपने बलात् किए गए कब्जे वाले इलाके में लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और अपने मजहब को मानने की आजादी समेत सामान्य जीवन जीने में मददगार हर बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराएगा। लेकिन तुर्की ने इस समझौते को ठेंगा पर रख अपना अत्याचार रखा। वर्ष 1998 के प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सभी सदस्य देशों से साइप्रस गणराज्य की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही। लेकिन तुर्की जबरन कब्जाए इलाके को नहीं छोड़ा। तुर्की के आक्रमण के कारण 162000 ग्रीक-साइप्रियोट अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह गए। तुर्की के बलात् कब्जे के बाद से ही यह द्वीप दो हिस्सों में बंट गया। तुर्क साइप्रसवासियों ने अपने इलाके को टर्किश रिपब्लिक आॅफ नाॅदर्न साइप्रस नाम दिया है। फिलहाल इसे सिर्फ तुर्की ने ही मान्यता दे रखा है। तुर्की द्वारा जबरन कब्जाया गया साइप्रस का यह उत्तरी इलाका लोगों की जीविका और आमदनी का बड़ा स्रोत हुआ करता था। यह इलाका वर्ष भर पर्यटकों से भरा गुलजार रहता था। आर्थिक रुप से समृद्ध यह इलाका बहुमंजिली इमारतों के लिए भी जाना जाता था। लेकिन तुर्की के अत्याचार ने इसे वीरान बना दिया है। भारत ने इस मसले को संयुक्त राष्ट्र महासभा में उठाकर तुर्की की चैधराहट की हवा निकाल दी है। चूंकि मौजूदा समय में दुनिया भर में भारत की साख बढ़ी है और वैश्विक मंचों पर उसकी आवाज सुनी जा रही है ऐसे में साइप्रस का मुद्दा तुर्की के गले की फांस बनना तय है। गौर करें तो इसके लिए एकमात्र तुर्की ही जिम्मेदार है। अगर वह बार-बार कश्मीर का मुद्दा नहीं उठाता तो भारत को साइप्रस का मुद्दा उठाने की जरुरत ही नहीं थी। लेकिन देखें तो तुर्की कश्मीर मसले पर ही नहीं बल्कि अन्य मसलों पर भी भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान का साथ देता है। उसने अभी चार माह पहले ही पाकिस्तान की शह पर भारत का 56,877 मिलियन टन अनाज से लदे जहाज को वापस भेज दिया। उसने ऐसा कर वैश्विक बाजार में भारतीय अनाज निर्यात की साख खराब करने की कोशिश की। यहीं नहीं इंटरनेट मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के जरिए भी वह भारत विरोधी केंद्र के रुप में इस्तेमाल हो रहा है। सच कहें तो तुर्की, पाकिस्तान और कतर जैसे भारत के दुश्मनों के साथ गठजोड़ कर रखा है। लेकिन अब उसे इसकी कीमत चुकाने का समय आ गया है। इसलिए कि तुर्की के आक्रमक व्यवहार को देखते हुए अब भारत भी खुलकर अपने पत्ते खेलना शुरु कर दिया है। भारत न सिर्फ साइप्रस के मसले को उठाकर बल्कि ग्रीस और आर्मिनिया के साथ मिलकर भी तुर्की की पेशबंदी तेज करेगा। ग्रीस और आर्मिनिया दोनों ही तुर्की के खिलाफ हैं। ऐसे में वह साइप्रस के मसले पर भारत के साथ कंधा जोड़ते साफ दिखेंगे।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















